लगता है, इन दिनों तेजस्वी यादव अपने सबसे आक्रामक अंदाज में हैं. वे उतना ही करारा जवाब दे रहे हैं जितना तीखा हमला उन पर होता है. इस हफ्ते बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी ने सधे ढंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बाजी पलट दी, जिन्होंने लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान उनके पिता लालू यादव और उनकी मां राबड़ी देवी की 15 साल की हुकूमत में 'जंगलराज' की दुहाई दी थी.
एक्स पर तीखा जवाबी हमला करते हुए तेजस्वी ने कहा, "प्रधानमंत्री जी, अपने दौर में बिहार में जंगलराज देखिए. यूजीसी नेट के पेपर के लीक होने की जांच करने नवादा आई सीबीआई की टीम पर हमला हुआ. पेपर लीक आपकी सरकार में, सीबीआई पर हमला आपकी सरकार में और जंगलराज किसी और की सरकार में?"
यह आत्मविश्वास बेवजह नहीं है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को लोकसभा की महज चार सीटें मिलीं, तीन अन्य वह बहुत कम मतों के अंतर से हारी, मगर उसने अच्छे-खासे 96 लाख वोट बटोरे और बिहार में सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी बन गई. इसका मतलब है उसके पास राज्य में सबसे ज्यादा जनसमर्थन है. 2024 में राजद की वोट हिस्सेदारी में 52 फीसद का उल्लेखनीय उछाल आया, जबकि 2019 में उसे 63 लाख वोट मिले थे. (वैसे, पार्टी ने इस बार 23 सीटों पर चुनाव लड़ा, जो 2019 के मुकाबले चार ज्यादा थीं.) राजद का इरादा इस नई मिली ताकत को भुनाना है - उसके अंदरूनी लोगों को भरोसा है कि विधानसभा चुनावों में जीत उनकी पहुंच के भीतर है, जो अक्टूबर 2025 में होने है, पर शायद पहले भी हो सकते हैं.
तेजस्वी ने 21 जून को पटना स्थित अपने सरकारी आवास पर पार्टी नेताओं की मैराथन बैठक बुलाई. संदेश साफ था, खासकर उन लोगों के लिए, जो अपने-अपने विधानसभा हिस्से में बढ़त हासिल नहीं कर सके - कड़ी मेहनत करो या विधानसभा चुनाव का टिकट पाने का मौका गंवा दो. तय समय से पहले चुनाव की संभावना को देखते हुए तेजस्वी ने विधायकों को हिदायत दी कि जमीनी स्तर पर तत्काल काम शुरू करें, जनता से जुड़ें और दो महीनों में रिपोर्ट लेकर आएं कि क्या गड़बड़ी हुई और क्यों हुई. यही नहीं, उन्होंने फरमान दिया कि लोकसभा चुनाव में नाकाम रहे उम्मीदवार भी अपने लोकसभा क्षेत्र के हर विधानसभा हिस्से में आभार यात्रा निकालें. तेजस्वी भी पूरे राज्य के व्यापक दौरे की तैयारी कर रहे हैं, जो अगस्त में शुरू होना है.
तेजस्वी बढ़-चढ़कर सक्रिय दिखाई देते हैं, तो एनडीए के साथी दल भी एकजुट मोर्चा पेश करने के लिए उतने ही तैयार हैं. पटना में भाजपा की चुनाव प्रबंधन समिति की बैठक के बाद 6 जून को उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जद(यू) प्रमुख और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति अपनी पार्टी के समर्थन की तस्दीक की. उन्होंने कहा, "हम 1996 से नीतीश कुमार की अगुआई में चुनाव लड़ते आ रहे हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे. नीतीश के नेता बने रहने में क्या भला क्या दिक्कत है?"
यह स्वीकृति महज इसलिए नहीं है कि नीतीश लोकसभा में उनके 12 सांसदों को देखते हुए भाजपा के लिए अपरिहार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि बिहार में तेजस्वी की अगुआई में इंडिया गुट के मातहत विपक्ष अपनी सबसे मजबूत स्थिति में है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, "भाजपा को एहसास हो गया है कि बिहार में यह अकेले चलने का समय नहीं है. हमें अभी आत्मनिर्भर होना बाकी है." नीतीश ने केंद्र में भाजपा के दूससे सबसे अहम सहयोगी होने की अपनी स्थिति मजबूत कर ली है. वहीं लोकसभा चुनाव के नतीजों पर करीब से नजर डालने पर राजद के लिए ज्यादा उम्मीदों भरा अफसाना सामने आता है.
राजद की वोट हिस्सेदारी में जहां उछाल आया है, भाजपा और जद(यू) की वोट हिस्सेदारी में मामूली गिरावट आई है. भाजपा की वोट हिस्सेदारी 2019 में 23.6 फीसद से घटकर 2024 में 20.5 फीसद हो गई, वहीं जद(यू) की हिस्सेदारी 21.8 फीसद से घटकर 18.5 फीसद हो गई है. इसके विपरीत राजद की वोट हिस्सेदारी 2019 में 15.4 फीसद से बढ़कर अब 22.1 फीसद पर पहुंच गई है. वोट हिस्सेदारी के लिहाज से राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने और शून्य के मुकाबले चार सीटें जीतने के अलावा राजद की वोट हिस्सेदारी में आया सुधार भाजपा-जद(यू) की संयुक्त गिरावट के काफी बराबर था.
राजद के वोटों में आए उछाल का श्रेय अकेले उसके पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक को नहीं दिया जा सकता. पार्टी ने कुशवाहा मतदाताओं के बड़े हिस्से को आकर्षित किया है, जो राज्य के जाति सर्वेक्षण के मुताबिक, बिहार की आबादी में 4.2 फीसद हैं. यह बदलाव काफी हद तक इसलिए आया कि राजद की अगुआई वाले विपक्ष ने लोकसभा चुनाव में सात कुशवाहा उम्मीदवार मैदान में उतारे, जबकि जद(यू) के दो कुशवाहा उम्मीदवार थे और भाजपा की तरफ से कोई भी नहीं था. जद(यू) के एक के मुकाबले विपक्ष के केवल दो कुशवाहा उम्मीदवार चुनाव जीते, पर नतीजों से पता चलता है कि राजद ने अच्छी-खासी तादाद में कुशवाहा वोट खींचकर नीतीश के 'लव-कुश' (कुर्मी-कुशवाहा) गठजोड़ को कामयाबी से तहस-नहस कर दिया.
तेजस्वी का असर 2020 के विधानसभा चुनाव में दिखा, जब उन्होंने जद(यू)-भाजपा गठबंधन के खिलाफ राजद की अगुआई की और वह 75 सीटों और 23.1 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उस साल उनके रोजगार-केंद्रित अभियान ने राजद की लड़ी 144 सीटों पर करीब 39 फीसद वोट हासिल किए और अपने मुस्लिम-यादव आधार की पारंपरिक 32 फीसद वोट हिस्सेदारी से आगे निकल गए.
दोनों गठबंधनों की कुल वोट हिस्सेदारी से भी यह बदलाव दिखता है. 2019 में एनडीए ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 39 जीती थीं, तब एनडीए और महागठबंधन की वोट हिस्सेदारी में 21 फीसद से ज्यादा का फासला था. 2024 में महागठबंधन के 36.5 फीसद के मुकाबले एनडीए के 47.2 फीसद वोटों के साथ यह फासला कम हो गया. फासला अब भी काफी है, पर राजद के नेतृत्व वाला विपक्ष एनडीए के दबदबे में सेंध लगाने लगा है.
अपने चुनाव अभियान में तेजस्वी ने पूरे राज्य में भारी भीड़ जुटाई. उनके रोजगार-केंद्रित अभियान, आर्थिक न्याय के वादे और अन्य समुदायों को टिकट देकर अपनी पार्टी के सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिशों का कुछ असर पड़ा, पर यह इतना ज्यादा नहीं था कि बिहार पर एनडीए की पकड़ तोड़ सके.
दिल्ली की जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी में संकाय सदस्य और लालू की आत्मकथा गोपालगंज से रायसीना के सह-लेखक नलिन वर्मा का कहना है कि लोकसभा सीट-वार नतीजों की पड़ताल से अच्छी खबर और चेतावनी दोनों के संकेत मिलते हैं. वे कहते हैं, "अच्छी खबर यह है कि तेजस्वी यादव अपनी पार्टी का समर्थन आधार बढ़ाने में सफल रहे हैं. अपनी आकांक्षी अपील का फायदा उठाते हुए तेजस्वी ने हाशिये पर पड़े ओबीसी और ईबीसी मतदाता आधार में कुछ पैठ बनाई है. वैसे, उन्हें तादाद के लिहाज से बेहद अहम अतिपिछड़े वोट का बड़ा हिस्सा अभी हासिल करना है, जो लोकसभा चुनाव के दौरान भी नीतीश कुमार के प्रति वफादार रहा." यही वजह है कि तेजस्वी को अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए बड़ी छलांग लगानी होगी.

