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राजस्थान को अपना गढ़ मानने वाली बीजेपी को जनता ने क्यों दिया झटका?

जनता से जुड़े मुद्दों को दरकिनार करने वाली भाजपा को राजस्थान ने दिया तगड़ा झटका, निकट भविष्य में पार्टी की प्रदेश इकाई के भीतर हालात और बिगड़ने के आसार

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (बीचोबीच) सचिन पायलट और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ चित्तौड़गढ़ की एक रैली में
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (बीचोबीच) सचिन पायलट और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के साथ चित्तौड़गढ़ की एक रैली में
अपडेटेड 21 जून , 2024

राजस्थान में लगातार दो बार क्लीन स्वीप करने वाली भाजपा को अबकी अप्रत्याशित हार मिली. राज्य की सभी 25 सीटों पर उसे हैट्रिक लगाने से रोकने में कांग्रेस कामयाब रही. भाजपा की ओर से उठाए गए मंगलसूत्र छीनने और मुस्लिम आरक्षण खत्म करने जैसे मुद्दों पर अग्निवीर, बेरोजगारी और महंगाई जैसे कांग्रेस के मुद्दे हावी रहे. कांग्रेस की अगुआई वाला इंडिया गठबंधन भाजपा से 11 सीटें छीनने में सफल रहा.

राजस्थान में 2019 में 61.2 फीसद वोट पाने वाला एनडीए गठजोड़ इस बार 49.24 फीसद पर आ गया. वहीं इंडिया गठबंधन का वोट प्रतिशत 2019 के मुकाबले 34.6 फीसद से बढ़कर 44 फीसद से ऊपर पहुंच गया. राजस्थान में सबसे चर्चित रहीं नागौर, बाड़मेर, चूरू और बांसवाड़ा सीटों पर भाजपा को करारी शिकस्त मिली. नागौर में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान के दिग्गज जाट नेता नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा को लगातार दूसरी बार हराया. 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में आईं ज्योति 2009 के बाद से लगातार पांच चुनाव हार चुकी हैं. उनका सियासी भविष्य अब अधर में है.

बांसवाड़ा सीट भारतीय आदिवासी पार्टी के खाते में गई. यहां चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा में पधारे आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय घर के रहे न घाट के. सीकर सीट पर 1996 से लगातार लड़ते आए माकपा के अमराराम 28 साल बाद दिल्ली पहुंचेंगे. उनके समर्थक हर चुनाव में नारा लगाते रहे हैं: "लाल-लाल लहरावेलो, अमरो दिल्ली जावेलो." इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार अमराराम ने लगातार दो बार सांसद रहे सुमेधानंद सरस्वती को पटखनी दे सांसदी पक्की की. चूरू में कांग्रेस 26 साल बाद खाता खोल पाई. इस बार टिकट कटने पर भाजपा के दो बार के सांसद राहुल कस्वां ने कांग्रेस का दामन थामा था. उन्होंने पैराओलंपियन देवेंद्र झांझरिया को हराया.

निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भाजपा के बागी रवींद्र सिंह भाटी के कारण हॉट सीट बनी बाड़मेर पर भी कांग्रेस ने 10 साल बाद कब्जा जमाया. केंद्रीय मंत्री और भाजपा प्रत्याशी कैलाश चौधरी 4.17 लाख वोट के साथ तीसरे नंबर पर खड़े पाए गए. कांग्रेस प्रत्याशी उम्मेदाराम बेनीवाल से लोहा लिया शिव क्षेत्र से विधायक और निर्दलीय प्रत्याशी भाटी ने.

राजस्थान में खासकर शेखावाटी में केंद्र की अग्निवीर योजना के खिलाफ जमकर मतदान हुआ. झुंझुनूं, सीकर, चूरू, नागौर, करौली-धौलपुर, टोंक-सवाई माधोपुर, भरतपुर, बाड़मेर और दौसा जिलों में सर्वाधिक सैनिक हैं. इन सभी सीटों पर भाजपा खेत रही. इसी योजना के चलते विधानसभा चुनाव में भी शेखावाटी की 21 सीटों में भाजपा को सिर्फ 6 ही मिली थीं.

जातीय ध्रुवीकरण भी भाजपा की हार का बड़ा कारण रहा. चूरू लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहे राहुल कस्वां का टिकट कटने के बाद राजस्थान का चुनाव जातिगत आधार पर बंट गया. जातिगत गोलबंदी ने बाड़मेर, नागौर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं सीटों पर कांग्रेस को लाभ पहुंचाया. भरतपुर में 1992 के कुम्हेर कांड - जाट-जाटव दंगे में 16 लोग मारे गए थे - के बाद पहली बार जाट और जाटव साथ दिखाई दिए. इस चुनाव में दोनों समुदायों ने जल हाथ में लेकर साथ देने का वादा किया.

भाजपा में जहां तक हार की जिम्मेदारी का सवाल है, पहली बार विधायक बने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने राज्य भर में जमकर प्रचार किया था. जिम्मा तो पार्टी हाइकमान और राज्य के दूसरे नेताओं को लेना पड़ेगा. भाजपा को उम्मीद थी कि पूर्वी राजस्थान के भरतपुर से आने वाले शर्मा गुर्जर और मीणा समुदाय बहुल इस इलाके में असर दिखाएंगे पर युक्ति नाकाम रही. भरतपुर सीट पर वह कांग्रेस की संजना जाटव से हार गई.

तो क्या यह माना जाए कि राज्य की राजनीति में मोटे तौर पर दरकिनार कर दी गईं भाजपा की दिग्गज वसुंधरा राजे सिंधिया की वापसी होगी? लगता तो यही है. लोकसभा चुनाव के नतीजों और प्रथम बार के मुख्यमंत्री के खिलाफ बढ़ते असंतोष ने राजे की स्थिति को मजबूत किया है. पूर्वी राजस्थान में पार्टी को जिताने का जिम्मा संभालने वाले दिग्गज और राज्य के कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की मंशा जताई है.

अपने को मिले मंत्रालय और सरकार में बात न सुने जाने को लेकर पहले से उखड़े मीणा ने अगर इस्तीफा दिया तो इससे असंतोष को और हवा मिलेगी. इस पर हाइकमान को कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. अब यह देखने की बात होगी कि आलाकमान राजे को ज्यादा अधिकार देता है या झालावाड़-बारां से पांचवीं बार जीते उनके बेटे दुष्यंत को कहीं समायोजित करता है. शर्मा की सरकार हाल के वर्षों में सबसे लचर सरकार मानी जा रही है. ऐसे में पार्टी के भीतर राजे को आधे कार्यकाल के लिए सीएम बनाने की मांग उठने लगी है.

दूसरी ओर, कांग्रेस अब मजबूत स्थिति में है. पांच साल तक सरकार चलाने के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट लगातार लड़ते आए थे. उसके बाद वे विधानसभा चुनाव में उतरे. उन दिनों को बिसराते हुए अब वे भाजपा को कमजोर विकेट पर देखकर खुश हैं. हालांकि, गहलोत अपने बेटे वैभव को जालौर सीट पर जिता नहीं पाए. इसके अलावा कांग्रेस के आठ नए सांसदों में से कम से कम चार उनके धुर विरोधी पायलट के खेमे से हैं.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी अपना क्षमता साबित कर दी है, ऐसे में पार्टी आलाकमान उन्हें हटाना नहीं चाहेगा. पायलट के पास अब मौका है कि वे अपनी साख बनाएं और 2029 के विधानसभा चुनावों के लिए खुद को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर तैयार करें. लोकसभा चुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को राज्य में बहुत कुछ ठीक करने का मौका दे दिया है.

इंडिया गठबंधन को जातिगत समीकरण, अग्निपथ और आरक्षण जैसे मुद्दों पर वोट हासिल हुए. दूसरी ओर भाजपा वोटों के लिए लगभग पूरी तरह से पीएम मोदी पर ही आश्रित हो गई

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