scorecardresearch

कौन हैं ओडिशा में भाजपा के आदिवासी तुरुप मोहन चरण माझी?

मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी पर भाजपा के भीतर से अपेक्षाओं का दबाव ही नहीं होगा, बल्कि उन्हें नौ अनुभवहीन मंत्रियों और दो साझेदारों के साथ मिलकर सरकार चलानी है

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले मोहन चरण माझी पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से अपने घर पर मुलाकात करते हुए
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले मोहन चरण माझी पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से अपने घर पर मुलाकात करते हुए
अपडेटेड 25 जून , 2024

भाजपा के पहले और राज्य के सबसे युवा तथा तीसरे आदिवासी मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के मुताबिक, ''भाजपा को ओडिशा में बहुमत इसलिए मिला क्योंकि राज्य के 4.5 करोड़ लोग बदलाव चाहते हैं. उन्होंने भाजपा पर भरोसा जताया और हमने ओडिशा को नंबर वन बनाने का संकल्प लिया है.'' जाहिर है, माझी से लोगों को भारी उम्मीदें होंगी. आखिर इन्हीं उम्मीदों के साथ लोगों ने पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और उनकी बीजू जनता दल (बीजद) के 24 साल के शासन के खात्मे का जनादेश सुना दिया. बेशक, माझी पर अब वादों पर खरा उतरने का दबाव होगा.

क्योंझर विधानसभा सीट से चौथी बार विधायक बने 52 वर्षीय माझी के साथ इस दबाव और जिम्मेदारियों को दो उप-मुख्यमंत्री 62 वर्षीय कनक वर्धन सिंहदेव और 57 वर्षीया प्रावती परिदा साझा करेंगे. यह सरकार मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों के फॉर्मूले पर चलेगी. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि सबके साथ विचार-विमर्श के साथ सरकार चलाई जाए और सभी पक्षों का ख्याल रखा जाए, न कि पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की तरह उनकी सरकार भी वन-मैन शो बनकर न रह जाए. नई सरकार को अनुभवहीनता से भी निबटना है. भुवनेश्वर में 12 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह समेत भाजपा के अनेक शीर्ष नेताओं और 77 वर्षीय पटनायक की मौजूदगी में शपथ लेने वाले 16 मंत्रियों में से नौ पहली बार के विधायक हैं. इकलौते सिंहदेव को ही मंत्री पद का अनुभव है.

राज्य की 147 सदस्यीय विधानसभा में 78 विधायकों के साथ भाजपा के पास मामूली बहुमत है. लेकिन पार्टी नेताओं का मानना है कि माझी की साधारण पृष्ठभूमि उन्हें और सरकार को स्वीकार्य बनाएगी. नतीजे आने के बाद ओडिशा के मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम मीडिया में छाए थे लेकिन पार्टी नेतृत्व की तरफ से उन्हें तवज्जो नहीं दी गई. माझी ने अपना राजनैतिक जीवन पंचायत स्तर से शुरू किया और अपनी मेहनत के बूते शीर्ष तक पहुंचे हैं.

वे पहली बार 1992 में केंदुझर सदर ब्लॉक के सदस्य बने और फिर 1997 में रायकला पंचायत के सरपंच बने. राजनीति में उतरने से पहले माझी केंदुझर जिले के झुमपुरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाते थे और धीरे-धीरे भाजपा के वैचारिक संगठन के साथ जुड़ गए. गांव के एक स्कूल के चपरासी के इस बेटे के पास ढेंकानाल लॉ कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री है. 

अपने तीसरे विधायक कार्यकाल (2019-2024) के दौरान, माझी विपक्ष के मुखर मुख्य सचेतक के रूप में उभरे. उन्होंने कई बार सदन में अपने धारदार भाषणों से सत्तारूढ़ खेमे को लाजवाब कर दिया, खासकर जब विपक्ष के नेता प्रदीप्त कुमार नाइक कोविड से पीड़ित थे. माझी आदिवासी नेता के तौर पर तुरुप का पत्ता साबित हो सकते हैं. हालांकि सोशल इंजीनियरिंग में माहिर भाजपा ने बोलांगीर राज-परिवार के सिंहदेव और ओबीसी नेता परिदा के जरिए सरकार में संतुलन बनाने की कोशिश की है.

भुवनेश्वर के राजनैतिक टिप्पणीकार संदीप मिश्रा का कहना है कि भाजपा ने इलाकावार संतुलन का भी ख्याल रखा है. मिश्रा कहते हैं, "माझी उत्तर ओडिशा में आदिवासी बेल्ट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि सिंहदेव पश्चिमी क्षेत्र से आते हैं, जो भाजपा का गढ़ है. परिदा के जरिए पार्टी तटीय क्षेत्रों में पैठ बढ़ाना चाह रही है, जिसे बीजद का गढ़ माना जाता है."

माझी की तरह सिंहदेव भी अनुभवी नेता हैं. वे 1995 से पटनागढ़ से विधायक हैं, 2019 में सिर्फ एक बार बीजद से हारे थे. ओडिशा के पूर्व भाजपा अध्यक्ष 2000 से 2009 के बीच राज्य में बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री थे. परिदा नीमपाड़ा से पहली बार के विधायक हैं.

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, सरकार के तीनों शीर्ष पदाधिकारियों में सिंहदेव सबसे मुखर हैं. पूर्व मुख्यमंत्री राजेंद्र नारायण सिंहदेव के पोते अपने साफ नजरिए के लिए जाने जाते हैं. एक सूत्र के मुताबिक, "यह वाकई आश्चर्यजनक है कि केंद्रीय नेताओं ने कनक बाबू को उप-मुख्यमंत्री चुना. वे आलाकमान के आदेश पर चलने के आदी नहीं हैं. वे पहले भी पार्टी से अलग हो चुके हैं." सिर्फ सिंहदेव ही नहीं, माझी की चुनौती नौकरशाही भी होगी, क्योंकि यह आम धारणा है कि पूर्व मुख्यमंत्री पटनायक ने अपने शासन के अंतिम 10 वर्षों में वरिष्ठ अधिकारियों को खुली छूट दे रखी थी और सारे फैसलों में पूर्व नौकरशाह वी.के. पांडियन की चलती थी.

मिश्रा कहते हैं, "पटनायक की बेहतर कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने से लेकर भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के आदेशों को पूरा करने और सबको साथ लेकर चलने के लिए माझी सरकार को कई चीजों पर विचार करना होगा." इस दौरान पटकथा के हिसाब से माझी ने काम तो शुरू कर दिया है. माझी कैबिनेट की पहली बैठक में ही जगन्नाथ पुरी मंदिर के चारों द्वार खोलने का फैसला किया गया. कोविड के समय पटनायक सरकार ने इन्हें बंद करा दिए थे और भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था.

इसके अलावा, माझी कैबिनेट ने 12वीं शताब्दी के इस मंदिर के रखरखाव के लिए 500 करोड़ रुपए के कोष की स्थापना का प्रस्ताव भी पारित किया. 13 जून को प्रस्ताव पारित करने के बाद मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट के सदस्य रात को ही पुरी पहुंच गए. माझी और सभी मंत्रियों और पुरी के सांसद संबित पात्रा की मौजूदगी में सुबह मंदिर के द्वार खुलवाए गए.

कैबिनेट की बैठक के बाद माझी ने कहा कि धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,100 रुपए प्रति क्विंटल करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए जा चुके हैं. इसके लिए एक कमेटी का भी गठन किया जा रहा है. साथ ही सरकार सुभद्रा योजना को भी कार्यकाल के 100 दिनों में लागू करने के लिए कदम उठा रही है. इसके लिए कार्ययोजना तैयार करने के लिए अफसरों को कह दिया गया है. इस योजना के तहत पात्र हरेक महिला को 50 हजार रु. के कैश वाउचर दिए जाने हैं.

जाहिर है माझी पार्टी के वादे और एजेंडे पर बखूबी अमल में जुटे हैं. फिलहाल, माझी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नौकरशाही के रवैये की है. मीडिया से बातचीत में इसका जिक्र भी मुख्यमंत्री कर चुके हैं. उन्होंने विभागों की समीक्षा भी की है. इस दौरान कई ऐसे अफसर विभागों में तैनात पाए गए जो कि पहले ही सेवानिवृत्ति हो चुके थे. विभागों के नौकरशाह माझी के विभिन्न सवालों का जवाब तक नहीं दे सके.

सार यह है कि नौकरशाही बहुत हावी हो चुकी थी. इस लिहाज से आने वाले दिनों में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी की बड़ी सर्जरी देखने को मिल सकती है क्योंकि नई नवेली भाजपा सरकार को अपनी मौजूदगी के साथ बदलाव का एहसास भी जनता को कराना है.

ओडिशा में सत्ता परिवर्तन एक बड़ी घटना है जिसके लिए भाजपा ने काफी पसीना बहाया है. उसे अपने वादे पूरे करने और नई योजनाओं के सफल क्रियान्यवन के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी. आदिवासी नेता माझी पहली बार सीएम बने हैं, उन पर नतीजे दिखाने का दबाव है. देखते हैं, वे किस हद तक सफल होंगे.

- अर्कमय दत्ता मजूमदार

Advertisement
Advertisement