रांची की बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल से निकलने के एक हफ्ते से भी कम में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने 3 जुलाई को तीसरी बार झारखंड में सरकार बनाने का दावा पेश किया. यह तब हुआ जब उनकी ही पार्टी के नेता चंपाई सोरेन ने इस पद को संभालने के महज 152 दिन बाद बतौर मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दिया. इससे पहले दिन में राज्य के सत्तारूढ़ गठबंधन (जिसमें झामुमो, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल शामिल हैं) ने हेमंत को अपना नेता चुना. राज्य में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बाकी हैं.
जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हिरासत से हेमंत की रिहाई और इसके बाद सत्ता में वापसी ने चुनाव से पहले झामुमो में जोश भर दिया है. लेकिन इसने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए स्थिति जटिल कर दी है जो इस गिरफ्तारी को हेमंत के भ्रष्टाचार का नतीजा बता कर प्रचारित कर रही थी—ऐसा आरोप जिसका झामुमो और उसके साथी दलों ने खंडन किया है. अपनी तरफ से झामुमो ने भी आरोप लगाया है कि केंद्र की बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार विपक्षी दलों को निशाना बना रही है और आदिवासी विरोधी है—संथाली और मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें निशाना बनाया गया. हेमंत दोनों के रूप में अपनी मिसाल देते हैं.
झामुमो नेता प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की गिरफ्तारी के बाद से 31 जनवरी से जेल में थे (हालांकि मई में उन्हें चाचा के अंतिम संस्कार में शामिल होने की इजाजत दी गई थी). ईडी ने उनके खिलाफ धन शोधन रोकथाम अधिनियम के तहत एक केस दर्ज किया था. गिरफ्तारी से पहले हेमंत के इस्तीफे के बाद चंपाई को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी. 28 जून को करीब 5 महीने की हिरासत के बाद हेमंत को झारखंड हाइकोर्ट ने जमानत पर रिहा किया और कहा कि यह "विश्वास करने का कारण" है कि "अपराध में वे दोषी नहीं हैं जैसा कि आरोप लगाया गया है."
हेमंत की हिरासत के दौरान झारखंड में काफी कुछ हुआ है. जहां बीजेपी नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने हाल के आम चुनाव में झारखंड की 14 में से 9 लोकसभा सीटें जीती हैं, पर वह राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी पांच लोकसभा सीटे हार गया और उसकी संख्या 2019 के पिछले चुनाव में जीती गई 12 सीटों की संख्या में तीन घट गई है. झामुमो ने इनमें से तीन आदिवासी सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने बाकी दो सीटें. पर्यवेक्षकों का विश्लेषण है कि इन सीटों पर राजग की हार हेमंत की गिरफ्तारी पर बीजेपी के खिलाफ आदिवासियों की नाराजगी का संकेत है. अब हालात सुधरने के आसार नहीं दिखते.
इस बीच हेमंत ने राज्य विधानसभा चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए पूरी ताकत और तन-मन से अपने आप को उतार दिया है. रांची के उत्तर-पूर्व में कोई 375 किलोमीटर दूर साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव में 30 जून को झामुमो नेता ने दावा किया, "उन्होंने अभी ठीक से आजादी को महसूस भी नहीं किया है और पहले से ही उनके खिलाफ नई साजिश शुरू हो गई है. सचाई को चुप नहीं कराया जा सकता और न ही बांधा जा सकता है." अपनी गिरफ्तारी को राजनैतिक विरोध और सामाजिक सक्रियता को दबाने के बड़े तौर-तरीके का हिस्सा बताते हुए हेमंत ने 'सामंती ताकतों' के नजरिए के खिलाफ 'हुल विद्रोह' (संताली में हुल का मतलब मुक्ति के लिए संघर्ष) का जिक्र किया. भोगनाडीह उनके विधानसभा क्षेत्र बरहेट में आता है जो अंग्रेजों के खिलाफ 1855 के संताल विद्रोह के नेता सिद्धू और कान्हू की जन्मस्थली है. रिहाई के बाद पहली जनसभा में हेमंत ने अपने आप को आदिवासी अधिकारों के रक्षक और राजनैतिक साजिश के शिकार के रूप में पेश किया. उनका मकसद राज्य में अपना समर्थन आधार मजबूत करना था. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हेमंत ने महान आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की मूर्ति के साथ अपनी फोटो प्रमुखता से लगा रखी है और उस पर एक शब्द में संदेश लिखा हुआ है: "उलगुलान" (महाआंदोलन)—यह शब्द एक सदी पहले अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिरसा मुंडा की ऐतिहासिक बगावत बताता है.
झारखंड की आबादी में 26% आदिवासी हैं और राज्य की 81 विधानसभा सीटों में से 28 आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी तब के अपने गैर आदिवासी मुख्यमंत्री रघुबर दास के नेतृत्व में इनमें से महज दो सीटें जीत पाई थी जबकि झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने 25 सीटें जीती थीं. लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों पर खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी ने दिग्गज नेता शिवराज सिंह चौहान और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा को झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए प्रभारी नियुक्त किया है.
आम चुनाव में खूंटी से पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की हार से बीजेपी को एक तरह से फायदा हो सकता है क्योंकि वे झारखंड में पार्टी के घटते आदिवासी समर्थन को फिर से जुटाने पर ध्यान दे सकते हैं. लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी से उनके जटिल रिश्ते इस काम में बाधा बन सकते हैं. हेमंत ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे "भाजपा के ताबूत में आखिरी कील" भी ठोक दें और वे फिर से सत्ता में लौटने की उम्मीद कर रहे हैं. देखना है कि मतदाता उन पर एहसान करते हैं या नहीं.

