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साइकिल पर पीडीए को बिठा अखिलेश कितना नाप पाएंगे सोशल इंजीनियरिंग का रास्ता?

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने यूपी विधानमंडल से संसद तक अपने नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर पार्टी के पीडीए नारे को और व्यापक बनाने की कोशिश की. उनके इस सोशल इंजीनियरिंग की दांव की काट खोजने में भाजपा को अपने पत्ते कई बार फेंटने होंगे

सपा प्रमुख अखिलेश यादव अयोध्या से पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद के साथ
सपा प्रमुख अखिलेश यादव अयोध्या से पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद के साथ
अपडेटेड 23 अगस्त , 2024

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 12 जून को करहल विधानसभा सीट से विधायक और यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उत्तर भारतीयों के सबसे मनोरंजक कार्यों की लिस्ट में सबसे ऊपर आने वाला काम किया जाने लगा, कयासबाजी. पदों की ऐसी रेस में अक्सर जीतते-जीतते चूक जाने वाले चाचा शिवपाल यादव का नाम हमेशा की तरह सबसे आगे दिखाई दे रहा था.

शिवपाल सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के दौरान नेता प्रतिपक्ष थे. इसके अलावा, इंद्रजीत सरोज और तूफानी सरोज, रामअचल राजभर, महबूब अली और माता प्रसाद पांडेय जैसे अनुभवी नेताओं के नाम पर पार्टी के भीतर लामबंदी भी शुरू हुई. इधर, 29 जुलाई से यूपी विधानमंडल के मॉनसून सत्र की घोषणा के साथ ही नेता प्रतिपक्ष के नाम की उलटी गिनती भी शुरू हो गई थी.

इसी बीच 22 जुलाई को अखिलेश ने आजमगढ़ के रहने वाले और शिक्षक राजनीति में माहिर पार्टी के एमएलसी लाल बिहारी यादव को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सौंप दी. यादव नेता को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाने के बाद से ऐसी भी अटकलें थीं कि अब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की अपनी कुर्सी अखिलेश किसी यादव नेता को नहीं सौंपेंगे. इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष की रेस में शिवपाल यादव के लिए फिनिशिंग लाइन अनंत में समाने लगी. हालांकि पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव के लिए पार्टी के किसी दूसरे नेता को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सौंपना भी आसान निर्णय नहीं था.

यह दिखा भी जब 28 जुलाई को अखिलेश ने लखनऊ स्थित पार्टी कार्यालय में सपा विधानमंडल दल की बैठक बुलाई. बैठक में इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर जैसे नेताओं का नाम नेता प्रतिपक्ष के लिए रखा गया लेकिन किसी भी नाम पर पार्टी के नेता पूरी तरह से सहमत नहीं थे.

लोकसभा चुनाव में सपा को पासी-दलित बिरादरी का खासा वोट मिला था. इस लिहाज से मंझनपुर से विधायक इंद्रजीत सरोज का नाम नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में सबसे आगे था लेकिन बैठक में मौजूद नेताओं ने उनके बेटे पुष्पेंद्र सरोज के कौशांबी से सांसद बनने का हवाला देकर कुछ आपत्ति भी जताई. ऐसे में कोई निर्णय न हो पाने पर नेताओं ने विधानसभा में विपक्ष का नेता और मुख्य सचेतक समेत अन्य को मनोनीत करने के लिए अखिलेश को ही अधिकृत किया.

विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडेय

सपा कार्यालय में बैठक के कुछ देर बात अखिलेश ने दो बार विधानसभा अध्यक्ष रह चुके 82 वर्षीय माता प्रसाद पांडेय को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष का नेता मनोनीत कर दिया. सिद्धार्थनगर जिले के पिरैला गांव में 31 दिसंबर, 1942 को जन्मे पांडेय 1974 में इटवा विधानसभा से पहली बार चुनाव लड़े थे लेकिन सफलता नहीं मिली. छह साल बाद उन्होंने 1980 में विधानसभा पहुंचने में कामयाबी हासिल की. उसके बाद वहां की जनता ने उन्हें 1985 और 1989 में फिर अपनी नुमाइंदगी का मौका दिया.

लेकिन अगले तीन चुनाव उनके पक्ष में नहीं गए. 1991, 1993 और 1996 तीन विधानसभा चुनावों में वे लगातार हारे. उसके बाद फिर 2002 में उन्हें जीत नसीब हुई और यह सिलसिला 2012 तक जारी रहा. 2017 के विधानसभा चुनाव में फिर उन्हें शिकस्त मिली लेकिन 2022 में जीत कर सातवीं बार विधानसभा पहुंचे. मुलायम सिंह यादव के बेहद नजदीकी नेताओं में शुमार रहे पांडेय 1989 में जनता दल की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे और 2003 में सपा सरकार में श्रम और सेवायोजन मंत्री का भी ओहदा संभाला. पांडेय 2004 से 2007 और उसके बाद 2012 से 2017 तक सपा सरकार में दो बार विधानसभा अध्यक्ष भी रहे.

राजनीति में ऐसे व्यापक अनुभव वाले पांडेय अब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अखिलेश यादव की जगह लेंगे, जिन्होंने लोकसभा में कन्नौज का प्रतिनिधित्व करने के लिए करहल विधानसभा सीट खाली करने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. माना जा रहा है कि सपा के रणनीतिकारों ने कई कारणों से पांडेय को चुना है. सबसे पहले, सदन में पौने तीन सौ सीट संख्या वाले सत्तारूढ़ दल का मुकाबला करने के लिए पार्टी एक अनुभवी और जानकार विधायक चाहती थी, जिसे विधानसभा के नियमों और मानदंडों की समझ हो. उस लिहाज से पांडेय इस पद के लिए उपयुक्त थे.

सात बार के विधायक पांडेय ने विधानसभा अध्यक्ष के रूप में भी दो कार्यकाल पूरे किए, एक बार मुलायम सरकार के तहत 2004 से 2007 तक और फिर 2012 से 2017 तक जब अखिलेश यूपी के मुख्यमंत्री थे. दूसरे, पार्टी ऐसे उम्मीदवार की तलाश में थी, जिसे विधायकों और सदन का सम्मान हासिल हो. इस लिहाज से पांडेय का विधानसभा अध्यक्ष का कार्यकाल सबसे अच्छा था तब उन्होंने पार्टी विधायकों के साथ विपक्षी विधायकों के साथ भी बेहतर सामंजस्य कायम करने की अपनी क्षमता का परिचय दिया था.

तीसरा, पार्टी नेता प्रतिपक्ष की तैनाती को लेकर किसी भी प्रकार के विवाद से बचना चाहती थी. ऐसे में अखिलेश अगर चाचा शिवपाल को यह कुर्सी सौंपते तो भाजपा के हाथ एक मुद्दा लग जाता. भाजपा लोकसभा चुनावों में यादव परिवार के पांच सदस्यों को मैदान में उतारने के लिए 'वंशवाद की राजनीति' को लेकर सपा पर निशाना साध रही थी और शिवपाल के नामांकन से भगवा ब्रिगेड को नया हथियार मिल जाता.

शुरुआत में पार्टी नेता प्रतिपक्ष के रूप में मुस्लिम उम्मीदवार पर भी विचार कर रही थी, लेकिन रणनीति के तौर पर इस विचार को छोड़ दिया गया. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मत था कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में मुस्लिम उम्मीदवार से भाजपा को 'फायदा' होगा.

राजनैतिक विश्लेषक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर विनम्र वीर सिंह बताते हैं, ''माता प्रसाद पांडेय के चयन से सपा को एक अतिरिक्त लाभ यह हुआ है कि इससे पार्टी को यह साबित करने में मदद मिली है कि वह ऊंची जाति के खिलाफ नहीं है, भले पार्टी का 'पीडीए' नारा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों की बात करता है. हालांकि लोकसभा चुनाव से पहले सपा ने पीडीए में 'ए' के घटक के रूप में अगड़ी जाति को शामिल किया था.''

पांडेय से पहले ऊंचाहार (रायबरेली) से सपा के विधायक मनोज पांडेय विधानसभा में ब्राह्मण राजनीति का चेहरा थे. अखिलेश ने उन्हें मुख्य सचेतक नियुक्त किया था, लेकिन मनोज ने फरवरी में राज्यसभा चुनाव के दौरान बगावत कर भाजपा उम्मीदवारों को वोट दिया था. माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद पर नियुक्त करने के पीछे पार्टी का उद्देश्य भाजपा में शामिल होने वाले सपा विधायकों मनोज पांडेय, अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह और विनोद चतुर्वेदी की बगावत की वजह से उच्च जाति के कैडर और मतदाताओं के बीच पैदा हुई किसी भी गलतफहमी को दूर करना है.

अब माता प्रसाद पांडेय ही सपा का ब्राह्मण चेहरा हैं. उनकी नियुक्ति के साथ सपा प्रदेश की भाजपा सरकार से ब्राह्मणों के असंतोष को भी हवा देना चाहती है. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव एक ओर ब्राह्मण के रूप में पार्टी के लिए नया जनाधार तलाश रहे हैं तो लोकसभा चुनाव में मिले पासी-दलित जाति के समर्थन को और पुख्ता करना चाहते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने पासी जाति के पांच उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और वे सभी चुनाव जीतकर सांसद बने थे.

उन्हीं में से अयोध्या को समाहित करने वाली फैजाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा को हराकर सांसद बने अवधेश प्रसाद सपा का दलित चेहरा बनकर उभरे हैं. लोकसभा चुनाव के बाद 24 जून को नई लोकसभा की कार्यवाही के पहले दिन अखिलेश यादव जब संसद की सीढ़ियां चढ़ रहे थे तो उनके एक हाथ में संविधान की प्रति थी और दूसरे हाथ में अवधेश प्रसाद का हाथ. इसके बाद से लोकसभा की हर कार्यवाही में अखिलेश यादव ने सदन के भीतर अवधेश प्रसाद को अग्रिम पंक्ति में अपनी बगल ही बिठाए रखा.

नौ बार विधायक और छह बार राज्य सरकार में मंत्री रहे अवधेश प्रसाद को तवज्जो देकर अखिलेश ने भाजपा का समर्थन करने वाली पासी-दलित जाति को पूरी तरह साइकिल की ओर खींचने की रणनीति अपनाई है. इसीलिए लोकसभा में उपाध्यक्ष पद के लिए अखिलेश ने अवधेश प्रसाद का नाम आगे बढ़ाया था. संसद सत्र के बीच में जुलाई के अंतिम हफ्ते में अखिलेश ने अवधेश प्रसाद को लोकसभा के अधिष्ठाता मंडल में जगह दिलाकर पीडीए की रणनीति को पुख्ता करने की कोशिश की.

अखिलेश ने सपा संसदीय दल के मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी अपने चचेरे भाई और आजमगढ़ से सांसद धर्मेंद्र यादव को सौंपकर पूर्वांचल के यादव मतदाताओं से सीधा जुड़ाव भी जाहिर किया है. सपा सुप्रीमो ने एक और चौंकाने वाला निर्णय लिया जब उन्होंने पूर्व बसपा नेता और जौनपुर से सांसद बाबू सिंह कुशवाहा को सपा के संसदीय दल का उपनेता नियुक्त किया.

बसपा सरकार में हुए 'राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन' (एनआरएचएम) घोटाले के आरोपी कुशवाहा के 'दाग' को दरकिनार करके अखिलेश ने मौर्य-कुशवाहा बिरादरी को साधने की कोशिश की है. सपा की राज्य कार्यकारिणी के एक सदस्य बताते हैं, ''स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा से इस्तीफा देने के बाद सपा ने मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी बिरादरी में नया नेतृत्व पैदा करने के लिए बाबू सिंह कुशवाहा को जिम्मेदारी सौंपी है.''

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अखिलेश गैर यादव ओबीसी जातियों में साइकिल की पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. इसी क्रम में सपा ने किरण पाल कश्यप को विधान परिषद में मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी सौंपी है तो राकेश कुमार उर्फ डॉ. आर.के. वर्मा को विधानसभा में उप सचेतक बनाया गया है.

विनम्र वीर सिंह के शब्दों में, ''यूपी में भाजपा के उभार के पीछे गैर यादव ओबीसी जातियों मुख्यत: कुर्मी, मौर्य, कश्यप आदि का एकतरफा समर्थन था. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा समर्थक ओबीसी जातियों में बड़ी सेंध लगा दी है. अब सदन में इन जातियों के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी देकर सपा 2027 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी बढ़त बनाए रखना चाहती है.''

सपा ने अगर पिछड़े और दलित नेताओं को जिम्मेदारी देकर अपनी पीडीए रणनीति को धार दी है तो इसकी एक अहम कड़ी मुस्लिम बिरादरी भी है. अखिलेश ने मुरादाबाद की कांठ विधानसभा सीट से विधायक कमाल अख्तर को विधानसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक बनाया है. यही नहीं, अमरोहा सदर से सपा विधायक महबूब अली को अधिष्ठाता मंडल का सदस्य बनाया है. इस तरह पश्चिमी यूपी के मुस्लिम नेताओं को सदन में अहमियत देकर सपा आने वाले विधानसभा उपचुनाव में इस बिरादरी के एकतरफा समर्थन की उम्मीद में है.

बहरहाल, अखिलेश यादव ने सोशल इंजीनियरिंग का जो दांव चला है, भाजपा को उसकी काट खोजने में अपने पत्ते कई बार फेंटने होंगे.

सपा को नई पहचान देंगे ये नेता

लाल बिहारी यादव, 64 वर्ष 

2020 में हुए वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सपा के टिकट पर चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया था. विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी मिली है.

बाबू सिंह कुशवाहा, 58 वर्ष

सपा संसदीय दल के उपनेता. जौनपुर से सपा सांसद. कभी मायावती के करीबी थे, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में मौर्य-कुशवाहा वोटों में पकड़. एनआरएचएम घोटाले के आरोपी.

किरण पाल कश्यप, 68 वर्ष

विधान परिषद में सपा के मुख्य सचेतक, पश्चिमी यूपी के शामली जिला निवासी, कैराना लोकसभा सीट पर सपा को निषाद समाज का एकतरफा समर्थन दिलाने के सूत्रधार.

कमाल अख्तर, 51 वर्ष

- विधानसभा में सपा विधायक दल के मुख्य सचेतक बने. कांठ से सपा विधायक. 2004 में मुलायम सिंह यादव ने इन्हें सीधे राज्यसभा भेजकर राजनैतिक जीवन की शुरुआत कराई थी.

राकेश कुमार वर्मा, 49 वर्ष

विधानसभा में सपा दल के उप सचेतक, तीन बार के विधायक. प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा सीट जीतकर पहली बार यहां सपा का खाता खोला. कुर्मी बिरादरी में लोकप्रिय.

महबूब अली, 71 वर्ष

अमरोहा सदर सीट से सपा विधायक, पश्चिमी यूपी में मुसलमानों के बीच लोकप्रिय, 2002 से विधानसभा चुनाव जीत रहे. विधानसभा में अधिष्ठाता मंडल के सदस्य बने.

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