लगता है सड़क भी उस 'मौत की घाटी' तक जाने से डर रही है. मॉनसूनी बारिश की उस रौंदती रफ्तार और पहाड़ों के मलबे से दो गांवों मुंडाक्की और चूरलमाला को बहे 10 दिन बीत चुके हैं. अब सिर्फ बाकी बची हैं तो यादें, वीडियो और क्षत-विक्षत मानव अंग. कोझिकोड से हेयरपिन बैंड यानी तीखे मोड़ वाली सड़कों से होते हुए जब वायनाड के प्रशासनिक मुख्यालय कलपेट्टा तक पहुंचेंगे तो उसके आगे कुछ नहीं मिलेगा. 21 किलोमीटर तक केवल एंबुलेंस और पुलिस गाड़ियों की हलचल है. मेप्पाडी के आगे आपको पुलिस चेक पॉइंट मिलेगा जहां आपको पता चल जाएगा कि यहां इमरजेंसी का वक्त अभी खत्म नहीं हुआ है. 152 लापता लोगों की तलाश में यहां अभियान चल रहा है.
सड़क किनारे के कुछ टूटे हुए संकेतकों के सिवा इन दोनों गांवों की अब कोई पहचान नहीं बची है. अब यह कीचड़ का हिस्सा है, किसी भूरी मोटी लाइन जैसा, जो पंचीरीमात्तोम से नीचे की ओर पूरी तलहटी में बहता है. यह पहले भूस्खलन का केंद्र था. 29 जुलाई की आपदा में आधिकारिक तौर पर 224 लोगों के मारे जाने का दावा किया गया है, जिनमें 88 महिलाएं और 37 बच्चे शामिल हैं. मौतों का गैर-सरकारी आंकड़ा 500 से ऊपर है. अभी तक सिर्फ 172 शवों की पहचान की जा सकी है जबकि करीब 180 के शरीर के अंग दावेदारों का इंतजार कर रहे हैं.
छह अगस्त को करीब 35 अज्ञात शव और 154 शारीरिक अंगों को सर्वधर्म प्रार्थना के बाद पुतुमला में दफनाया गया. यह वही जगह है जहां अगस्त 2019 में हुए भूस्खलन में पांच लोग मारे गए थे. शव और शरीर के अंग अलग-अलग गड्ढे में रखे गए हैं. जब तक शिनाख्त नहीं हो जाती तब तक उनको डीएनए पहचान संख्या दी गई है. अधिकारी बताते हैं, ऐसा इसलिए कि रिश्तेदार बाद में अगर चाहें तो इन अवशेषों पर दावा कर सकते हैं.
राज्य के वित्त मंत्री के.एन. बालगोपाल ने इंडिया टुडे को बताया, "हम केरल के इतिहास में महादुखद और तबाही के पलों से गुजर रहे हैं. वायनाड में दो गांव कब्रगाह में तब्दील हो गए हैं. पहली प्राथमिकता तलाशी और बचाव अभियान जारी रखने की है. साथ ही हम लोगों की मदद से पीड़ितों के व्यापक पुनर्वास की योजना बना रहे हैं." मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष (सीएमडीआरएफ) को दान के रूप में 500 करोड़ रु. से अधिक पहले ही मिल चुके हैं. विस्तृत वैज्ञानिक योजना तैयार की जा रही है ताकि पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों की बसावटों में भविष्य में किसी भी तरह की आपदा को टाला जा सके.
तलाशी अभियान का आधार शिविर चूरलमाला है. प्रभावित क्षेत्र को 7 जोन में बांटा गया है और 1,700 लोगों की बचाव और राहत टीम तलाशी अभियान चला रही है. इन टीमों में राष्ट्रीय आपदा त्वरित बल (एनडीआरएफ), सेना, केरल पुलिस, दमकल और बचाव विभाग, डॉग स्क्वाड, वन विभाग और करीब 900 स्वयंसेवक शामिल हैं. चेलियार नदी के तटों पर भी तलाशी अभियान जारी है. यह नदी चूरलमाला से 40 किलोमीटर दूर है, जहां 76 शव और 180 शवों के अंग बरामद किए गए हैं. बचाव अभियानों में एक बड़ी चुनौती चूरलमाला और मुंडाक्की गांव के बीच संपर्क का टूट जाना था. भूस्खलन ने कंक्रीट के पुल को बहा दिया लेकिन मेजर जनरल वी.टी. मैथ्यू की अगुआई में सेना की टीम ने दो दिन से भी कम में 190 फुट का बेली ब्रिज चालू कर दिया.
मुंडाक्की के ऊपरी क्षेत्रों में कोई 400 लोग रहते थे. उनमें से 50 से भी कम लोग बचे हैं. बचाव टीमों ने अभी तक दूरदराज के इलाकों में फंसे 500 से अधिक लोगों को बचाया है. राज्य से करीब 4,000 वॉलंटियर राहत कार्य में हिस्सा ले चुके हैं. एडीजीपी (कानून-व्यवस्था) एम.आर. अजितकुमार कहते हैं, "करीब 1,400 पुलिसकर्मी भी दिन-रात काम में जुटे हैं."
राज्य को झकझोरने वाली पिछली आपदाओं की तरह इस त्रासदी के प्रति केरल ने बड़ी मजबूती दिखाई है. चूरलमाला में जिंदा बचे लोगों ने बचाव और राहत अभियान से जुड़ी टीमों के लिए अपने घर और रसोई को खोल दिया है. कई अनजान ग्रामीण हीरो के रूप में उभरे हैं जिन्होंने वक्त पर मदद मुहैया कराई. मुंडाक्की में पार्ट टाइम आशा कार्यकर्ता और गृहणी शैजा बेबी मृतकों की पहचान में मददगार के रूप में डाटा बैंक जैसी बनकर उभरी हैं. शैजा कहती हैं, "मैं जो कर सकती हूं, कर रही हूं. मैं लगभग हर उस व्यक्ति को जानती थी जो मुंडाक्की और चूरलमाला में रहता था क्योंकि मैं पहले कदंबश्री और वार्ड मेंबर रही हूं और मेप्पादि पंचायत में उपाध्यक्ष का कार्यकाल भी पूरा किया है." शैजा अभी मेप्पादि फैमिली हेल्थ केयर सेंटर में तैनात हैं जहां मृतकों को शिनाख्त के लिए रखा गया है.
45 वर्षीया विधवा और दो बच्चों की मां शैजा मुंडाक्की की रहने वाली हैं जो अपने घर के पास 2020 में हुए भूस्खलन के बाद मेप्पादि में शिफ्ट हो गई थीं. वे कहती हैं कि वे बस इतना ही कर पा रही हैं. कुछ साल पहले यूएई में उनके पति की मृत्यु के बाद स्थानीय लोगों ने उनकी बहुत मदद की थी. अभी तक उन्होंने चूरलमाला और मुंडाक्की में 100 से अधिक शवों की पहचान में मदद की है.
जिंदा बचे लोगों के लिए तो और भी बुरा हुआ है. कलातिंगल नौफल ओमान से आए तो पता चला कि उनके परिवार के 11 सदस्यों की जान चली गई है, जिनमें उनके माता-पिता, पत्नी सजना और तीन बच्चे शामिल हैं. उनमें पांच के शव बरामद किए गए हैं, छह अन्य को लापता की सूची में बताया गया है. मुंडाक्की में उनके घर में एक विशाल चट्टान के साथ अब सिर्फ तहखाना भर बचा है. मेप्पादि पंचायत अध्यक्ष के. बाबू कहते हैं, "हमारे पास कुछ नहीं बचा है. न घर, न कुछ उगाने को जमीन और न ही पालने को जानवर. एक रात में हमारा गांव बर्बाद हो गया." बाबू का परिवार भाग्यशाली लोगों में से एक है. उनका घर मुंडाक्की में सबसे आखिर में था (पंचीरीमात्तोम के रास्ते पर) और उस रात भूस्खलन दूसरी तरफ हुआ.
राज्य के लिए एक और भारी चुनौती उस भयावह रात में बचे लोगों के पुनर्वास की है. उनमें से कई अभी भी सदमे में हैं, जिनमें सबसे ज्यादा प्रभावित अनाथ बच्चे हैं. राज्य सरकार ने फिलहाल काउंसलर नियुक्त किए हैं और हेल्पलाइन बनाई है. लेकिन उनके लिए एक लंबी अवधि की योजना बनानी होगी.
केरल 2017 के बाद से ही एक के बाद एक आपदाएं झेलता आ रहा है. उस समय ओखी चक्रवात से 100 से अधिक लोग मारे गए थे. 2018 और 2019 में निपाह वायरस और कोविड-19 के बाद भीषण बाढ़ आ गई जिसने लोगों की जान के साथ अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया. ताजा मामला भूस्खलनों का है जिन्होंने वायनाड में जिंदगी को बेहद दुश्वार बना दिया है.
और भी कई मुसीबतें मुंह बाए खड़ी हैं. आपदा के बीच केंद्र की नई मसौदा अधिसूचना आई है. इसमें पश्चिमी घाट के छह राज्यों की 56,800 वर्ग किलोमीटर भूमि को पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) घोषित किया गया है. इनमें 13 गांव वायनाड के हैं. राज्य के करीब 123 गांव, करीब 10 लाख की आबादी, 35 से 60 डिग्री ढलान वाले इलाके में रहते हैं. अगर अधिसूचना को मंजूरी मिल गई तो कुल मिलाकर राज्य के 9,983 वर्ग किलोमीटर—14 में से 13 जिलों—को ईएसए घोषित किया जा सकता है जिससे आबादी का 30 फीसद हिस्सा प्रभावित होगा.
मुंडाक्की में एक टूटा बिलबोर्ड कहता है, "रोज किसी सकारात्मक चीज की तलाश कीजिए, भले ही कुछ दिन आपको थोड़ी मुश्किलों में बिताने पड़ें." किसी को नहीं पता यह लाइन किसने लिखी, यह भी नहीं पता कि वह जिंदा है या नहीं, लेकिन यह अब पेशनगोई जैसी लगती है. केरल को आने वाले दिनों में वास्तविक मुश्किलों से जूझना पड़ेगा. इनका कोई आसान जवाब नहीं है.

