राजनैतिक जीवन में हर चीज को संतुलित रखने की जरूरत होती है. भले ही हर मोर्चे पर ऐसा संभव न हो पाया हो लेकिन भजन लाल शर्मा ने अपनी सामान्य दिनचर्या में खास देशज अंदाज कायम रखा है—सूर्योदय के साथ ही उठना, फिर अपने विशाल लॉन में थोड़ी देर टहलना, जहां उन्हें अक्सर अपनी दो गायों की सेवा करते देखा जाता है. इसके बाद दिनभर की राजनैतिक व्यस्तता के बीच सादा, घर का बना शाकाहारी भोजन करना.
वे अमूमन रात का भोजन जल्दी करने के आदी हैं लेकिन बैठकों की व्यस्तता की वजह से उन्हें कभी-कभी इसमें देर हो जाती है और कई बार तो ज्यादा देर होने पर वे रात का भोजन नहीं कर पाते. उन्हें आज भी याद है कि अपनी मौज-मस्ती वाली युवावस्था के दौरान उन्हें खाने का कितना शौक हुआ करता था. एक बार तो एक विवाह समारोह में बिना पानी पिए दो दर्जन से ज्यादा लड्डू खाकर शर्त भी जीती थी.
दिसंबर 2023 में जब राजस्थान के मुख्यमंत्री पद के लिए एकदम तंबोला स्टाइल में उनका नाम घोषित किया गया तो यह बात बहुत लोगों को हजम नहीं हुई. शर्मा दौड़ में कहीं थे ही नहीं: पहली बार विधायक बना सियासी गलियारों का एक अनजाना-सा चेहरा अचानक एक शीर्ष पद पर आसीन होने जा रहा था. शर्मा ने जैसा इंडिया टुडे के साथ बातचीत में माना कि खुशी के उन पलों के साथ ही उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि राजनीति कैसी 'दोधारी तलवार' हो सकती है.
बहरहाल, उन्हें सबसे ज्यादा दुख तो उस वक्त हुआ जब आम चुनाव में भाजपा ने राज्य की 25 में से 11 सीटें गंवा दीं. शर्मा अभी तक इस पीड़ा से पूरी तरह उबरे नहीं हैं और इससे पल्ला झाड़ने के लिए कोई बहाना भी नहीं गढ़ते. उनके सहयोगी बताते हैं कि 4 जून को नतीजे आने के कई दिनों बाद तक हावभाव से पता चलता था कि उन्होंने इसे निजी नाकामी के तौर पर लिया है. भले ही उम्मीदवारों के चयन या चुनाव अभियान की रणनीति तय करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी. भरतपुर जिले में एक साधारण प्रशासनिक पद पर रहने के दौरान उनका जीवन काफी सरल रहा था. अपने गांव अटारी के सरपंच के तौर पर काम करना उनका आखिरी प्रशासनिक पद था.
हालांकि, राज्य इकाई के उपाध्यक्ष और महासचिव के तौर पर काम करने के बावजूद राजनीति के मैदान में वे एक अनजान चेहरा ही थे. ऐसे में जब उन्हें जयपुर से ही लगे ब्लॉक-प्रिंटिंग की राजधानी सांगानेर से विधानसभा चुनाव मैदान में उतारा गया तो लोगों को एकदम अप्रत्याशित लगना स्वाभाविक ही था. सबसे बड़ी बात, खुद भजनलाल ने भी सपने तक में नहीं सोचा था कि राजा-रजवाड़ों के शहर में उनका भी राज्याभिषेक हो सकता है. लेकिन शीर्ष पर पहुंचने के साथ हर कदम पर अलग ही तरह की चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं. भजन लाल भले ही खुलकर कुछ भी न बोलें लेकिन चेहरे के भाव बताते हैं कि भगवा पार्टी की अंदरूनी राजनीति ने कहीं न कहीं उन्हें आहत किया है.
लेकिन शर्मा को इस सबसे उबरने में ज्यादा समय नहीं लगा. खासकर इसलिए भी क्योंकि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूरी दृढ़ता के साथ उनके समर्थन में खड़ा था. वैसे भी आलाकमान ने उन्हें चुनकर कम से कम छह दिग्गजों को निराश किया था और इतना बड़ा दांव लगाने के बाद पार्टी इतनी जल्द पीछे नहीं हट सकती थी. वैसे, दोनों चुनाव नतीजों में एक बड़ा फर्क नजर आता है लेकिन विधानसभा चुनावों में पड़े वोटों का भौगोलिक स्थिति के आधार पर आकलन करें तो लोकसभा चुनाव में जीत-हार का नक्शा उसके अनुरूप ही लगता है.
दिसंबर में विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत, गुजरात या मध्य प्रदेश जैसी एकतरफा नहीं थी. इसलिए शर्मा को इसके लिए जवाबदेह ठहराने के बजाए पार्टी ने सी.पी. जोशी को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाना बेहतर समझा. राज्य इकाई के नए प्रमुख मदन राठौड़ भी लो-प्रोफाइल वाले नेता हैं. दरअसल, किसी महत्वाकांक्षी नेता को आगे करके पार्टी आलाकमान सत्ता का एक और केंद्र स्थापित नहीं करना चाहता.
दांव लंबी दूरी का?
शर्मा को प्रशासनिक बारीकियों को समझने और काम करने के लिए यकीनन ज्यादा वक्त दिया गया है. बतौर मुख्यमंत्री उनके आठ माह के कार्यकाल में तीन महीने तो आदर्श आचार संहिता के कारण किसी काम के नहीं रहे. यही नहीं, उनके मंत्रिमंडल का एक बड़ा हिस्सा भी ऐसा है जो मंत्री पद की जिम्मेदारियां सीख-समझ रहा है. उनके अधिकांश मंत्री नौसिखिए हैं, जो कभी-कभी तो विधानसभा में सवालों के जवाब देते समय भी अटक जाते हैं. आलाकमान ने उनके जैसे नए चेहरे को चुनकर गलती की है, इस धारणा को दूर करने का सारा दारोमदार शर्मा पर ही है. खासकर ऐसी स्थिति में जब विपक्ष ही नहीं बल्कि खुद उनकी अपनी पार्टी के नेता उन्हें गलत विकल्प बताने पर तुले हों.
लब्बोलुबाब यह कि लोगों ने ज्यादा अपेक्षाएं नहीं लगा रखी हैं. उन्हें लगता है कि साधारण अतीत को देखते हुए नीतियों को लेकर शर्मा की सोच-समझ का दायरा भी सीमित ही होगा. लेकिन शासन व्यवस्था के भीतर अनमने ही सही यह स्वीकारा जाना लगा है कि स्थिति इसके उलट भी हो सकती है. वैचारिक स्तर पर देखें तो नए मुख्यमंत्री के पास नए और बड़े विचारों की कमी नजर नहीं आती. एक अधिकारी के मुताबिक, "मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्होंने जयपुर पर बोझ घटाने के लिए नोएडा जैसे सैटेलाइट शहर विकसित करने का सुझाव दिया. वे इसके लिए फ्लाइओवर, एलिवेटेड रोड और मेट्रो के बड़े नेटवर्क की घोषणा पहले ही कर चुके हैं."
केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा शासित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ उनकी बैठकों के बारे में जानकारी रखने वाले नौकरशाह बताते हैं कि मुख्यमंत्री इनसे कुछ न कुछ ऐसा हासिल करने में सफल ही रहते हैं जो राज्य के हित में हो. इसमें अतिरिक्त पानी के लिए हरियाणा और मध्य प्रदेश के साथ करार, कोयले के लिए छत्तीसगढ़ के साथ समझौता, और अतिरिक्त बिजली के लिए केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय से मंजूरी हासिल करना शामिल है. लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने की वजह से वे ऐसे स्तर पर पहचान और पहुंच रखते हैं, जिसका बाहर से लोगों को अंदाजा ही नहीं लगता. आमतौर पर शर्मा अपने साधारण व्यक्तित्व की वजह से खुद को राज्य के दिग्गजों में शुमार नहीं करा पाए हैं. लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
शर्मा की कार्यशैली और व्यक्तित्व के बारे में उनके करीबी संपर्क में रहने वाले नौकरशाहों के अलावा कैबिनेट सदस्यों और विधायकों से भी पता चलता है. इस पर लगभग सभी एकराय हैं कि वे बीती बातें छोड़कर आगे चलने में विश्वास रखते हैं और पिछली सरकार की नीतियों पर किसी तरह का पूर्वाग्रह नहीं रखते. हालांकि, अभी अनुभव की कमी झलकती तो है लेकिन स्पष्ट तौर पर पहले की तुलना में काफी सुधार हुआ है, और वे अधिकारियों से तकनीकी बातें सीखने में कतराते नहीं हैं, खासकर वित्त से जुड़े मामलों में.
एक वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, "शुरू में हमें थोड़ा अजीब लगा कि वे साधारण फाइलों को निबटाने में इतना समय क्यों लगाते हैं. अब हम देखते हैं कि वे चीजों को समझना चाहते हैं. यह अच्छी बात है क्योंकि एक अनुभवहीन मुख्यमंत्री अक्सर नौकरशाहों के मनमाफिक काम करने को तैयार रहता है. ऐसे अफसर कई बार आप से फाइलों पर ऐसी नोटिंग के साथ हस्ताक्षर करा लेंगे, जिसका आपको बाद में पछतावा हो सकता है."
अधिकारी भी हर कदम सावधानी से बढ़ा रहे हैं. भैरोंसिंह शेखावत के कार्यकाल में करियर शुरू करने वाले करीब आधा दर्जन वरिष्ठ नौकरशाहों को छोड़ दें तो पूरे प्रशासनिक अमले ने 1998 के बाद से सिर्फ दो मुख्यमंत्रियों का शासन ही देखा है—अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे. उनकी पसंद-नापसंद जगजाहिर थी. शर्मा की पसंद-नापसंद के बारे में उन्हें अभी कुछ पता नहीं. एक अधिकारी कहते हैं, "हमें यह बात दिलचस्प लगी कि मुख्यमंत्री हमें एक राजनेता की तरह संबोधित कर रहे हैं."
भाषण देने की उनकी कला बदस्तूर कायम है, यहां तक कि विपक्ष ने भी विधानसभा में उनके दो भाषणों की सराहना की है. लेकिन शर्मा प्रशासन के माध्यम से अपने कामकाज को आगे बढ़ाने का रास्ता निकालने में जुटे हैं. वे अगर शहर में होते हैं तो लगभग हर दिन नियमित रूप से सिविल सचिवालय स्थित अपने कार्यालय में मिलते हैं, जबकि उनके पूर्ववर्ती ज्यादातर समय अपने आवास से ही काम करते थे.
सियासत की बारूदी सुरंग
उन मंत्रियों और विधायकों के साथ रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर पाना भी खासा मुश्किल हो गया है, जिनसे वे पहले पार्टी में अपनी अपेक्षाकृत कम अहमियत वाले कार्यकर्ता भाव से मिला करते थे. वे लोग अब भी उनसे उतनी ही सुलभता और गर्मजोशी से मिलने की उम्मीद करते हैं, साथी की ही तरह व्यवहार करने की कोशिश करते हैं और इसका इस्तेमाल अपने लिए कई चीजों में रियायत मांगने के तौर पर भी करते हैं.
शर्मा उनसे फाइलों के बारे में सवाल करते हैं. कुछ से तो उन्होंने अपना लवाजमा और तामझाम कम करने को कहा और बताया कि कैसे उन्होंने सिविल लाइंस के अपने सरकारी आवास पर खुद को नई साज-सज्जा में खपाने के बजाए पुराना फर्नीचर बनाए रखा. देर रात यात्रा के लिए वे पायलट पर खर्च करना पसंद नहीं करते. शर्मा कहते हैं, "पूरी जिंदगी मैंने ज्यादातर रात को सड़क या रेल से यात्रा की. तो अब मैं क्यों नहीं कर सकता भला?"
विपक्ष, जो राजे के दोनों कार्यकालों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत है, कसीदे पढ़ने की हड़बड़ी के मूड में नहीं है. नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली कहते हैं: "वे अच्छे इंसान लेकिन कमजोर प्रशासक हैं." शर्मा इस आकलन को मुस्कराकर अनदेखा कर देते हैं. राजे युग के नेता और 2003 से ही मंत्री रहे गजेंद्र सिंह खींवसर, जो स्वास्थ्य मंत्री हैं और मुख्यमंत्री के विभागों से जुड़े ज्यादातर सवालों के जवाब देते हैं, ऐसे तमाम घिसे-पिटे सवालों का जवाब आगे बढ़कर देते हैं.
वे कहते हैं, "मुख्यमंत्री तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं और इस धारणा को तोड़ना चाहते हैं कि सरकार कुछ नहीं कर रही." कुछ और साथी भी तस्दीक करते हैं कि मूलत: वे अच्छे इंसान हैं और एक चेतावनी भी जोड़ देते हैं: "सत्ता लोगों का स्वभाव बदल देती है, इसका उन पर क्या असर पड़ता है, यह देखने के लिए इंतजार करना होगा." शर्मा हंसते हुए जवाब देते हैं कि ऐसे बदलाव की कोई संभावना नहीं. उनके शुरुआती दिनों में कहा जाता था कि 'कुर्सी सब सिखा देती है.' उन्होंने अभी तक सियासी शातिरपने का प्रदर्शन नहीं किया है, पर इशारे तो यही हैं कि वे तेजी से सीख रहे हैं.
राजस्थान भाजपा में यह शायद विलासिता नहीं बल्कि जरूरत हो सकती है. जूली इसके बारे में बात करना पसंद करते हैं—खासकर दुश्मन के खेमे में गफलत पैदा करने की गरज से. वे जनवरी की शुरुआत में ही इस चर्चा को हवा देने लगे थे कि नए मुख्यमंत्री को अस्थिर करने के लिए भाजपा के बड़े नेता लोकसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को नुक्सान पहुंचाने में जुटे हैं. उन्होंने बजट सत्र के दौरान कहा कि कुछ नेता शर्मा को समाप्त करने पर आमादा हैं, आधा दर्जन मंत्रियों को हटाया जा सकता है, और लोग उपमुख्यमंत्री दिव्या कुमारी के साथ उनके मतभेदों के बारे में बात कर रहे हैं. इंडिया टुडे के पूछने पर दीया कुमारी ने किसी भी परेशानी से साफ इनकार किया.
मगर नाफरमानी की आशंका कहीं और मंडरा रही है. मंत्री और बड़े अफसरशाहों ने अहम तबादलों में मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को कई दफा अनदेखा कर दिया. शर्मा ने पलटवार किया और सिंचाई विभाग में तबादले के आदेश बदलते हुए पीडब्ल्यूडी के प्रमुख को हटा दिया. फिर भी वे सीधे टकराव से बच रहे हैं. यह एहतियात खुद-ब-खुद हो सकती है या आलाकमान की ताकीद का नतीजा भी. दिल्ली में बैठे हुक्मरान चौकस नजर तो पक्का रख ही रहे हैं. इसी वजह से शर्मा ने मंत्रियों को पसंद के सचिव चुनने की मंजूरी न देकर उनकी नाराजगी मोल ली. ऐसी छूट दे दी जाती तो उसका हश्र ज्यादातर अपनी जाति के लोगों पर मेहरबानी में होता. खुद मुख्यमंत्री ने अपने पसंदीदा मंत्री और अफसर नहीं तैयार नहीं किए, हालांकि कभी-कभार वे पुराने परिचितों पर भरोसा जरूर करते हैं.
एक और पेचीदा मामले में भी उनके नजरिए में तार्किक और विवेकसम्मत नाप-तौल दिखती है. वे राजे या गहलोत के पीछे नहीं पड़े. इसके बजाए वे दो बार उनके घर गए. अपनी अदावत की वजह से दोनों ने दशक भर से ज्यादा एक दूसरे से बात तक नहीं की थी. दरअसल, कुछ का तो कहना है कि राजे को जरा भी नहीं बख्शा जाता अगर शर्मा की जगह उनके किसी कट्टर प्रतिद्वंद्वी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली होती. जहां तक गहलोत के जमाने के कथित घोटालों की बात है, शर्मा का कहना है कि वे ''किसी को नहीं बख्शेंगे, चाहे वह कोई भी हो''. लेकिन खोज-खोजकर लोगों को प्रताड़ित करने की तरफ उनका झुकाव नहीं है. एक अधिकारी कहते हैं, "कभी-कभी शिकायत मिलने पर वे दोषी व्यक्ति को ठीक करने को कहते हैं, पर जब हम मामले की फाइल सामने रखते हैं, तो ठोस सबूत नहीं होने पर वे अक्सर रफा-दफा कर देते हैं."
यही संयम अफसरशाही से निबटने के तरीके में भी दिखता है. एक तबका इसलिए नाराज है कि उन्होंने कांग्रेस की हुकूमत में मलाईदार ओहदे पाने वाले अफसरों को दरकिनार नहीं किया, जैसे अतिरिक्त मुख्य सचिव, वित्त अखिल अरोड़ा और जयपुर के पुलिस कमिश्नर बीजू जोसफ. जाहिर है उन्होंने सामूहिक तबादले नहीं करने की मोदी की सलाह को संजीदगी से लिया है. उनसे कहा गया है कि अफसर किसी पार्टी के नहीं होते और उन्हें अपनी मर्जी के मुताबिक चलाना राजनैतिक आकाओं पर है.
दिल्ली के हाथों में हाथ
इसका सबसे बड़ा संकेत हैं मुख्य सचिव सुधांश पंत. बताते हैं उन्हें सुस्ती और काहिली के लिए कुख्यात राज्य प्रशासन में जोश भरने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना. यह काहिली पूरे तंत्र में इस कदर व्याप्त है कि राजस्थान को पिछड़े राज्यों में भी सुस्त रफ्तार से चलने वाला राज्य बनाए रखती है. पंत ने औचक दौरे किए और तैनातियों में अपनी बात मनवाई, इस तरह उस पद की हैसियत बहाल की जो बीते दशकों में सीएमओ की छाया में दबकर रह गया था. इसे लेकर शर्मा पर तंज कसने वालों में गहलोत भी थे, जिन्होंने कहा कि सरकार तो असल में पंत ही चला रहे हैं. ऐसे में कुछ लोगों ने लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन तक के लिए पंत को दोषी ठहराया.
इसी आलोचना ने शर्मा को सीएमओ को मजबूत करने के लिए उकसाया. इस हफ्ते उन्होंने अपने दो सिपहसालारों—अतिरिक्त मुख्य सचिव शिखर अग्रवाल और प्रमुख सचिव आलोक गुप्ता—में काम का बंटवारा कर दिया. गुप्ता आरएसएस की तरफ से आई सिफारिशों को भी देखते हैं.
शर्मा का दावा है कि भाजपा के चुनावी वादों में से आधे से ज्यादा पूरे किए जा चुके हैं. मसलन प्रश्नपत्र माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और कुछ गैंगस्टरों पर तगड़ी चोट. पर बाकी आधे पूरे करने में पसीना आ सकता है. उन्हें 70,947 करोड़ रु. का वित्तीय घाटा विरासत में मिला है. इसे ठिकाने लगाने का अगर कोई फार्मूला उन्होंने खोजा है तो वह अभी रहस्य ही है. उससे भी बढ़कर 91,000 करोड़ रु. बिजली कंपनियों का बकाया है. गर्मियों में भारी बिजली कटौती के संदर्भ में इसे याद करने पर और भी पसीना छूट जाता है. पर भरतपुर के इस वासी के लिए भक्तिभाव और समर्पण एक सहारा है. कृष्ण भजन और गोवर्धन परिक्रमा. हालांकि अब वे महीने में एक ही बार जा पा रहे हैं. ब्राह्मण किसान के इस पुत्र को अब शासन के मोर्चे पर भी चमत्कार की उम्मीद होगी.
खेमे के सिरदर्द
> किरोड़ीलाल मीणा ने 4 जून को कृषि मंत्री के पद से इस दावे के साथ इस्तीफा दे दिया कि पीएम ने जो सात लोकसभा सीटें जिताने का उन्हें जिम्मा सौंपा था, उन पर हार का यह पश्चाताप है
> उन्हें उपमुख्यमंत्री पद, खास मंत्रालय और तबादलों में तवज्जो देने से वंचित कर दिया गया था
> इस्तीफा मंजूर न होने के बावजूद मीणा न दफ्तर जा रहे न ही विधानसभा
> शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के विवादों को आगे आकर संभालना पड़ा
> दिलावर ने अंग्रेजी माध्यम के खिलाफ रुख अपनाकर और एक आदिवासी नेता पर डीएनए टेस्ट का तंज करके विवाद खड़ा कर दिया था

