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बांग्लादेश की आपदा बिहार में टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए क्यों है एक मौके की तरह?

उद्योगहीनता के लिए बदनाम बिहार में टेक्सटाइल और लेदर इंडस्ट्री मजबूती से पांव जमाती नजर आ रही. सरकार की लुभावनी नीति उद्यमियों को खासी भा रही. अलग-अलग जगहों पर फैक्ट्रियां लगने के साथ बड़ी संख्या में कुशल प्रवासी मजदूर बिहार लौट रहे

हाजीपुर में कंपीटेंस एक्सपर्ट प्रा. लि. की फैक्ट्री में रूसी बाजार के लिए सेफ्टी शूज तैयार करते कर्मचारी
हाजीपुर में कंपीटेंस एक्सपर्ट प्रा. लि. की फैक्ट्री में रूसी बाजार के लिए सेफ्टी शूज तैयार करते कर्मचारी
अपडेटेड 22 अगस्त , 2024

मुजफ्फरपुर के औद्योगिक परिसर में बैग कंपनी हाई स्पिरिट के अपने दफ्तर में बैठे तुषार जैन सादे कागज पर तरह-तरह की रेखाएं खींच रहे हैं, नक्शे बना रहे हैं. मुंबई के इस उद्यमी ने अब अपना धंधा यहीं शिफ्ट कर लिया है. वे बताते हैं, "कोरोना के बाद जब हमारी बैग फैक्टरी के बिहारी मजदूर लौटने में आनाकानी करने लगे तो हमने तय किया कि क्यों न हम खुद मजदूरों के घर के पास चले जाएं."

वे आगे बताते हैं, "17 अप्रैल, 2022 को मैं पहली दफा बिहार आया था, छोटी-सी फैक्टरी शुरू करने. यहां मुझे इतना अच्छा रेस्पॉन्स मिला कि दो साल में मैंने अपना अस्सी फीसद कारोबार बिहार ट्रांसफर कर लिया है." उन्होंने सिर्फ 56 दिनों में अपनी पहली यूनिट शुरू की. अपने जॉब वर्करों को बिहार ले आए. ऐसे 22 लोगों ने पूर्वी चंपारण में अपने-अपने गांवों में छोटी-छोटी बाइस यूनिट लगाई.

मुजफ्फरपुर में जीविका की दीदियों के साथ 42 यूनिट चला रहे हैं. अभी बिहार में हाई स्पिरिट की तीन बड़ी यूनिट हैं और वे 64 छोटी-छोटी यूनिट को जॉब वर्क दे रहे हैं. इसके अलावा वे मुजफ्फरपुर के गांवों में 45 महिलाओं को उनके घर में बैग के जिप स्लाइडर बनाने का भी काम देते हैं. इस तरह उनकी वजह से बिहार में इस वक्त 3,200 आधुनिक सिलाई मशीनें और 45 जिप स्लाइडर बनाने वाली मशीन लगातार चल रही हैं और इससे छह हजार लोगों को रोजगार मिला है.

हाई स्पिरिट कोई अपवाद नहीं है. रेन वियर और विंटर वियर बनाने वाली कंपनी न्यू जील फैशन वियर ने पिछले साल सितंबर में हाजीपुर में एक यूनिट शुरू की थी. एक साल से भी कम समय में इस यूनिट में हर महीने एक लाख रेनकोट तैयार होने लगे. अब यह कंपनी राज्य में दूसरी यूनिट हाजीपुर ही में लगाने वाली है. न्यू जील में छह सौ लोग काम करते हैं, इनमें 80 फीसद स्थानीय महिलाएं हैं.

हाजीपुर शहर में सेफ्टी जूतों की एक कंपनी है, कंपीटेंस एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड, जो 2018 से रूस के बाजार के लिए जूते तैयार कर रही है. पिछले दिनों ऐसी खबरें खूब चर्चा में रहीं कि यह कंपनी रूसी सेना को जूते सप्लाइ करती है. कंपनी के एक कर्मचारी इससे इनकार करते हुए कहते हैं, "हमें रूस के बाजार से जैसे सेफ्टी जूते बनाने के ऑर्डर आते हैं, हम उसी जैसा जूता बनाकर भेजते हैं. अब ये जूते वहां कौन पहनता है, किस इस्तेमाल में आते हैं, हमको क्या पता!"

यह कंपनी हर महीने तीन से चार कंटेनर जूते रूस भेजती है. उन्हें टाटा संस से भी सेफ्टी जूतों के ऑर्डर मिले हैं. कंपनी में 350-400 का स्टाफ जूते तैयार करता है. इनमें से 70 फीसद स्थानीय महिलाएं हैं. इनके अलावा पश्चिमी चंपारण का चनपटिया तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए रोल मॉडल है. वहां कोरोना के वक्त बिहार लौटे 56 मजदूरों ने अपनी-अपनी उत्पादन इकाई लगाई थी. ये लोग जीन्स, टी-शर्ट, पाजामा, स्वेटर से लेकर लहंगा-साड़ी तक बनाते हैं. इन उत्पादों की हर जगह खूब मांग है. यहां भी 300 से ज्यादा लोग काम करते हैं.
 
पॉलिसी का कमाल

बिहार जैसे पिछड़े राज्य में सिलाई मशीन के जरिए कपड़े, बैग और जूते बनाने का कारोबार फल-फूल रहा है. इसके पीछे बिहार सरकार की टेक्सटाइल और लेदर पॉलिसी की बड़ी भूमिका बताई जा रही है. 2022 में लागू हुई इस पॉलिसी में कई ऐसे तत्व हैं, जो निवेशकों को बिहार की तरफ आकर्षित कर रहे हैं.

इस पॉलिसी की खूबी बताते हुए तुषार कहते हैं, "अगर आप यहां इंडस्ट्री बिठाने के लिए 10 करोड़ रु. तक का लोन लेते हैं तो इसका ब्याज सरकार वहन करती है. इसके अलावा पूरे निवेश पर सब्सिडी तो है ही. एक और अच्छी बात यह है कि आप जितने स्टाफ को रोजगार देते हैं, उनकी सैलरी का बड़ा हिस्सा 3,500 से 5,000 रु. के बीच सरकार लेबर सब्सिडी के रूप में देती है. स्टाफ की ट्रेनिंग में मदद करती है. इसके अलावा अगर आप अपना माल बिहार में बेचते हैं तो स्टेट जीएसटी में छूट मिलती है. सबसे बड़ी बात यह है कि काम अटकता नहीं."

न्यू जील फैशन वियर के एचआर हेड नरेंद्र कुमार इससे सहमति जताते हैं, "सब्सिडी मिलने की प्रक्रिया तेज है. सिंगल विंडो सिस्टम सही में काम करता है, प्रोसेस में देर नहीं लगती."

दिसंबर, 2023 में बिहार में आयोजित इनवेस्टर मीट में भी टेक्सटाइल और लेदर कंपनियों ने बिहार में निवेश में दिलचस्पी ली थी. उस वक्त सावी लेदर ने मधुबनी के पंडौल में 274 करोड़ रु. का एमओयू साइन किया था. कंपनी वहां जमीन ले चुकी है और फैक्ट्री बनने का काम शुरू हो गया है. इसी तरह 18-19 जुलाई, 2024 को पटना में आयोजित टेक्सटाइल इनवेस्टर मीट में पर्ल ग्लोबल ग्रुप ने निवेश करने का भरोसा जताया है.

हालांकि यह महज शुरुआत है. प्रदेश का उद्योग विभाग चाहता है कि बांग्लादेश की तरह बिहार भी टेक्सटाइल और लेदर का बड़ा हब बने. यहां स्किल्ड लेबर यानी कुशल मजदूर हैं जो पूरे देश में काम कर रहे हैं. वे कम मेहनताने में भी अपने घर आकर काम करना चाहते हैं. इसके अलावा यहां से भारत की 40 फीसद आबादी यानी पूरे पूर्वी भारत तक आसानी से पहुंचा जा सकता है और साथ ही नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों तक भी पहुंचना आसान है.

तुषार कहते हैं, "बांग्लादेश पहले फीजिबल था. पहले वहां न्यूनतम मजदूरी 79 डॉलर होती थी. अब बढ़कर 129 डॉलर हो गई है. इसलिए वहां संभावना नहीं बची. बिहार के लिए है, यहां लॉजिस्टिक कॉस्ट कम है. यहां मिनिमम वेज 9,500-10,000 रु. है और सरकार लेबर सब्सिडी देती है. बिहार में न्यूनतम मजदूरी सिर्फ 71 डॉलर पड़ती है."

इस पॉलिसी का सबसे बड़ा फायदा महिलाओं के मामले में दिखता है. हर टेक्सटाइल कंपनी में बड़ी संख्या में औरतें काम करती नजर आती हैं. पूर्वी चंपारण की 22 यूनिटों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर कंपनियों में 50 से 80 फीसद तक औरतें हैं. चूंकि सरकार स्टाफ की ट्रेनिंग और सैलरी पर सब्सिडी दे रही है तो कंपनियों को अकुशल औरतों को रखने में दिक्कत नहीं होती.

न्यू जील फैशन वियर में रेनकोट सिलने का काम कर रही सबिया देवी वैशाली के बिदुपुर से रोज 12 किमी का सफर तय कर इस कंपनी में काम करने आती हैं. उन्हें काम शुरू किए हुए सिर्फ तीन महीने बीते हैं, मगर वे कंपनी की सिलाई मशीन पर फटाफट रेनकोट सिल लेती हैं. हाइ स्पिरिट में काम करने वाली रंजू देवी भी डेढ़ साल से यहां बैग के धागे हटाने का काम कर रही हैं. सोनी खातून तो इस कंपनी में काम करने के लिए समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर आ गई हैं. पिछले छह महीने से वे अपने परिवार के साथ फैक्टरी के बगल में किराए पर घर लेकर रह रही हैं.

इस पॉलिसी ने जीविका (बिहार राज्य आजीविका मिशन) की 42 औरतों को कंपनी का मालिक और 45 औरतों को जॉब वर्क प्रोवाइडर बनाया है. तुषार ने जब मुजफ्फरपुर में अपनी बैग फैक्ट्री शुरू की तो उनके साथ सरकार ने आसपास के चार जिलों से जीविका की इन औरतों को उनके साथ जोड़ा और पटना के चंद्रगुप्त इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में उद्यमिता का प्रशिक्षण दिलाया. इन्हें मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत दस लाख और जीविका के जरिए पांच लाख रु. का लोन दिलाया गया. उन्हें सिर्फ पांच लाख रु. वापस करने हैं, जिस पर कोई ब्याज नहीं लगेगा. उन औरतों ने 24-24 सिलाई मशीनें खरीदीं और औद्योगिक परिसर में ही उन्हें जगह दी गई. अब वे हाइ स्पिरिट के लिए बैग तैयार करती हैं.

जीविका से जुड़ी इन घरेलू ग्रामीण महिलाओं को एक कंपनी के मालिक के तौर पर देखना किसी को भी सुखद लग सकता है. ऐसी ही एक कंपनी समस्तीपुर की अंजू कुमारी भारती की है, कंपनी का नाम अंजू बैग्स है. वे फैक्ट्री के एक कोने में अपने आर्मचेयर पर बैठीं काम की निगरानी करती नजर आती हैं.

वे कहती हैं, "हर महीने हम लोग 4,000 से 5,000 बैग तैयार कर लेते हैं." उसी परिसर में मोतीपुर की चुनमुन और मड़वन की सोनी भी मिलती हैं. उनकी भी अपनी कंपनी है और ये भी हाइ स्पिरिट के लिए जॉब वर्क करती हैं. लेकिन अगर हाई स्पिरिट ने काम देना बंद कर दिया तो क्या होगा? चुनमुन कहती हैं, "हम मार्केट से भी काम उठाते हैं. सिर्फ हाई स्पिरिट का काम नहीं करते. हम हर महीने 1,000 से 2,000 बैग बाहर के लिए भी तैयार करते हैं."

सोनी, चुनमुन और अंजू की तरह मुजफ्फरपुर के मड़वन के विश्वंभरपुर की बनारसी देवी भी अपने कारोबार की मालकिन हैं. वे हर महीने 40,000 रु. तक कमा रही हैं. उन्होंने जीविका से लोन लेकर जिप स्लाइडर की मशीन खरीदी और अब हाई स्पिरिट का जॉब वर्क करती हैं. उनके पति हरदेव महतो भी स्लाइडर के लिए लूपी काट कर 30,000-35,000 रु. प्रति माह कमा लेते हैं. बनारसी देवी इस इलाके में जीविका से जुड़ी बीस से अधिक महिलाओं को लूपी और जिप देती हैं, जिसकी वजह से उन महिलाओं को हर महीने 25,000-35,000 रु. तक कमाई हो जाती है.

बनारसी और हरदेव की तरह बंगड़ी गांव की लैला खातून और उनके पति सैनुद्दीन जिप स्लाइडर बनाने और लूपी काटने के काम में ठीक-ठाक पैसे कमा रहे हैं. वे भी अपने इलाके की 20-22 महिलाओं को लूपी और स्लाइडर देकर उनके काम करवा रहे हैं. सैनुद्दीन बीस साल से कलकत्ता में रहकर वॉलेट सिलने का काम कर रहे थे. मगर लैला खातून का काम जब काफी बढ़ गया तो उन्होंने अपने पति से कहा, काम छोड़कर यहीं आ जाइए. सैनुद्दीन जिंदगी में पहली दफा अपने घर पर रहकर रोजगार कर रहे हैं. वे कहते हैं, "कभी नहीं सोचा था कि अपने गांव में इतने पैसे कमाऊंगा."

सैनुद्दीन की तरह वैशाली के अजीत कुमार रजक ने भी कभी नहीं सोचा था कि वे जो काम नोएडा में कर रहे थे, वही काम अपने घर से बीस किमी की दूरी पर जाकर करेंगे. पिछले तीन महीने से वे न्यू जील फैशन वियर में रेनकोट की क्वालिटी चेकिंग का काम कर रहे हैं और साथ-साथ अपनी पांच बीघा जमीन पर केले की खेती. उनके साथ काम करने वाले सुमन कुमार हाजीपुर के पास काशीपुर गांव के रहने वाले हैं. वे ढाई हजार किमी दूर तमिलनाडु के टेक्सटाइल हब तिरुपुर में काम करते थे. साल में 15 दिन की छुट्टी होती तो एक हक्रते ट्रेन में बीत जाता. अब दिन फैक्ट्री में गुजरता है और रात अपने घर में.

गांव में फैक्ट्री. मालिक भी गांव का. और प्रवासी मजदूरों का गांव लौटकर काम करना. यह मॉडल सुनने में काफी उम्मीद जगाने वाला लग रहा था. इस मॉडल को देखने इंडिया टुडे की टीम ढाका के लहसनिया और झिटकाही पहुंच गई. लहसनिया गांव में बीचोबीच किसी बड़े गोदाम जैसी सफेद रंग की बिल्डिंग दिखती है. इस बिल्डिंग में 65 सिलाई मशीनें लगी हैं और बैग सिलाई का सामान बिखरा हुआ है. मगर सिलाई करते लोग नजर नहीं आते. कुछ लोग जरूर वहां लेटे हुए मोबाइल देखते मिलते हैं. वे कहते हैं, "अभी लंच हुआ है. लोग खाना खाने अपने घर गए हैं. तीन बजे से दुबारा काम शुरू होगा."

मुंबई में क्या ये लोग इसी तरह दोपहर का खाना खाने घर चले जाते थे? इस सवाल पर वे लोग हंसने लगते हैं. कहते हैं, यहां अपनी मर्जी है, "अपना काम है. घर पास में है. गए और मां के हाथ का बना खाकर आ गए." थोड़ी देर बाद काम शुरू होता है. सुजीत कुमार को सिर्फ एक दिक्कत है. वे हंसते हुए बताते हैं, "अब तो घर की बकरी भी खो जाती है तो घर वाले फोन करके कहते हैं, जाकर बकरी ढूंढ़ लाओ. खैर, ये कोई बड़ी प्रोब्लम नहीं है. अपने घर आकर चार पैसे कमा रहे हैं, इससे अच्छा क्या होगा."

पर हालात सबके लिए इतने माफिक भी नहीं. जो खुशी लहसनिया की फैक्ट्री अमन इंटरप्राइजेज के मजदूरों के चेहरे पर दिखती है, वह फैक्ट्री मालिक अलाउद्दीन शेख के चेहरे पर नजर नहीं आती. उनके चेहरे पर थोड़ी उदासी, थोड़ी नाराजगी है.

वे कहते हैं, "ऐसा लगता है, यहां आकर फंस गए. हमें मुंबई से यहां बुलाने के लिए जो सरकारी अफसर गए थे, उन लोगों ने बड़े-बड़े वादे किए थे. कहा था, आप जितना इनवेस्ट करोगे, उसका डेढ़ गुना पांच साल में रिटर्न करेंगे. वह चाहे जैसे हो, सब्सिडी दिलाकर हो, लोन दिलाकर हो, या जीएसटी में छूट देकर. लेकिन अभी तक हम लोगों को कोई सुविधा नहीं मिली. लोन के लिए कई बार कोशिश कर चुके हैं, उद्योग विभाग में शिकायत कर चुके हैं. मगर मिलता नहीं."

वे आगे बताते हैं, "लोन मिले तब तो सब्सिडी मिलेगी. अभी तो ब्याज पर पैसा लेकर कारोबार कर रहे हैं. 1.35 करोड़ रु. का इनवेस्टमेंट कर चुके हैं. दूसरी दिक्कत है, बिजली की. इस इलाके में दिन में पांच से छह घंटे पावर कट रहता है. जेनरेटर से खर्च बढ़ जाता है. और यह सिर्फ मेरा मामला नहीं है. इस इलाके की जितनी 20-22 यूनिट हैं, किसी को लोन नहीं मिला है. उद्योग विभाग हमारी शिकायतों पर ध्यान नहीं दे रहा."

वहां से थोड़ी ही दूरी पर झिटकाही गांव में जुनैद इंटरप्राइजेज की बड़ी-सी फैक्ट्री है. वह इस इलाके की सबसे बड़ी यूनिट है. 170 मशीनें वहां दिन-रात चलती हैं. आसपास के 300 मजदूर काम करते हैं. वहां ये लोग ट्रॉली बैग बनाते हैं. कंपनी के मालिक जुनैद इलाही के चेहरे पर भी वैसी ही निराशा है, जैसी अलाउद्दीन शेख के चेहरे पर दिखी.

वे कहते हैं, "तीस साल से मुंबई में बैग बनाते थे. तुषार सेठ बोला तो अपना सारा कारोबार उठाकर यहां अपने गांव ले आए. सेठ को तो लोन भी मिला, सब्सिडी भी, लेबर सब्सिडी भी. हमें कुछ नहीं मिला. उल्टे रोज जेनरेटर में 3,000-4,000 रु. का डीजल फूंक रहे हैं. वहां तो दूसरे लोगों से भी ऑर्डर मिल जाता था, यहां बस तुषार सेठ पर निर्भर हैं."

ऐसी ही निराशा चनपटिया के स्टार्टअप जोन में है. वहां के कंपनी ऑनर जो मजदूर से मालिक हैं अब वर्किंग कैपिटल नहीं होने के कारण परेशान हैं. वे कहते हैं, पहले हम काम सीख रहे थे. अब जब अच्छा माल तैयार कर रहे हैं, हमारे पास ऑर्डर भी आ रहे हैं. मगर अफसोस! हमने जितना लोन लिया था, सब मशीन खरीदने में खर्च हो गया. अब हमारे पास माल तैयार करने का पैसा नहीं है. सरकार हमें इसके लिए अलग से लोन दिलाए. नहीं तो हमारे लिए काम आगे बढ़ाना मुश्किल होगा.

मगर बिहार के नए उद्योग मंत्री नीतीश मिश्र मानते हैं, ये सब छोटी-मोटी दिक्कतें हैं, समय के साथ इससे उबर जाएंगे. बांग्लादेश में सियासी उथलपुथल के मद्देनजर वह समय जल्दी आ सकता है.

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