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मध्य प्रदेश में मंत्री की बगावत से बीजेपी को क्या मिला संदेश?

चौहान के बागी तेवर फिलहाल शांत हो गए हैं लेकिन इसने दलबदलुओं को मिल रही तरजीह के कारण बीजेपी के पुराने काडर के भीतर असंतोष और खींचतान को जाहिर कर दिया है

मध्य प्रदेश के मंत्री नागर सिंह चौहान
मध्य प्रदेश के मंत्री नागर सिंह चौहान
अपडेटेड 22 अगस्त , 2024

मध्य प्रदेश में एक मंत्री की हालिया बगावत फिलहाल भले ही दबा दी गई हो लेकिन इसने भाजपा को साफ कर दिया है कि पार्टी अगर अपने वफादार दिग्गजों की जगह दलबदलुओं को तरजीह देती रही तो उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है. मोहन यादव की कैबिनेट में 21 जुलाई को रामनिवास रावत के मंत्री के रूप में शपथ लेने के लगभग दो सप्ताह बाद हुई इस घटना ने पार्टी के कान खड़े कर दिए हैं.

छह बार के कांग्रेस विधायक रावत लोकसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा में शामिल हुए थे. उन्हें वन और पर्यावरण विभाग का मंत्री बनाया गया. यह उन्हें भाजपा के खाते में मुरैना लोकसभा सीट डालने के लिए किए गए उनके प्रयासों का पुरस्कार था, जहां पार्टी को कड़ी टक्कर मिल रही थी.

अगले ही दिन अलीराजपुर के प्रभावशाली आदिवासी नेता नागर सिंह चौहान ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया. नागर चार बार के भाजपा विधायक हैं और वे पहली बार मंत्री बने थे लेकिन उनसे महत्वपूर्ण वन और पर्यावरण विभाग छीन लिया गया और उनके पास केवल अनुसूचित जाति कल्याण विभाग रह गया. उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफे की धमकी दी कि वे खुद को आदिवासियों की भलाई के लिए पूरी क्षमता से और प्रभावी ढंग से काम करने में असमर्थ पाते हैं.

चौहान के खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त करने की घटना ने भाजपा नेतृत्व को चौंका दिया क्योंकि पिछले चार वर्षों में पार्टी प्रदेश में दलबदलुओं को लगातार पुरस्कृत करती आई है. चौहान को दिल्ली तलब किया गया. 23 जुलाई को उनकी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा और कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात हुई जिन्होंने उन्हें आश्वासन मिला कि उनकी शिकायतों को दूर किया जाएगा. उसी दिन चौहान अपनी सांसद पत्नी अनीता और बी.डी. शर्मा के साथ भोपाल पहुंचे और सीएम से मुलाकात की. कुछ घंटों तक चली बैठक के बाद उनके तेवर नरम पड़ गए. चौहान को मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल तक इंतजार करने के लिए कहा गया है जिसमें उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा जा सकता है.

चौहान की इस छोटी-सी बगावत से पार्टी तत्काल हरकत में आई. इसका बड़ा कारण यह है कि प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र अलीराजपुर में दो लोकसभा सीटें और 47 विधानसभा क्षेत्रों में से 21 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. बेशक चौहान के बागी तेवर फिलहाल शांत हो गए हैं लेकिन इसने दलबदलुओं को मिल रही तरजीह के कारण भाजपा के पुराने काडर के भीतर असंतोष और खींचतान को जाहिर कर दिया है.

मोहन यादव मंत्रिमंडल के 32 मंत्रियों में से छह कांग्रेस के दलबदलू हैं जो हाल ही में पार्टी में आए हैं. 2020 में जब कांग्रेस के 22 विधायकों ने दलबदल करके कमलनाथ सरकार को गिरा दिया था, तब उन 22 बागियों में से 14 को मंत्री पद देकर पुरस्कृत किया गया था. उस समय की परिस्थितियां कुछ अलग थीं क्योंकि तब भाजपा को अपनी सरकार बनाने के लिए बागियों के समर्थन की सख्त जरूरत थी. अभी भाजपा 230 सदस्यीय सदन में 164 विधायकों के साथ बहुत मजबूत स्थिति में है.

भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, जयंत मलैया और अर्चना चिटणीस सहित बड़ी संख्या में भाजपा के वरिष्ठ विधायकों को कैबिनेट पद से वंचित कर दिया गया है लेकिन दलबदलुओं को पुरस्कृत करने का सिलसिला जारी है. सूत्रों का कहना है कि अमरवाड़ा के पूर्व कांग्रेस विधायक कमलेश शाह, जो लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हुए थे, को कैबिनेट में शामिल किए जाने की संभावना है. ऐसा हुआ तो पुराने नेताओं के बीच नाराजगी बढ़ सकती है. शाह हाल ही हुए उपचुनाव में जीते हैं और चौहान प्रकरण के कारण उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने में कुछ महीनों की देरी हो सकती है.

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