तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का नारा 'नारपतुम नमते' (सभी चालीस हमारे हैं) जोर-शोर से गूंजा, जिससे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) ने तमिलनाडु की सभी 39 लोकसभा सीटों के साथ-साथ पुदुच्चेरी की एकमात्र सीट पर कब्जा कर लिया.
2019 में मिली हार के बाद अपनी किस्मत बदलने की उम्मीद कर रहे अखिल भारतीय द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) के लिए यह पूरे सफाए के साथ गहरी निराशा वाला चुनाव साबित हुआ. दक्षिणी गढ़ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवेश के मद्देनजर इस चुनाव को हिंदुत्व और द्रविड़ विचारधाराओं के बीच टकराव के रूप में भी देखा गया था.
भगवा पार्टी को पैर जमाने से रोकते हुए द्रमुक प्रमुख उस लड़ाई में भी कामयाब हुए. जीत के बाद स्टालिन ने कहा, ''यह हमारे द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत है. संविधान को फिर से लिखने की भाजपा की योजना और उसका नफरत भरा अभियान लोगों को प्रभावित करने में नाकाम रहा.''
विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस, वाम और अन्य समान विचारधारा वाले दलों के साथ विजयी गठबंधन बनाने के बाद द्रमुक उस पर कायम रहा. स्टालिन की कल्याणकारी विशेष रूप से महिला मतदाताओं को सशक्त बनाने वाली पहलकदमियां निर्णायक साबित हुईं. महिलाएं अन्नाद्रमुक के संस्थापक एमजी रामचंद्रन के जमाने से ही पार्टी का मुख्य मतदाता आधार रही हैं.
महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, परिवार की महिला मुखिया के लिए 1,000 रुपए मासिक भत्ता और मुफ्त स्कूल भोजन ने श्रमिक वर्ग को गहराई से प्रभावित किया. लेकिन कुछ विश्लेषक एसपीए की शानदार जीत का श्रेय द्रमुक शासन के पक्ष में किसी रुझान के बजाए ''मोदी फोबिया'' को देते हैं.
द्रमुक के बढ़त बनाने के साथ ही अन्नाद्रमुक और भाजपा के नेतृत्व वाले मोर्चों के बीच दूसरे स्थान के लिए होड़ लग गई. एक ओर जहां अन्नाद्रमुक 24 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही, उसके सहयोगी तीन और सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे. भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सिर्फ 12 निर्वाचन क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रहा.
कोयंबत्तूर में भाजपा के राज्य प्रमुख के अन्नामलै का जोरदार प्रचार अभियान द्रमुक के गणपति पी राजकुमार से 1,18,000 से ज्यादा मतों से भारी हार के साथ खत्म हो गया. अन्नाद्रमुक के पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम भी रामनाथपुरम में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़खड़ा गए.
राजनैतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, ''द्रमुक की जीत को और भी उल्लेखनीय बनाने वाली बात यह है कि 1967 के बाद यह पहली बार है कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया है, जबकि इस तरह की पिछली उपलब्धियां विपक्षी बेंचों से आई थीं.''
द्रमुक के अंदरूनी सूत्र इसका श्रेय 2019 से निरंतर गठबंधन में एकजुटता और निर्वाचन क्षेत्र-स्तर के प्रयासों को देते हैं. उसकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने भरपूर लाभ उठाया, जिसमें पूर्व नौकरशाह शशिकांत सेंथिल (तिरुवल्लूर) समेत सभी नौ उम्मीदवारों को लोकसभा में पहुंचने का टिकट मिल गया.
अब आगे क्या
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में दो साल बाकी हैं. ऐसे में प्रमुख द्रविड़ पार्टियों का सहारा लिए बिना अपना गठबंधन बनाने की भाजपा की रणनीति अब तक नाकाम रही है. अच्छी बात यह रही कि उसका वोट शेयर लगभग तिगुना हो गया और 2019 के 3.7 फीसद से बढ़कर 11.2 फीसद पर पहुंच गया. हालांकि इसका श्रेय उसके ज्यादा सीटों पर लड़ने को दिया जा सकता है.
पार्टी ने पिछले चुनाव में पांच सीटों से बढ़कर इस बार 23 सीटों पर चुनाव लड़ा. ऐसा लगता है कि अन्नाद्रमुक भी 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार नहीं है. मणिवन्नन कहते हैं, ''भाजपा की सोची-समझी रणनीति ने अन्नाद्रमुक को कमजोर कर दिया है. आंतरिक आलोचना तो खैर होनी ही है लेकिन अलग हुए नेताओं टीटीवी दिनकरन और ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) की हार के साथ एडप्पादी के पलानीस्वामी (विपक्ष के नेता ईपीएस) एक ताकत बने हुए हैं.''
भाजपा के अपनी रणनीति पर फिर से काम करने और अन्नाद्रमुक की ओर हाथ बढ़ाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. चेन्नै स्थित राजनैतिक टिप्पणीकार एन सत्यमूर्ति कहते हैं, ''अतीत में साथ मिलकर काम करने से कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन द्रमुक शासन के खिलाफ किसी भी सत्ता-विरोधी भावना को एक साथ भड़काने का लालच बना रह सकता है.''
तमिलनाडु में विस्तार के लिए भाजपा को अपने हिंदुत्व के मुद्दे को थोड़ा नीचे लाना होगा, दक्षिण विरोधी होने की धारणा को मिटाना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात, जैसा कि मूर्ति कहते हैं, भगवा पार्टी को ''सेंगोल को बढ़ावा देने'' जैसी प्रतीकात्मकता से परे तमिल संस्कृति को अपनाने की अपनी प्रामाणिकता साबित करनी होगी.
इसके बावजूद, द्रमुक भी केंद्र के साथ और अधिक संघर्ष के लिए तैयार है क्योंकि अब उसे अधिक आक्रामक राज्यपाल आरएन रवि से निबटना होगा, जिन्होंने कई विधेयकों के पारित होने की राह में अड़ंगा लगाया है और विधानसभा को संबोधित करने के पारंपरिक तरीकों पर विवाद खड़ा किया है. राज्यपाल के टकराव के इस पहलू के अलावा वित्तीय हस्तांतरण, परिसीमन और अंतर-राज्यीय नदी विवाद संभावित टकराव के बिंदु बन सकते हैं.

