मानसून के मौसम में हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियां भले ही उमड़-घुमड़कर बरसते काले बादलों से सराबोर हो रही हों मगर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कुर्सी पर छाए राजनीतिक अनिश्चितता के बादल जरूर छंटते नजर आ रहे हैं. राज्य में 10 जुलाई को तीन सीटों देहरा, नालागढ़ और हमीरपुर के लिए हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने दो पर जीत दर्ज की. इसके साथ ही 68 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी ने एक बार फिर अपना आंकड़ा 40 पर पहुंचा दिया.
बतौर कांग्रेस प्रत्याशी सुक्खू की पत्नी कमलेश ठाकुर ने देहरा और हरदीप सिंह बावा ने नालागढ़ सीट जीती. भाजपा ने हमीरपुर सीट पर कब्जा बरकरार रखा है. इस पर पहले पूर्व निर्दलीय विधायक आशीष शर्मा काबिज थे, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे. विधानसभा में भाजपा सदस्यों की संख्या अभी 28 है.
उपचुनाव की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कांग्रेस सरकार समर्थक तीन निर्दलीय विधायकों होशियार सिंह (देहरा), आशीष शर्मा और के.एल. ठाकुर (नालागढ़) ने निष्ठा बदल ली. फरवरी अंत में राज्यसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के पक्ष में वोट दिया और इस्तीफा दे दिया. बाद में ये सभी भाजपा में शामिल हो गए.
सुक्खू सरकार की सियासी मुश्किलें उस वक्त शुरू हुईं जब छह कांग्रेस विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की और पार्टी उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को हार का सामना करना पड़ा. इन सभी को तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया गया. इन छह सीटों पर लोकसभा चुनावों के साथ ही उपचुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस ने चार सीटें बरकरार रखीं, जबकि दो भाजपा के खाते में चली गईं. छह बागी कांग्रेसियों में से केवल सुधीर शर्मा (धर्मशाला) और इंद्र दत्त लखनपाल (बड़सर) ही भाजपा के टिकट पर अपनी सीटें फिर जीत पाए.
बहरहाल, देहरा की जीत सुक्खू के लिए खास मायने रखती है क्योंकि यहां जीत के साथ उनकी पत्नी कमलेश ठाकुर ने राजनीति में कदम रखा है. वैसे भाजपा कह रही है कि यह सीट जीतने के लिए सीएम सुक्खू ने पूरी सरकारी मशीनरी लगा दी थी लेकिन कांग्रेस को असल फायदा तो भाजपा की अंदरूनी कलह से मिला है. इस बीच, आलोचनात्मक तेवर अपनाते हुए पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल ने कहा है कि फरवरी के पूरे प्रकरण में उनसे कोई सलाह नहीं ली गई और भाजपा ने कांग्रेस के मामलों में दखल देने में कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी दिखाई.
कुल मिलाकर, सभी नौ सीटों पर उपचुनाव के नतीजों ने हिमाचल में भाजपा के 'ऑपरेशन लोटस' को विफल कर दिया. इसका उद्देश्य मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर कांग्रेस के भीतर असंतोष का फायदा उठाकर सुक्खू सरकार को गिराना था. दूसरी ओर, हिमाचल कांग्रेस में सुक्खू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रहे विक्रमादित्य सिंह की लोकप्रियता भी लोकसभा चुनाव में मंडी सीट पर हार के बाद गिर गई है.
वे 17 विधानसभा क्षेत्रों में से केवल लाहौल-स्पीति, करसोग, रामपुर और किन्नौर में ही बढ़त हासिल कर सके. फरवरी में उपजे सियासी संकट के दौरान विक्रमादित्य ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, मगर कांग्रेस आलाकमान उन्हें पद पर बने रहने के लिए राजी करने में सफल रहा था.
वैसे, उपचुनाव नतीजों से एक बात तो साफ है कि दलबदल की संस्कृति हिमाचल में काम नहीं करेगी. इस पूरे प्रकरण ने भाजपा की रणनीतिक चूक को भी उजागर किया है—उसे निर्दलीयों को अपने पाले में लाने से पहले कांग्रेस के छह बागियों के चुनावी भाग्य के फैसले का इंतजार करना चाहिए था. अब सुक्खू के मजबूत होकर उभरने के बाद असंतुष्ट कांग्रेसी विधायक भी अपने अगले कदम को लेकर काफी सतर्कता बरत रहे हैं.
हालांकि, ऐसा नहीं है कि इसके बाद सुक्खू की राह बहुत आसान हो गई है. 'लाभ के पद' का एक मामला अदालत में लंबित है और अगर शिमला हाइकोर्ट ने 2023 में मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त किए गए छह कांग्रेस विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया तो कांग्रेस को एक और करारा झटका लगेगा. वैसे, भाजपा तो यही चाहेगी कि ऐसा ही हो जाए.

