
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (एलजी) की शक्तियां और अधिकार केंद्र सरकार ने बढ़ा दिए हैं. उन्हें उन मामलों का अधिकार भी सौंप दिया गया है जिनमें राज्य के वित्त महकमे की सहमति की जरूरत थी. यह 'कार्य संचालन' नियमों में बदलाव के जरिए किया गया. इससे प्रमुख प्रशासनिक और कानूनी मामलों में एलजी के अधिकार बढ़ गए. ये चुनी हुई सरकार के सत्ता में आने के साथ लागू होंगे.
इनमें नागरिक व्यवस्था से जुड़े फैसलों के साथ-साथ अखिल भारतीय सेवाओं (आईएएस/आईपीएस), जम्मू-कश्मीर पुलिस के अफसरों, एडवोकेट-जनरल या महाधिवक्ता समेत न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले से जुड़े फैसले शामिल हैं. इनके लिए अब एलजी की मंजूरी की जरूरत होगी. नए नियमों से भ्रष्टाचार-निरोधक निकाय, जेलों और अभियोजन तथा अपील दायर करने पर भी एलजी का नियंत्रण बढ़ गया है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय की 12 जुलाई को जारी अधिसूचना में कहा गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एलजी के अधिकारों का दायरा बढ़ाने के लिए अधिनियम की धारा 55 में बदलाव करके तीन नए संशोधन जोड़े हैं. यह तत्कालीन राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने के साथ लाए गए जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के वजूद में आने के बाद दूसरा संशोधन है. इससे पहले प्रशासन के एक प्रमुख अधिकारी जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव की नियुक्ति का अधिकार राज्य सरकार के पास था.
नियम 50 के उपनियम 3 के खंड बी के तहत एलजी को जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव और डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (जीडीपी) की नियुक्ति के मामले में 'पूर्व संदर्भ' केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजना होता था. अब 28 फरवरी को अधिसूचना के जरिए इसमें संशोधन करके राज्य के गृह सचिव की नियुक्ति में भी केंद्र की मंजूरी लेना जरूरी बना दिया गया.
उम्मीद के मुताबिक, यह संशोधन भाजपा को छोड़कर किसी भी राजनैतिक पार्टी को रास नहीं आया है. यहां तक कि भगवा पार्टी की सहयोगी/मोहरा बताई जाने वाली पार्टियां भी इसका कड़ा विरोध कर रही हैं. नए घटनाक्रम को चुनौती देने के लिए उन्होंने 'एकजुट रणनीति' की अपील की है. मसलन, अपनी पार्टी के प्रमुख सैयद अल्ताफ बुखारी पर नई दिल्ली का वरदहस्त बताया जाता है और अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद 2021 में उन्होंने सबसे पहले राजनैतिक पार्टी लॉन्च की थी. मगर कारोबारी से नेता बने बुखारी बहुत लाल-पीले हो रहे हैं.
उन्होंने अपने विरोधियों से राजनैतिक मतभेद भुलाते हुए साझा संघर्ष की तैयारी करने का आग्रह किया. वे कहते हैं, "वे मुख्यमंत्री को बिना दांत वाला शेर और लोगों को बेवकूफ बनाना चाहते हैं. अगर हम आज एकजुट नहीं हो सके तो कभी नहीं हो पाएंगे. हमें पक्का करना होगा कि हमें मिलने वाला राज्य का दर्जा खोखला न हो."
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता, पूर्व सांसद और जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट के जज हसनैन मसूदी भी केंद्र की मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, "कामकाज के नियमों में बदलाव कानूनी कम और राजनैतिक ज्यादा है. यह बताता है कि केंद्र संसद के पटल पर किए गए वादे के मुताबिक चुनाव न करवाकर और राज्य का दर्जा न देकर अपनी हुकूमत को लंबा खींचना चाहता है. एलजी को जनादेश के बगैर सारे फैसले लेने का अधिकार होगा. यह जम्हूरियत के जज्बे के खिलाफ है."
पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया, "लोगों को ऐसे अधिकारहीन और रबड़ स्टैंप मुख्यमंत्री से ज्यादा का हक है जिसे अपने चपरासी की नियुक्ति करवाने के लिए एलजी के आगे हाथ फैलाने पड़ेंगे." वहीं दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसे "मोदी सरकार के मातहत रोज हो रही 'संविधान की हत्या' की एक और मिसाल" बताया.
इन संशोधनों ने विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र के इरादों पर संदेह की लंबी छाया डाल दी. खासकर उस वक्त जब ये संशोधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीनगर यात्रा के एक महीने से भी कम वक्त में किए गए हैं. प्रधानमंत्री ने लंबे वक्त से टल रहे विधानसभा चुनाव करवाने और राज्य का दर्जा बहाल करने के अपने बयानों से काफी उम्मीदें जगा दी थीं. जम्मू-कश्मीर के पूर्व लॉ सेक्रेटरी अशरफ मीर कहते हैं, "संशोधन नया नहीं है. यह जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के अनुरूप है. उन्होंने चुनी हुई सरकार की स्थापना से पहले अधिकारों की स्पष्ट सीमा निर्धारित कर दी है. कार्य संचालन के नए नियम का मकसद कुछ अस्पष्ट मामलों में स्पष्टता लाना है."
वे यह भी बताते हैं कि एडवोकेट-जनरल और विधि अधिकारियों की नियुक्ति में एलजी के अधिकारों के विस्तार से चुनी हुई सरकार के लिए बहुत कम ही गुंजाइश बची है. वे कहते हैं, "पुनर्गठन कानून के मुताबिक, पुलिस और कानून-व्यवस्था पर राज्य विधानसभा को वैसे भी कम ही अधिकार मिले थे. एलजी को और ज्यादा अधिकार देकर पक्का कर दिया गया है कि मुख्यमंत्री और कैबिनेट के पास कोई अधिकार नहीं होगा."
साल 2019 के पुनर्गठन कानून (धारा 55 के तहत कामकाज का संचालन) के तहत एलजी को 'मंत्रिमंडल की सलाह' पर नियम बनाने और 'मंत्रियों के साथ कामकाज के अधिक सुविधाजनक संचालन' की इजाजत दी गई है और मतभेद की स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तय की गई है. मगर जम्मू-कश्मीर में राज्य विधानसभा या चुनी हुई सरकार की गैर-मौजूदगी में 31 अक्टूबर, 2019 को केंद्र सरकार एक उद्घोषणा लाई, जिसके तहत सारी शक्तियां राष्ट्रपति ने अपने हाथ में ले लीं और धारा 55 के प्रावधान निलंबित कर दिए, जिससे उन्हें कामकाज के नियम बनाने और उनमें संशोधन करने की अनुमति मिल गई.
दिल्ली सरीखे दूसरे केंद्रशासित प्रदेशों में चुनी हुई सरकार और एलजी के अधिकारों को लेकर टकराव खासकर 2014 के बाद तकरार का बड़ा मुद्दा रहा है. दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) ने बीते दशक में प्रशासनिक, कानूनी और नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों पर अंतहीन टकराव देखे, जिनसे कटुता बढ़ी और राजकाज पर असर पड़ा. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद भी टकराव खत्म नहीं हुआ.
पूर्व लॉ सेक्रेटरी कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर में पुनर्गठन कानून एलजी को व्यापक विवेकाधीन अधिकार देता है और उसकी गलत व्याख्या भी की जा सकती है." उनका मानना है, "इससे चुनी हुई सरकार के साथ टकराव शुरू होगा. हम दिल्ली यूटी की तरह नहीं हैं, बल्कि पुदुच्चेरी की तरह ज्यादा हैं. जब तक हमें पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलता, यह टकराव चलता रहेगा." दिल्ली के विपरीत पुदुच्चेरी यूटी के लिए संविधान में जमीन, नागरिक-व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था को लेकर कानून पारित करने पर किन्हीं विशिष्ट पाबंदियों का जिक्र नहीं है.
राज्य विधानसभा के लंबे समय से टलते आ रहे चुनाव जब और जैसे भी हों, नए नियम जम्मू और कश्मीर में किसी भी निर्वाचित सरकार की सत्ता को खोखला कर देंगे. इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठेंगे. वहीं, राज्य विधानसभा चुनाव की तैयारियां जल्द शुरू करनी होंगी क्योंकि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय समयसीमा (30 सितंबर) कुछ ही महीने दूर है. पिछले विधानसभा चुनाव 2014 में हुए थे. जम्मू-कश्मीर 2018 से ही चुनी हुई सरकार से महरूम है और इस यूटी पर सीधे केंद्र सरकार की हुकूमत है.

इन संशोधनों ने चुनावों के बाद के केंद्र सरकार के इरादों पर सवालिया निशान लगा दिया है, वह भी उस वक्त जब ये प्रधानमंत्री मोदी के श्रीनगर दौरे में उनके सकारात्मक बयान के बाद किए गए हैं
नए नियम
> गृह मंत्रालय ने जेऐंडके पुनर्गठन अधिनियम 2019 से जुड़े 'कार्य संचालन' के नियमों में बदलाव किया
> आइएएस/आइपीएस अधिकारियों के तबादले/तैनाती, पुलिस, नागरिक व्यवस्था, जमीन से संबंधित नियमों के लिए राज्य के वित्त महकमे की सहमति लेना जरूरी नहीं रहा, एलजी का विवेकाधिकार अंतिम
> निर्वाचित सरकार ने महाधिवक्ता की नियुक्ति का अधिकार भी गंवाया
> जेल, अभियोजन निदेशालय, फॉरेंसिक साइंस लैब से जुड़े सारे मामले एलजी के पास
> अभियोजन की मंजूरी देने का अधिकार एलजी को बेहिसाब अधिकार उपराज्यपाल मनोज सिन्हा
- मोअज्जम मोहम्मद

