बीते 18 अगस्त को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची से 365 किलोमीटर दूर पाकुड़ जिले में अपनी महत्वाकांक्षी योजना 'झारखंड मुख्यमंत्री मंइयां सम्मान योजना' की पहली किस्त जारी कर रहे थे. इसके तहत सरकार राज्य की 21 से 50 साल तक की सभी महिलाओं, जिनकी संख्या करीब 48 लाख है, को हर महीने एक हजार रुपए देने जा रही है. ठीक उसी वक्त पूर्व सीएम चंपाई सोरेन दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके के होटल ताज पैलेस में बैठे अपनी बगावत का दस्तावेज लिख रहे थे.
झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक चंपाई ने देश की राजधानी से सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी. इसमें उन्होंने तीन मुख्य बातें कहीं. पहली कि उन्हें मुख्यमंत्री के पद से अपमानजनक तरीके से हटाया गया. दूसरी बात यह कि जिन्होंने हटाया, उन्हें सिर्फ सत्ता से मतलब है. और सबसे आखिरी बात कि उनके पास तीन विकल्प हैं—राजनीति से संन्यास, अपना अलग संगठन बनाना और तीसरा, इस राह में अगर कोई साथी मिले, तो उसके साथ आगे का सफर तय करना.
दो दिनी दिल्ली प्रवास के बाद 20 अगस्त देर शाम वे सरायकेला पहुंचे और फिर 21 अगस्त की शाम उन्होंने नई पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. चंपाई ने कहा, "हम संन्यास नहीं लेंगे. हमने नया अध्याय शुरू किया है. नए संगठन को मजबूत करेंगे. रास्ते में कोई दोस्त मिला तो दोस्ती करेंगे. अगले 7 दिन में सब साफ हो जाएगा."
कितने असरदार होंगे चंपाई
अब सबसे बड़ा सवाल है कि चंपाई के रास्ते जुदा होने से जेएमएम पर क्या प्रभाव पड़ेगा? चंपाई कोल्हान इलाके के नेता माने जाते हैं. कोल्हान के अंतर्गत पश्चिमी और पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले आते हैं. यहां विधानसभा की कुल 14 सीटें हैं. इनमें से अभी 12 जेएमएम, एक कांग्रेस और एक पहले निर्दलीय और अब जद (यू) (विधायक पार्टी में शामिल हो चुके हैं) के पास है.
जेएमएम विधायक और हेमंत के करीबी सुदिव्य कुमार सोनू कहते हैं, "इतिहास गवाह रहा है कि जो पार्टी छोड़कर गए हैं, जनाधार ने उनको अपनाया नहीं है. चंपाई दा इसके अपवाद होंगे, ऐसा नहीं लगता." सुदिव्य की बात को समझें तो पूर्व में हेमलाल मुर्मू, साइमन मरांडी, स्टीफन मरांडी, कृष्णा मार्डी, सीता सोरेन जेएमएम छोड़ भाजपा में गए या अपनी पार्टी बनाई और बेअसर रहे.
वहीं सरयू राय कहते हैं, "चंपाई सोरेन कोल्हान में कोई बड़ा प्रभाव नहीं डालने जा रहे हैं. पहले भी वे बहुत कम मार्जिन से जीतते रहे हैं. अगर वे बीजेपी के साथ गठबंधन में गए तो अपनी सीट बचा लें, इतना ही काफी होगा." हालांकि बीजेपी के नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार बाउरी दोनों से ही इत्तेफाक नहीं रखते. वे दावा करते हैं, "इस बात से तो कोई इनकार नहीं कर सकता कि पूरे कोल्हान में चंपाई दा ने ही जेएमएम को खड़ा किया है. ऐसे में अगर कोई कहता है कि उनके जाने से पार्टी को कोई नुक्सान नहीं होगा, तो मैं ऐसा नहीं मानता."
नए दल की घोषणा करते वक्त पत्रकारों ने चंपाई से पूछा कि चुनाव में इतना कम समय रह गया है. आप कैसे नया दल बनाकर उसको आगे बढ़ा पाएंगे. इस पर झल्लाते हुए पूर्व सीएम ने कहा कि पत्रकारों को इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है और चार दिन में उनके पास 40 हजार लोग जमा हो गए हैं.
चंपाई 18 अगस्त को जमशेदपुर से कोलकाता और फिर वहां से दिल्ली गए थे. चर्चा यह थी कि कोल्हान इलाके के कुछ विधायक जिनमें समीर मोहंती, दशरथ गगराई, संजीव सरदार, रामदास सोरेन, मंगल कालिंदी भी उनके साथ दिल्ली पहुंचेंगे और फिर सब एक साथ बीजेपी जॉइन करेंगे. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. हेमंत सोरेन ने एक बार फिर समय रहते कमान को साधा और सभी संभावित बागी विधायकों से बात की. बाद में इन विधायकों ने साफ कहा कि वे पार्टी और हेमंत के प्रति वफादार हैं.
पर आखिर दूर क्यों हुए चंपाई
हमेशा यह देखा गया कि हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन चंपाई से जब भी मिले, पैर छूकर प्रणाम किया. लेकिन 30 जून को 'हूल दिवस' पर साहिबगंज के भोगनाडीह में आयोजित कार्यक्रम में ऐसा नहीं हुआ. ऐसे में सवाल यह है कि अपने 31 जनवरी से 3 जुलाई तक के 155 दिन की सरकार में ऐसा क्या हुआ कि हेमंत के साथ उनके संबंधों में खटास आने लगी. बताया जाता है कि सीएम बनते ही उन्होंने हेमंत के सभी करीबियों को अपनी टीम में जगह नहीं दी. फिर दोनों के सलाहकारों के बीच टकराव होने लगा.
हेमंत के सलाहकारों में से एक बताते हैं कि उन्होंने चंपाई के सलाहकार से कहा कि सरकार के स्तर पर कोई योजना या अन्य निर्णय लिया जा रहा हो, तो इसकी जानकारी दी जाए और अनुमति ली जाए, जिसे चंपाई के सलाहकार ने यह कह कर मना किया कि ऐसा बिल्कुल नहीं होगा. इसके बाद सलाहकारों के बीच व अधिकारियों के बीच अनबन बढ़ती गई और एक वक्त आया जब गठबंधन की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस को भी चंपाई खटके. बीते 30 जून को राज्य सरकार ने तीन नए आपराधिक कानून लागू होने संबंधी पूरे एक पेज का विज्ञापन झारखंड के सभी अखबारों में छपवा दिया.
गैर-बीजेपी शासित राज्यों में ऐसा करने वाला झारखंड अकेला था. अब इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता और स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता कहते हैं, "जब पार्टी और गठबंधन बुरे दौर से गुजर रहा था, तो चंपाई बीजेपी नेताओं संग सेटिंग बिठा रहे थे. अब बाबूलाल मरांडी ने बीजेपी में आने का विरोध किया तब ऑप्शन की बात करने लगे."
हेमंत सरकार के अब तक के कार्यकाल में कुल चार बार इंडिया गठबंधन के नेताओं को तोड़ने और सरकार गिराने की कोशिश हुई. इसके बाद बीजेपी ने पहले संथाल में सीता सोरेन को पार्टी में शामिल कराया. अब संथाल परगना में बांग्लादेशी मुसलमानों की मौजूदगी को मुद्दा बनाकर जेएमएम के गढ़ को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. राजनैतिक जानकार कहते हैं कि यहां सफलता न मिलती देख, पार्टी की नजर कोल्हान पर गई.
बीजेपी की कोशिश है कि किसी तरह जेएमएम की आदिवासी आरक्षित सीटों में चार से पांच पर नुक्सान करा दिया जाए, तो खेल बदल सकता है. हालांकि नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार बाउरी एक बार फिर कहते हैं, "बीजेपी ऐसी किसी योजना पर काम नहीं कर रही है. जहां तक चंपाई सोरेन के बीजेपी में आने या पार्टी बनाकर गठबंधन करने की बात है, तो यह मीडिया की उपज है."
बीजेपी में बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा के रूप में दो पूर्व सीएम पहले से मौजूद हैं. अमर बाउरी भी सीएम पद की रेस की चर्चा में आते रहे हैं. ऐसे में एक और पूर्व सीएम चंपाई सोरेन के पार्टी में आने से सबके लिए स्थिति का असहज होना स्वाभाविक ही है.
हालांकि जेएमएम की मजबूत टहनी रहे चंपाई सोरेन ने अगर इस नए विकल्प के माध्यम से अपनी जड़ पकड़ ली और फिर उस जड़ से शाखाएं और पत्ते निकलने लगे, तो आदिवासी वोटरों के लिए दूसरा विकल्प भी राज्य में तैयार हो जाएगा. इस संभावना पर नेशनल इलेक्शन वॉच के झारखंड संयोजक सुधीर पाल कहते हैं, "इसकी संभावना फिलहाल कम नजर आ रही है. आदिवासी वोटर यह बात जरूर समझ रहे होंगे कि चंपाई को वोट देना, मतलब बीजेपी को वोट देना है."
पाल यह भी कहते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव (तब 28 एसटी आरक्षित सीटों में से 26 जेएमएम गठबंधन को मिली थीं) और बीते लोकसभा चुनाव (सभी 5 एसटी आरक्षित सीटें इंडिया गठबंधन के खाते में गई थीं) के नतीजों को देखें तो ऐसा होता बिल्कुल भी नहीं दिख रहा. हां, अगर चंपाई भारत आदिवासी पार्टी सहित कुछ अन्य को जोड़ कर एक थर्ड फ्रंट खड़ा करते हैं, तो पाल के मुताबिक वे 5 से 10 फीसद वोट इधर-उधर कर सकते हैं. ऐसे में जेएमएम को नुक्सान हो सकता है.
उलटफेर के आंकड़े
81 विधानसभा सीटें हैं झारखंड में
42 सीट बहुमत के लिए चाहिए
28 सीट आदिवासियों के लिए आरक्षित
14 सीटें कोल्हान क्षेत्र से हैं. ऐसा माना जाता है कि चंपाई सोरेन इन सीटों पर जेएमएम के गणित को गड़बड़ा सकते हैं
- आनंद दत्त

