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आकाश आनंद की वापसी के यूपी की बहुजन राजनीति में क्या मायने हैं?

इस लोकसभा चुनाव में बसपा के अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती ने भतीजे को दौबारा सौंपी अपने उत्तराधिकारी और नेशनल कोआर्डिनेटर की जिम्मेदारी

मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को फिर से घोषित किया अपना सियासी उत्तराधिकारी
मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को फिर से घोषित किया अपना सियासी उत्तराधिकारी
अपडेटेड 10 जुलाई , 2024

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 22 जून को मीडिया संस्थानों को अगले दिन होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय बैठक के कवरेज का न्योता भेजा. निमंत्रण पत्र में कहा गया कि लखनऊ में बसपा के राज्य कार्यालय में उस बैठक में हालिया लोकसभा चुनाव नतीजों की समीक्षा होगी और जरूरी दिशानिर्देश दिए जाएंगे. तब से अटकलें लगनी लगी थीं कि बैठक में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को दोबारा कोई अहम जिम्मेदारी सौंप सकती हैं.

दरअसल 7 मई को, जिस दिन लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान खत्म हुआ था, मायावती ने आकाश को पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक और उनके उत्तराधिकारी की दोहरी जिम्मेदारियों से उनकी 'परिपक्वता की कमी' के कारण हटा दिया था. आकाश की यह पदावनति 28 अप्रैल को सीतापुर में एक चुनावी भाषण के बाद हुई जिसमें उन्होंने भाजपा सरकार को "आतंकवादियों की सरकार" कहा था. उसके बाद उनके और 39 अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी.

लोकसभा चुनाव के 4 जून को आए नतीजे के बाद से लखनऊ में बसपा कार्यालय में सन्नाटा था क्योंकि पार्टी ने पिछले चुनाव में जीती सभी दस सीटें इस बार गवां दीं. इस चुनाव में बसपा ने एक भी सीट नहीं जीती और इसका वोट शेयर भी 2019 के 19.4 फीसद से घटकर 9.3 फीसद रह गया. लोकसभा चुनाव में बसपा के अब तक के इस सबसे खराब प्रदर्शन के कुछ हफ्ते बाद मायावती ने 23 जून की बैठक में आकाश को अपने एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी और पार्टी के नेशनल कोआर्डिनेटर के रूप में बहाल कर दिया, साथ ही नेताओं से 'उन्हें पहले से अधिक सम्मान देने' का आग्रह किया. उन्होंने उम्मीद जताई कि आकाश इस बार 'परिपक्वता' के साथ जिम्मेदारियों को संभालेंगे. मायावती ने कहा, "मुझे उम्मीद है कि वे हमारी पार्टी और आंदोलन के हित में हर स्तर पर एक परिपक्व नेता के रूप में उभरेंगे."

दिसंबर 2023 में मायावती का उत्तराधिकारी बनने के बाद, 2024 का लोकसभा चुनाव आकाश का पहला चुनाव था, जिसमें उन्होंने पार्टी के चुनावी अभियान का नेतृत्व किया. यूपी में आकाश ने पहली बार और बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार किया. 7 मई को मायावती की ओर से शक्तियां छीने जाने से पहले आकाश ने 17 रैलियां की थीं. बर्खास्तगी के बाद, आकाश ने अपना प्रचार अभियान बीच में ही रोक दिया और मायावती पार्टी का एकमात्र चेहरा बन गईं थीं. आकाश ने 6 अप्रैल को नगीना से अपना अभियान शुरू किया था. पार्टी 2019 में जीती नगीना सीट 2024 में आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद से हार गई. राष्ट्रीय बैठक में शामिल होने लखनऊ आए बसपा नेताओं को यकीन था कि आनंद को बहाल कर दिया जाएगा, मगर उन्हें उम्मीद नहीं थी कि यह निर्णय इतनी जल्दी होगा.

मायावती के अचानक हृदय परिवर्तन में, सियासी विश्लेषक आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेता चंद्रशेखर आजाद की नगीना लोकसभा क्षेत्र से जीत का भी असर देखते हैं. आजाद, जिन्होंने सपा-कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया, ने नगीना में 1.53 लाख वोटों से जीत हासिल की, जिससे बसपा चौथे स्थान पर आ गई. आजाद जैसे युवा और लोकप्रिय दलित नेता के उभरने से, जिन्हें दलितों के साथ-साथ मुसलमानों का भी समर्थन प्राप्त है, मायावती जल्द से जल्द आकाश की बहाली करने को विवश हो गईं.

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ में इतिहास विभाग के प्रोफेसर सुशील पांडेय बताते हैं, "बसपा के पास अब कोई लोकसभा सांसद नहीं है और चंद्रशेखर आजाद देशभर में यात्रा करते हुए सदन में दलितों और मुसलमानों के मुद्दों को उठाएंगे. इससे उन्हें दलित नेता और मायावती के विकल्प के रूप में उभरने में मदद मिलेगी, जिससे बसपा और कमजोर होगी. इस नुकसान को कम करने के लिए आकाश की वापसी जरूरी थी." पार्टी को अपने उम्मीदवारों से भी फीडबैक मिला कि जाटवों के साथ-साथ मुसलमानों का एक वर्ग, जिसे बसपा का मुख्य मतदाता माना जाता है, सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन नहीं करता, अगर आकाश अपना अभियान जारी रखते.

अब यूपी में आसन्न विधानसभा उपचुनाव और वर्ष 2027 को ध्यान में रखते हुए मायावती ने भतीजे को एक और मौका दिया है. बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल बताते हैं, "पार्टी में भी उन्हें वापस लाने की भारी मांग थी." मई 2019 में आकाश को पार्टी का राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया था, जब बसपा ने 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन में 38 सीटों में से 10 सीटें जीती थीं. असल में, आकाश ने बसपा नेता के तौर पर मायावती से अलग चुनाव प्रचार की शैली विकसित की जिसे बसपा कार्यकर्ताओं का बड़ा समर्थन मिल रहा था. मायावती जहां मुख्य रूप से सपा-कांग्रेस पर निशाना साधती थीं, आकाश ने शिक्षा, गरीबी, अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर लगातार भाजपा को घेरा.

पांडेय के मुताबिक, आकाश के हटाए जाने के बाद से दलितों और मुसलमानों में यह संदेश गया कि मायावती भाजपा के दबाव में झुक गई हैं. वैसे, पार्टी के नेता मानते हैं कि आकाश की बहाली से बसपा को भाजपा की बी-टीम होने का ठप्पा हटाने में मदद मिलेगी. इससे जाटवों और अन्य दलितों के बीच बसपा का विश्वास फिर से स्थापित करने में मदद मिलेगी और पार्टी काडर में फिर से ऊर्जा आएगी. यूपी में 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए, बसपा को एक युवा नेता की ज़रूरत है जो पूरे राज्य में यात्रा कर सके, जिलेवार बैठकें कर सके और जमीन से सीधे फीडबैक प्राप्त कर सके. मगर हाथी के लिए यहां से खड़ा होना आसान नहीं.

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