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कर्नाटक के लोकसभा नतीजों ने डीके शिवकुमार को क्यों दिया झटका?

कांग्रेस का वोट शेयर काफी बढ़ गया है, लेकिन कर्नाटक के नतीजों से सत्तारूढ़ पार्टी बहुत खुश नहीं है

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सांसद राहुल गांधी और सीएम सिद्धारमैया शिमोगा में, मई 2024
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सांसद राहुल गांधी और सीएम सिद्धारमैया शिमोगा में, मई 2024
अपडेटेड 24 जून , 2024

अप्रैल की 26 तारीख को कर्नाटक में लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए धुआंधार प्रचार के बीच, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य के अर्सिकेरे क्षेत्र में एक कानून की छात्रा से एक अनूठा स्मृति चिन्ह पाकर रोमांचित हो उठे. पिछले साल सत्ता संभालने के बाद कर्नाटक में महिलाओं के लिए बस यात्रा मुफ्त करने के बाद से उस लड़की ने जो 'शून्य किराया’ वाली बस टिकटें इकट्ठी की थीं, उन्हें एक माला में पिरोया था. कांग्रेस की कल्याणकारी योजनाएं, खास तौर पर महिलाओं के बीच हिट रही हैं, और यह सदभावना ही थी जिस पर पार्टी लोकसभा चुनावों में दोहरे अंक की जीत की उम्मीद कर रही थी.

यह अभी भी तय नहीं है कि इन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हुआ या नहीं. कांग्रेस का वोट शेयर काफी बढ़ गया है, लेकिन कर्नाटक के नतीजों से सत्तारूढ़ पार्टी बहुत खुश नहीं है. सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली सरकार को कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में से 14 से अधिक पर जीत की उम्मीद थी, लेकिन वह केवल नौ सीटें ही जीत सकी.

संयोग से, यह ठीक उतनी ही सीटें थीं, जितनी कांग्रेस ने 2014 में सिद्धारमैया के सीएम के रूप में पहले कार्यकाल के दौरान जीती थीं. इसका मतलब है कि मई 2023 में कर्नाटक में सत्ता में आई कांग्रेस पिछले दो दशकों से राज्य में चली आ रहे एक विरोधाभासी रुझान को उलटने में असमर्थ रही है - कर्नाटक के मतदाता विधानसभा चुनाव और आम चुनाव के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचते हैं.

कांग्रेस कर्नाटक में 2004 से दो बार स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई है, लेकिन लोकसभा चुनावों में यह एकल अंक से आगे नहीं बढ़ पाई है. इसी अवधि के दौरान, भाजपा ने लगातार हर लोकसभा चुनाव में सीटों का बड़ा हिस्सा जीता है, लेकिन राज्य चुनाव में पूर्ण बहुमत अब भी उसे नहीं मिल पाया है. भाजपा अब 17 लोकसभा सीटों के साथ इस चुनाव में भी शीर्ष पर बनी हुई है, जबकि एनडीए की उसकी सहयोगी पार्टी जनता दल (सेक्युलर) दो सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही है.

4 जून को नतीजों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा, "भाजपा और जद (एस) दोनों का वोट शेयर कम हुआ है. मतदान में हमारा हिस्सा बढ़ा है." उन्होंने स्वीकार किया, "लेकिन हम उतनी सीटें नहीं जीत सके, जितनी हमने हिसाब लगाई थी." भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी पर पलटवार करते हुए मीडिया से कहा, "मुख्यमंत्री के लिए जश्न मनाने की कोई वजह नहीं है. कर्नाटक के लोगों ने स्पष्ट रूप से कांग्रेस के वादों के मुकाबले प्रधानमंत्री मोदी के प्रदर्शन पर अपना भरोसा दिखाया है." वैसे, 2019 की 25 सीटों की तुलना में भाजपा की सीटों की संख्या में आठ की कमी आई है.

इस बीच, कांग्रेस की अपने लक्ष्य तक पहुंचने में विफलता से उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को कड़ी चोट पहुंची है, क्योंकि वोक्कालिगा मतदाताओं के प्रभुत्व वाली सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन फीका रहा. कर्नाटक में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल वोक्कालिगा राज्य के प्रमुख समुदायों में से एक है. शिवकुमार खुद वोक्कालिगा हैं. वे इस समुदाय की कमान संभालने के लिए जद (एस) के संरक्षक एच.डी. देवेगौड़ा के परिवार से होड़ कर रहे हैं.
 
दक्षिणी स्पीड ब्रेकर

परिणामों का जाति-आधारित विश्लेषण कर्नाटक में मतदान पैटर्न की स्पष्ट तस्वीर देता है. कांग्रेस ने उत्तरी कर्नाटक की 14 सीटों में से आधी सीटें जीतीं. उसने कल्याण कर्नाटक के पिछड़े उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सभी पांच सीटों पर जीत हासिल की, जो कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह क्षेत्र है. पार्टी ने दो और सीटें जीतीं - चिक्कोडी और दावणगेरे, दोनों ही वीरशैव-लिंगायत गढ़ में स्थित हैं. इन जीतों का श्रेय क्रमश: पीडब्ल्यूडी मंत्री सतीश जरकीहोली और वरिष्ठ कांग्रेस विधायक शमनूर शिवशंकरप्पा के परिवारों को दिया जा रहा है. वीरशैव-लिंगायत समुदाय को वापस लुभाने में भाजपा ने उत्तर में शेष सात सीटें जीतीं.

कांग्रेस वोक्कालिगा मतदाताओं के प्रभुत्व वाले दक्षिणी कर्नाटक में अच्छा प्रदर्शन करने में विफल रही, जहां उसने 14 में से केवल दो सीटें जीतीं. राजनैतिक टिप्पणीकार नरेंद्र पाणि कहते हैं, "वोक्कालिगा कांग्रेस से दूर हो गए हैं." पुराने मैसूर क्षेत्र में कांग्रेस की ओर से मैदान में उतारे गए छह वोक्कालिगा उम्मीदवारों में से केवल एक, हासन में श्रेयस पटेल, जीतने में सफल रहे. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिवकुमार ने कहा, "विधानसभा चुनाव के मुकाबले पुराने मैसूर क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन गिर गया है, लेकिन यह रुझान लंबे समय से रहा है."

वोक्कालिगा समुदाय पारंपरिक रूप से जद (एस) प्रमुख देवेगौड़ा और उनके परिवार के पीछे लामबंद होता रहा है. हालांकि, एक साल पहले कर्नाटक के डिप्टी सीएम ने जद (एस) को पीछे धकेलते हुए पुराने मैसूर क्षेत्र से कांग्रेस के लिए अच्छी खासी सीटें हासिल की थीं. इस उपलब्धि के साथ-साथ 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में पार्टी के 135 सीटों के प्रभावशाली स्कोरकार्ड ने शिवकुमार को - जो कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख भी हैं - सिद्धारमैया के साथ सीएम पद के दावेदार के रूप में मजबूती से खड़ा कर दिया था.

पिछले एक साल के दौरान दोनों शीर्ष नेताओं के बीच एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ मची रही, जिसमें शिवकुमार की आकांक्षा रही कि वे मुख्यमंत्री बनें. कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं की ओर से भी समय-समय पर शिवकुमार के साथ डिप्टी सीएम के तौर पर शामिल होने की मांग की जाती रही है. पाणि कहते हैं कि दक्षिण कर्नाटक में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद यह मांग फिर से उठ सकती है.

कांग्रेस के अपने चुनावी प्रदर्शन का जायजा लेने के साथ ही यह देखा जाएगा कि अन्य वरिष्ठ नेताओं, खासकर मंत्रियों ने अपने-अपने गढ़ों में कैसा प्रदर्शन किया, इसी के आधार पर उनको प्रोत्साहन मिलेगा. हालांकि उसकी मुख्य चिंता आगे आने वाली चुनौतियों को लेकर होगी. लोकसभा के नतीजे संकेत देते हैं कि भाजपा-जद (एस) की क्रमश: प्रमुख वीरशैव-लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों को एकजुट करने की कोशिश कामयाब रही है.

- अजय सुकुमारन

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