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शहीद सैनिकों के किस नियम ने मां-बाप का निवाला छीना?

शहीदों के 'नेक्स्ट ऑफ किन' को मिलने वाले लाभ को लेकर बने नियमों पर छिड़ी बहस

जय सिंह और इंद्रमणी कैप्टन रितेश के माता-पिता
जय सिंह और इंद्रमणी कैप्टन रितेश के माता-पिता
अपडेटेड 15 अगस्त , 2024

करगिल शहीद दिवस, यानी बीती 26 जुलाई, 2024 की उमस भरी दुपहरी. करीब 12:30 बजे का वक्त. झुंझुनूं जिले के सीथल गांव के आखिरी छोर पर एक खेत से लगे शहीद मनीराम और उनके तीन भाइयों के घर हैं. 1999 के 'ऑपरेशन विजय' में अपने साहस, शौर्य और पराक्रम का परिचय देने वाले शहीद मनीराम के सबसे छोटे भाई रोहिताश्व के छह-सात कमरों वाले बंद घर में उनकी 90 वर्षीया मां चावली देवी बीमार पड़ी दिखती हैं.

इस बुजुर्ग महिला की चारपाई के नीचे बासी हो चला खाना रखा हुआ था जिसे देखकर पता चलता था कि किसी उपेक्षा के बजाय न खा पाने की मजबूरी के चलते इसमें से एक-दो निवाले से ज्यादा नहीं खाया गया है. घर में कोई भी नहीं था जो बीमार महिला को खाना खिला सके या तीमारदारी कर सके. करवट बदलतीं चावली देवी की फूलती सांसें मानो किसी अपने को पुकार रही थीं.

करगिल में 36 साल का जवान बेटा खोने वाली इस मां के दुख उसकी उम्र से भी बड़े हैं. वे लगभग 30 साल पहले हुई अपने पति की मौत से उबर भी नहीं पाई थीं कि 25-26 साल पहले सबसे बड़े बेटे सुभाष की दुर्घटना में मौत हो गई. सुभाष के जाने के तीन साल बाद ही मनीराम करगिल युद्ध के दौरान 3 जुलाई, 1999 को द्रास सेक्टर में दुश्मनों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गए थे. 2015 में उनके तीसरे बेटे शीशराम हार्ट अटैक से चल बसे तो उसके तीन साल बाद ही सबसे छोटे बेटे रोहिताश्व की एक दुर्घटना में मौत हो गई. 35 साल की इस अवधि में बेटे और पति ही नहीं, चावली की चार बेटियों के पतियों की भी असमय मौत हो चुकी है.

पूरी तरह टूट चुकीं चावली कहती हैं, "अब तो दवा ऊं भी आराम कौनी, मैं तो दिन-रात भगवान ऊं या ही प्रार्थना करूं कि अब मनैं भी मुसाणा माईं भेज दे. (अब तो दवा से भी आराम नहीं मिलता, मैं तो दिन रात भगवान से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे भी श्मशान भेज दे.)"

मनीराम की शहादत के बाद उनकी पत्नी मुन्नी देवी (मनीराम की पत्नी) को पेट्रोल पंप और अन्य पैकेज मिले, लेकिन चावली देवी के हिस्से कुछ नहीं आया. वे अपने सबसे छोटे दिवंगत बेटे रोहिताश्व के परिवार के साथ अलग रहती हैं और शहीद मनीराम की पत्नी मुन्नी देवी अपने परिवार के साथ दूसरे घर में रहती है. रोहिताश्व के घर की आर्थिक स्थिति का अंदाजा चावली देवी की हालत देखकर सहज ही लगाया जा सकता है.

दूसरी ओर शहीद मनीराम की पत्नी को भी शहादत के पैकेज के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. सरकार ने करगिल शहीद के परिवार को पेट्रोल पंप और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी. मुन्नी देवी को पेट्रोल पंप तो आवंटित हो गया, लेकिन बेटे की नौकरी के लिए उन्हें दो दशक तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े.

सीथल गांव से 20 किलोमीटर दूर ही चारणवास गांव है. यहां के शीशराम वर्मा 2010 में सरहद की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे. उनके घर की स्थिति भी कमोबेश मनीराम के जैसी ही है. शीशराम के 80 वर्षीय पिता हरिराम की हालत चावली देवी से बेहतर नहीं है. वे खेती करने वाले अपने छोटे बेटे जयवीर के साथ रहते हैं जबकि शहीद शीशराम का परिवार पड़ोस में उनसे अलग रहता है. 2010 में बेटे की शहादत के बाद शहीद की पत्नी को शहादत का पैकेज मिला. एक बेटे को नौकरी मिल गई और पैकेज से दूसरा बेटा व्यवसाय करने लगा.

हरिराम को डेढ़ लाख रुपए की आर्थिक सहायता मिली जो साल-दो-साल में ही उनकी दवाइयों पर खर्च हो गई. अब बमुश्किल ही अपना गुजारा कर पाते हैं. दवाएं तो दूर की बात हो गईं. हरिराम का बूढ़ा शरीर अब सूखकर हड्डियों का ढांचा भर रह गया है. शहीद के इस पिता की बदहाली देखकर शहादत के सारे पैकेज बेमानी लगते हैं.

झुंझुनूं शहर के देवीनगर में रहने वाले जयसिंह पूनियां और उनकी पत्नी इंद्रमणी का दर्द भी इतना ही गहरा है. सूरतगढ़ में सेना के संयुक्त सैन्याभ्यास के दौरान अपना बेटा खोने वाले इस दंपती की उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है. 13 मई, 2011 को सूरतगढ़ में सैन्याभ्यास के दौरान उनके बेटे कैप्टन रितेश पूनियां की मौत हो गई थी. ड्यूटी पर मौत होने के बाद उनकी पत्नी को एनओके (नेक्स्ट ऑफ किन, यानी, निकटतम परिजन) के नाते स्पेशल फैमिली पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलीं. रितेश की मौत के पांच दिन बाद ही उनकी पत्नी मायके चली गईं और फिर कभी लौटकर वापस नहीं आईं.

पति की ड्यूटी पर मौत के बाद रितेश की पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिली. समय के साथ उन्होंने दूसरी शादी कर ली. पूनियां कहते हैं, "न जाने सरकार का यह कैसा कायदा है कि बेटे को पाल-पोसकर बड़ा करने और पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने वाले मां-बाप के हिस्से दुख-दर्द के अलावा कुछ नहीं आया और शादी के बाद महज एक माह साथ रहने वाली पत्नी को हमारे बेटे के हिस्से का सब कुछ दे दिया गया है." वे यह भी कहते हैं, "संयुक्त रक्षा सेवा (सीडीएस) परीक्षा के जरिए रितेश का 2005 में कैप्टन पद पर चयन हुआ था. एक-दो माह बाद ही उसे मेजर के पद पर पदोन्नति मिलने वाली थी. 11 दिसंबर, 2011 को धूमधाम से बेटे की शादी की, लेकिन पांच माह में ही हमारी पूरी उम्मीदें और सपने चकनाचूर हो गए. अब न बेटा रहा है और न बहू."

झुंझुनूं जिले के अजीतपुरा गांव के सुरेंद्र कुमार की कहानी भी रितेश के परिवार जैसी ही है. 13 जुलाई, 2022 को बरेली में ड्यूटी के दौरान मौत होने पर सेना से उनकी पत्नी किरण को आर्थिक सहायता और पैकेज मिला. एक साल बाद किरण ने अपने कानूनी हक के तहत दूसरी शादी कर ली. अब सात साल के बेटे की कस्टडी भी पत्नी के ही पास है. लेकिन दूसरी ओर सुरेंद्र के बुजुर्ग माता-पिता श्रीचंद्र और मुन्नी देवी की देखभाल करने वाला कोई नहीं है. श्रीचंद भी सेना में रहे हैं. हवलदार के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जो पेंशन मिलती है पति-पत्नी उसी से अपनी गुजर बसर कर रहे हैं.

यह देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले मनीराम, शीशराम, रितेश और सुरेंद्र भर की ही कहानी नहीं है. शेखावाटी में अनगिनत शहीदों के परिवार इसी तरह की बेकद्री, गुमनामी और फाकाकशी भरी जिंदगी जी रहे हैं. उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर शहीदों के इन बुजुर्ग माता-पिताओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है. इनमें से अधिकतर को न तो अपने बेटों की शहादत के पैकेज में हिस्सा मिला और न ही पेंशन या किसी तरह की अन्य तरह की सुविधाएं. शहादत पर पेट्रोल पंप व अन्य पैकेज मिलने के बाद कई शहीदों की पत्नियां घर छोड़कर शहरों में जा बसी हैं. कुछ उसी जगह पर परिजनों से अलग रह रही हैं.

ऐसे में शहीदों के बूढ़े परिजनों के लिए सरकार की बेरुखी उन्हें गांव-ढाणियों में अकेले और निर्वासित जीवन जीने को मजबूर कर रही है. प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अब तक शेखावाटी के तीन जिलों—झुंझुनूं, सीकर और चूरू से 948 जवान शहीद हुए हैं. इनमें सबसे ज्यादा शहादत झुंझुनूं जिले के जवानों ने दी है. 337 ग्राम पंचायतों वाले इस जिले में प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर अब तक 490 जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो चुके हैं. 13 दिन चले बांग्लादेश मुक्ति संग्राम (भारत-पाक युद्ध 1971) में 108 और करगिल युद्ध में जिले के 19 जवानों ने वतन के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया. 1971 के युद्ध में सीकर के 46 और चूरू के 12 जवान शहीद हुए.

झुंझुनूं जिले में पूर्व सैनिक परिवार संगठन के जिलाध्यक्ष कैप्टन मोहनलाल सवाल करते हैं, "शहीदों का सम्मान कहां हो रहा है? शहीद को पैदा व पाल पोसकर, पढ़ाने और नौकरी लगाने वाले मां-बाप के हिस्से दुख-दर्द के अलावा कुछ नहीं आता. झुंझुनूं जिले में 60 से 70 फीसद शहीदों के परिजनों की ऐसी ही कहानी है. सरहद की सुरक्षा में अपना जवान बेटा गंवाने वाले ये मां-बाप अब अपनी पीड़ा किसे सुनाएं?" कुछ ऐसी ही पीड़ा रिटायर्ड फौजी हरलाल सिंह बेनीवाल की भी है. बेनीवाल कहते हैं, "अधिकांश शहीदों के माता-पिता किसान हैं. उनका बेटा शहीद हो गया तो किसान के पास क्या बचा. इसलिए यह जरूरी है कि शहीद की पत्नी के साथ माता-पिता को भी बराबर की आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए."

मोतीलाल और हरलाल सिंह जैसा ही दर्द पिछले दिनों सियाचिन में शहीद हुए कैप्टन अंशुमान सिंह के माता-पिता ने बयान किया था. अंशुमान के पिता रवि प्रताप सिंह और मां मंजू देवी ने यह कहा था, "हमारा बेटा शहीद हुआ, लेकिन हमें कुछ नहीं मिला. पांच माह पहले बेटे अंशुमान से शादी करने वाली बहू स्मृति सिंह सारा सामान, सम्मान, अनुग्रह राशि और बेटे की शहादत से जुड़ी सारी यादें लेकर चली गई."

रविप्रताप सिंह और मंजू देवी के बयानों के बाद पूरे देश में सेना के एनओके के मापदंडों में बदलाव की मांग उठने लगी. इस प्रकरण के बाद सोशल मीडिया के साथ देश में यह बहस छिड़ गई कि क्या शहीदों के नेक्स्ट ऑफ किन को मिलने वाले लाभ को लेकर नियमों में बदलाव की जरूरत है. यह सरकार पर निर्भर है कि वह शहादत से जुड़े इस अहम मुद्दे पर क्या फैसला लेती है, लेकिन यह उम्मीद तो की जा ही सकती है कि वह शहीद की पत्नी के साथ-साथ उनके माता-पिता का दुख-दर्द बांटने में भी भागीदार बनेगी. 
 
क्या कहते हैं नियम

सेना में जब भी कोई भी जवान या अफसर भर्ती होता है तो नियमानुसार उन्हें एक डिटेल फॉर्म भरना होता है, जिसे 'आफ्टर मी फोल्डर' कहा जाता है. इसमें एनओके (नेक्स्ट ऑफ किन, यानी, निकटतम परिजन) की पूरी जानकारी होती है. अगर सैनिक की शादी नहीं हुई है तो उनके माता या पिता में से कोई भी उनका एनओके हो सकता है, लेकिन शादी होने के बाद उनकी पत्नी ही एनओके होती है. अन्य सेवाओं में कर्मचारी को नॉमिनी और नॉमिनी का हिस्सा चुनने की आजादी होती है, लेकिन सेना में शादी के बाद सैनिक की पत्नी को ही एनओके माना जाता है. अगर सैनिक की मौत हो जाती है या वह शहीद हो जाता है तो उस स्थिति में अलग-अलग आर्थिक मदद का प्रावधान है. इनमें बीमा, एक्स ग्रेशिया, पेंशन, वित्तीय व शैक्षिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी रोजगार शामिल है.

आर्मी में सामान्य, स्पेशल और लिबरलाइज्ड तीन तरह की फैमिली पेंशन होती है. जवान की ड्यूटी पर किसी बीमारी या सामान्य स्थिति में मौत होने पर सामान्य फैमिली पेंशन दी जाती है जो उसके एनओके को मिलती है. यह सैनिक को मिलने वाले आखिरी वेतन का 30 फीसद तक होती है. दूसरी पेंशन है स्पेशल फैमिली पेंशन. यह उस स्थिति में एनओके को मिलती है जब सैनिक की ड्यूटी के दौरान या ड्यूटी की वजह से मौत होती है. यह सैनिक को मिले आखिरी वेतन का 60 फीसद तक होती है.

तीसरी पेंशन होती है लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन. यह बैटल कैजुअल्टी होने पर एनओके को मिलती है. यह वेतन का 100 फीसद तक होती है. नियमों के मुताबिक, पेंशन के हकदार एनओके ही होते हैं. इसके अलावा अगर सैनिक को वीरता के लिए कोई गैलेंट्री अवॉर्ड मिलता है तो वह भी एनओके को ही दिया जाता है. इसके साथ मिलने वाली राशि भी एनओके के पास ही जाती है.

अगर सैनिक शादीशुदा होता है तो एनओके पत्नी ही होंगी. नेक्स्ट ऑफ  किन के प्रावधानों के तहत हर सैनिक को अपनी विल बनानी पड़ती है. सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर हर्षवर्धन सिंह बताते हैं, "करगिल युद्ध के पहले यह विल माता-पिता के नाम से ही बनती थी, जिसमें पत्नी को शामिल किया जा सकता था. करगिल युद्ध के बाद बदले नियमों के बाद यह विल पत्नी के ही नाम से बनती आई है. लेकिन हाल में नियमों में हुए बदलावों के बाद कुछ हिस्सा माता-पिता को देने का प्रावधान भी किया गया है."

वर्तमान में सैनिक इंश्योरेंस, पीएफ, एक्स ग्रेशिया और ग्रैच्युटी के लिए परिवार के किसी भी सदस्य को नॉमिनी बना सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वह अपनी विल या वसीयतनामा पहले से तैयार कर दे. अधिकांश मामलों में विल में भी पत्नी को ही नॉमिनी बनाया जाता है जिसकी वजह से इंश्योरेंस, पीएफ, एक्स ग्रेशिया व ग्रेच्युटी की राशि पत्नी को ही मिलती है. हालांकि सैनिक के डिपेंडेंट पैरंट्स को मेडिकल फैसिलिटी दी जाती है. 

अगर एनओके पत्नी है और वह दूसरी शादी कर ले तो इसके लिए अलग नियम हैं. अगर पत्नी को सामान्य फैमिली पेंशन मिल रही है और वह दूसरी शादी कर लेती है तो पेंशन बंद हो जाती है, लेकिन अगर पत्नी को स्पेशल फैमिली पेंशन मिल रही है तो वह दूसरी शादी करने पर भी उसे ही मिलती रहेगी. हालांकि, अगर सैनिक की मौत के बाद पत्नी बच्चों को छोड़ देती है तो स्पेशल वेतन का जो 60 फीसद पेंशन में मिल रहा होता है उसका 30 फीसद पत्नी को और 30 फीसद बच्चों को मिलेगा. लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन पर यह नियम लागू नहीं होता. लिबरलाइज्ड पेंशन दूसरी शादी करने पर भी जारी रहती है. अगर पत्नी बच्चों को छोड़ती है तो फिर जो सैलरी का 100 फीसद पेंशन मिल रही थी उसका 30 फीसद पत्नी और 70 फीसद बच्चों को मिलेगा. 

राजस्थान में मिलती हैं ये अतिरिक्त सुविधाएं

राजस्थान में शहीद के आश्रितों को 50 लाख रुपए की नकद सहायता, इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में 25 बीघा जमीन अथवा राजस्थान आवासन मंडल का एमआइजी आवास, शहीद परिवार के एक आश्रित को सरकारी नौकरी, शहीद के बच्चों को राजकीय कॉलेज, तकनीकी शिक्षा, मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कॉलेज में निशुल्क पढ़ाई की सुविधा मिलती है. 

माता-पिता को तीन लाख रुपए की सावधि जमा राशि दी जाती है. इसके अलावा शहीद परिवार के सदस्य को कृषि भूमि पर 'आउट ऑफ टर्न' आधार पर विद्युत कनेक्शन, शहीद की पत्नी एवं आश्रित बच्चों और शहीद के माता-पिता को राजस्थान रोडवेज की डीलक्स एवं साधारण बसों में नि:शुल्क यात्रा के लिए पास सुविधा तथा एक विद्यालय, औषधालय, चिकित्सालय, पंचायत भवन, मार्ग, पार्क अथवा अन्य सार्वजनिक स्थान का नामकरण शहीद के नाम पर किया जाना भी शामिल है. राजस्थान सरकार के पैकेज में शहीद के बुजुर्ग माता-पिता को भी तीन लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है. 

राजस्थान से अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में शहीद होने वाले जवानों को मिलने वाली राशि में बड़ा बदलाव करने का निर्णय किया है. यहां अब शहीद के परिवार को मिलने वाले एक करोड़ रुपए में से 50 फीसद राशि पत्नी और 50 फीसद की राशि माता-पिता को दी जाएगी. उम्मीद है, शहीद के माता-पिता की दशा को देखकर एनओके नियम में बदलाव पर विचार होगा.

रामसिंह और मन्नी देवी, कमलेश के माता-पिता

हरिराम शीशराम के पिता बेटे की शहादत के बाद हरिराम को डेढ़ लाख रुपए की सहायता मिली जो साल-दो-साल में ही उनकी दवाइयों पर खर्च हो गई. अब वे खेती करने वाले अपने दूसरे बेटे के परिवार के साथ रहते हैं, जहां उनका गुजारा भी बमुश्किल से होता है.

हरिराम शीशराम के पिता

चावली देवी, शहीद मनीराम की मां चावली देवी के बेटे मनीराम करगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में दुश्मनों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गए थे. इसके पहले ही वे अपने पति और सबसे बड़े बेटे सुभाष को खो चुकी थीं. मनीराम के जाने के बाद इन बुजुर्ग महिला की बदकिस्मती रही कि इनका चौथा बेटा रोहिताश्व भी नहीं रहा और अब वे बिल्कुल बेसहारा हैं.

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