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कश्मीर से दिल्ली की दूरी ख़त्म करने के वादे को निभाने का आ गया वक्त?

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, दहशतगर्दों के सरपरस्त जम्मू और कश्मीर में जल्द होने वाले विधानसभा चुनावों को पटरी से उतारना चाहते हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह के दौरान 21 जून को श्रीनगर में प्रतिभागियों से बात करते हुए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह के दौरान 21 जून को श्रीनगर में प्रतिभागियों से बात करते हुए
अपडेटेड 10 जुलाई , 2024

नई दिल्ली के दिग्गजों की जम्मू-कश्मीर की यात्राओं ने उम्मीद की किरणें जगा दी हैं. अच्छे दिन आते नजर आ रहे हैं और विकास परियोजनाओं की झड़ी केंद्र की नेकनीयती का संदेश देती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जून 2021 में जम्मू-कश्मीर के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से कहा था कि वे 'दिल्ली की दूरी' और 'दिल की दूरी' खत्म करना चाहते हैं.

2019 में अनुच्छेद 370 को रद्द करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के बाद यह कश्मीरी नेतृत्व के साथ केंद्र की पहली औपचारिक बातचीत थी. वक्त-वक्त पर उम्मीद और विकास की ऐसी पेशकशों ने 20-21 जून को प्रधानमंत्री मोदी की श्रीनगर यात्रा से आखिरकार ठोस शक्ल अख्तियार कर ली.

तीसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभालने के महज एक पखवाड़े बाद मोदी ने दो राजनैतिक आश्वासन दिए - अरसे से लंबित विधानसभा के चुनाव और राज्य का दर्जा बहाल करना - जिनसे कई कश्मीरी दिल खिल उठे होंगे. हाल के दिनों में कुछ और अच्छे संकेत भी थे. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 16-17 मई को अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान भाजपा के नेताओं से कहा था कि वे विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू करें.

विधानसभा चुनाव आखिरी बार 2014 में हुए थे. उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा जम्मू-कश्मीर में सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. कइयों को इससे हैरानी नहीं हुई क्योंकि केंद्र को जम्मू-कश्मीर में सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव करवाने का सुप्रीम कोर्ट का निर्देश सिर पर मंडरा रहा है और हर हफ्ते नजदीक आता जा रहा है.

श्रीनगर में डल झील के किनारे शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर में हुए आयोजन में यंग एचीवर्स को संबोधित करते हुए मोदी ने हाल ही संपन्न लोकसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर भागीदारी के लिए लोगों की तारीफ की. उन्होंने कहा, "इससे बेहतर क्या हो सकता है कि जम्मू-कश्मीर के लोग अपने जनप्रतिनिधि चुनें और उनके जरिए अपनी समस्याओं से निबटें. इसीलिए विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं...वह दिन दूर नहीं जब आप जम्मू-कश्मीर की नई सरकार चुनेंगे."

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा, "वह दिन जल्द आएगा जब जम्मू-कश्मीर एक बार फिर राज्य बनकर अपना भविष्य गढ़ेगा." इस बार लोकसभा चुनावों में जम्मू और कश्मीर में 35 साल में सबसे ज्यादा - 58.4 फीसद - मतदान हुआ.

नरेंद्र मोदी के यह कहने के एक दिन बाद चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव के लिए जम्मू-कश्मीर की मतदाता सूचियों को अपडेट करने का ऐलान कर दिया. चुनाव आयोग ने कहा कि मतदाता सूचियों में संशोधन 20 अगस्त तक पूरा कर लिया जाएगा.

फिर विकास परियोजनाओं की सौगात दी गई. मोदी ने सड़क, पानी की आपूर्ति, बुनियादी ढांचे और उच्च शिक्षा से जुड़ी 1,500 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया. उन्होंने 1,800 करोड़ रुपए की जेऐंडके कंपीटीटिवनेस इंप्रूवमेंट इन एग्रीकल्चर ऐंड अलायड सेक्टर्स प्रोजेक्ट भी लॉन्च किया, जिसके दायरे में जम्मू-कश्मीर के 20 जिलों के 15 लाख लाभार्थी आएंगे. फरवरी में अपनी जम्मू यात्रा के दौरान मोदी ने 3,300 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन किया था.

मगर मोदी की घोषणाओं से राजनीतिक दलों की बांछें नहीं खिलीं. नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी कहते हैं, "हम 'जल्द विधानसभा चुनाव करवाने' के बारे में सुनते रहे हैं...हमें हैरानी है कि उन्हें तारीखों का ऐलान करने से कौन रोक रहा है." उन्होंने यह भी कहा कि अमित शाह संसद के पटल पर राज्य का दर्जा लौटाने का वादा कर चुके हैं और सरकार इस पर अपने हाथ न खींचे. राजनैतिक विश्लेषक नूर अहमद बाबा का भी यही कहना है कि जब तक तारीख का ऐलान नहीं होता तब तक नई घोषणाओं में 'कुछ खास' नहीं है.

बाबा 'दिल्ली से दूरी' पाटने को भाजपा सरकार के लिए चुनौती बताते हुए कहते हैं कि यह सरकार कश्मीर के राजनैतिक परिदृश्य को नए सिरे से गढ़ना चाहती थी, पर उसे लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया, जो लोकसभा चुनावों के नतीजों में दिखाई देता है. वे कहते हैं, "इस वक्त न केवल जम्मू-कश्मीर बल्कि लद्दाख में भी नाराजगी है और बेहतर भविष्य के लिए सरकार को सुलह की कोशिशें शुरू करनी चाहिए."

जब केंद्र उम्मीदों को परवान चढ़ा रहा है और चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारी कर रहा है, केंद्र शासित प्रदेश में पुराना अभिशाप फिर उभर आया है - पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद. इस बार यह पीर पंजाल के पहाड़ों के दक्षिण में जम्मू में उभरा है, जो इस बुराई से निजात पा चुका था. मगर 2021 के बाद यह फिर आतंकवाद का ज्वलंत केंद्र बनकर उभरा है. हालांकि कश्मीर घाटी में स्थिति नियंत्रण में है, मगर जम्मू में दहशतगर्दों के लगातार हमले गंभीर चिंता की बात हैं.

जून के दूसरे हफ्ते में पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकवादियों ने रियासी, कठुआ और डोडा जिलों में चार जगहों पर हमले किए. इसमें सबसे भीषण और कायराना 9 जून को रियासी में शिव खोड़ी मंदिर से तीर्थयात्रियों को लेकर आ रही बस पर हुआ हमला था, जिसमें नौ लोग मारे गए. कई लोगों का मानना है कि नई एनडीए सरकार के शपथग्रहण के दिन हुए इस हमले से पाकिस्तान की ताकतवर फौज ने अपने इरादों को जता दिया है. सुरक्षा अधिकारी इस पूरे मामले को कश्मीर घाटी में सेना के आतंकवाद-विरोधी जाल की तरफ से मुश्किलें झेलने के बाद कम सैन्य नाकेबंदी वाले जम्मू में उग्रवाद को फिर जिंदा करने की पाकिस्तानी कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

मुस्तैद श्रीनगर की डल झील में सुरक्षा अभ्यास करते अर्धसैनिक बल के जवान

खुफिया एजेंसियों का भी यह कहना है कि दहशतगर्दों के सरपरस्त जम्मू और कश्मीर में जल्द होने वाले विधानसभा चुनावों को पटरी से उतारना चाहते हैं. एक प्रमुख रक्षा अधिकारी कहते हैं, "दहशतगर्द जम्मू-कश्मीर में शांति प्रक्रिया की जड़ें खोदने को बेताब हैं. शांतिपूर्ण चुनाव करवाना सुरक्षाबलों के लिए चुनौती होगी. फिर भी हम सब तैयार हैं."

आतंकी घटनाओं के जवाब में सुरक्षा नेतृत्व के साथ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की बैठकों के बाद सुरक्षाबलों को आतंक-विरोधी अभियान तेज करने के निर्देश दिए गए हैं. खुफिया जानकारी के मुताबिक, जम्मू के सीमावर्ती जिलों में 35-40 विदेशी आतंकवादी काम कर रहे हैं. पीर पंजाल के दक्षिण में अखनूर से पुंछ तक नियंत्रण रेखा की रखवाली करने वाली सेना की नगरोटा स्थित 16 कोर को नवंबर-दिसंबर 2023 के बाद कम ही कामयाबी मिली है - बाजीमाल (राजौरी) और देहरा की गली (पुंछ) में कई आतंकी मुठभेड़ों में मारे गए, मगर नौ सुरक्षाकर्मियों की जान भी चली गई. हालात को हाथ से बाहर न जाने देने के लिए सुरक्षा प्रतिष्ठान ने गश्त बढ़ा दी है, ड्रोन और सैटेलाइट की तस्वीरों के जरिए निगरानी की जा रही और चौकियों को मजबूत किया गया है.

सेना के एक अफसर कहते हैं, "बड़ी तादाद में लोगों के मतदान के लिए आने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जम्मू-कश्मीर के लोगों की आस्था का पता चलता है. यह प्रशासन और सुरक्षाबलों की तरफ से किए गए असरदार उपायों को भी दिखाता है." सुरक्षित चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करके ही राजकाज और सुरक्षा तंत्र में यहां के लोगों का विश्वास बढ़ेगा. और कश्मीर में आगे बढ़ने का यही आदर्श तरीका है.

- मोअज्जम मोहम्मद श्रीनगर में

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