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पूर्वोत्तर : आम चुनाव में भाजपा के दावों के बीच कांग्रेस ने कैसे मारी बाजी?

देश के पूर्वोत्तर इलाके का विकास करने के भाजपा के वादों के बावजूद लोकसभा चुनाव नतीजों से साफ है कि यह इलाका अब कांग्रेस को तरजीह देने लगा

असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसरमा शिवसागर जिले में प्रचार के दौरान
असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसरमा शिवसागर जिले में प्रचार के दौरान
अपडेटेड 24 जून , 2024

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 10 साल के दौरान अक्सर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के विकास की बात करते रहे हैं. हाशिए पर पड़ा यह इलाका बुनियादी ढांचे और सामाजिक-आर्थिक तरक्की के मामले में पिछड़ा हुआ है.

भाजपा के दिग्गज नेता केंद्र में पिछली सरकारों की राजनैतिक उदासीनता को इसके लिए दोषी ठहराते हुए कभी भी यह बताने का मौका नहीं चूकते कि प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अपने सभी पूर्ववर्तियों की संयुक्त यात्राओं के मुकाबले पूर्वोत्तर की कहीं अधिक यात्राएं कीं.

फिर भी जब मणिपुर एक साल से ज्यादा समय तक जातीय हिंसा में घिरा रहा, जिसमें 200 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और 60,000 लोग विस्थापित हो गए, तो प्रधानमंत्री ने भाजपा शासित इस हिंसाग्रस्त राज्य का एक बार भी दौरा नहीं किया. उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ने में दो महीने से ज्यादा का वक्त लगा दिया.

इसके विपरीत, विपक्षी कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और पीड़ितों के साथ वक्त बिताया. पार्टी की युवा शाखा के प्रमुख श्रीनिवास बीवी ने राज्य का नियमित दौरा किया और राहत सामग्री वितरित की. इस साल की शुरुआत में राहुल की अगुआई में मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत की गई थी. लोकसभा चुनाव में यह प्रयास रंग लाया.

कांग्रेस ने दोनों सीटों पर कब्जा कर लिया: मैतेई हिंदू बहुल इनर मणिपुर सीट और नगा तथा कुकी—जिनमें ज्यादातर ईसाई हैं—प्रभाव वाली आउटर मणिपुर सीट पर भी. इस जीत को और भी वजनदार बनाने वाली बात यह है कांग्रेस के वोट शेयर में जबरदस्त उछाल आया है. यह 2019 में 25 फीसद था जो अब बढ़कर 48 फीसद पहुंच गया है. भाजपा का वोट शेयर 2019 में 34 फीसद के मुकाबले लुढ़ककर 17 फीसद रह जाना उसकी शर्मनाक हार का संकेत है.

और मणिपुर कोई अपवाद नहीं है. कांग्रेस ने पड़ोसी नगालैंड में दो दशक में पहली बार आश्चर्यजनक जीत हासिल की है. वहां उसने एनडीए की सहयोगी सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) को हराया है. मेघालय में भी इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने 1998 के बाद पहली बार तुरा सीट जीती.

उस साल मुख्यमंत्री कोनराड संगमा के पिता पी.ए. संगमा ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी. इस बार कांग्रेस उम्मीदवार सालेंग संगमा ने नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) की अगाथा संगमा को हराया, जो कोनराड संगमा की बहन हैं और एनपीपी की प्रमुख भी हैं.

हालांकि कांग्रेस ने अपना पारंपरिक गढ़ शिलांग एक नवगठित संगठन वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी के हाथों खो दिया. इस पूरे उलटफेर के साथ पूर्वोत्तर में कांग्रेस की संख्या 2019 में चार से लगभग दोगुनी होकर अब सात हो गई है.

दरअसल, कांग्रेस को सबसे निर्णायक जीत असम की दो सीटों पर मिली, जहां उसने 2019 की अपनी तीन की संख्या को बरकरार रखा. बारपेटा एक ऐसी सीट थी जहां मुसलमान वोट कांग्रेस या एआइयूडीएफ को बढ़त मुहैया करते थे. परिसीमन की प्रक्रिया ने इस सीट की जनसांख्यिकीय संरचना को बदल दिया और कलियाबोर लोकसभा सीट को खत्म कर दिया जहां से दो बार के सांसद और दिवंगत मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई चुनाव लड़ते थे.

लेकिन चुनाव से कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने उन्हें जोरहाट से चुनाव लड़ने के लिए कहा. पिछले दो लोकसभा चुनाव में इस सीट—जिसमें गोगोई परिवार का गृहनगर टीटाबोर भी शामिल—से भाजपा के उम्मीदवार चुने जाते रहे.

मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वसरमा ने इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया था. अपने लगभग पूरे कैबिनेट सहयोगियों और भाजपा के विशाल संसाधनों को उन्होंने चुनाव अभियान में झोंक दिया था. इसके अलावा इस निर्वाचन क्षेत्र में गौरव के कई करीबी विश्वासपात्रों ने चुनाव से ठीक पहले भाजपा का दामन थाम लिया था. वित्तीय संकट और जनशक्ति की कमी से परेशान होकर गौरव ने प्रियंका गांधी के इकलौते रोड शो को छोड़कर लगभग अकेले ही चुनाव प्रचार किया.

सभी बाधाओं के बावजूद लगातार तीसरी बार मिली इस जीत ने 41 वर्षीय गौरव को मुख्यमंत्री सरमा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित कर दिया है. संसद में उनके जोशीले भाषणों की बदौलत—और असम के सांसदों से ऐसा कम ही सुनने को मिलता है—राज्य में विभिन्न जाति समूहों और भौगोलिक क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. गौरव का 54 फीसद वोट शेयर और सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फॉलोइंग इस रुझान का संकेत है.

दूसरा बड़ा झटका कांग्रेस विधायक रकीबुल हुसैन ने दिया. उन्होंने धुबरी में एआइडीयूएफ (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के प्रमुख और तीन बार के सांसद बदरुद्दीन अजमल को हराया. मुस्लिम वोटों के बड़ी संख्या में एआइडीयूएफ के हासिल कर लेने की वजह से कांग्रेस को पिछले कई चुनावों में चुनावी नुक्सान उठाना पड़ा था और कई बार उसे अजमल की पार्टी से हाथ मिलाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

लेकिन भाजपा के तेजी से उभरने और एआइयूडीएफ के सीएम सरमा के मुस्लिम विरोधी बयान का कारगर तरीके से मुकाबला करने में नाकाम रहने की वजह से ज्यादातर मुसलमान मतदाता कांग्रेस के पीछे एकजुट हो गए. रकीब ने इस भावना का फायदा उठाया और अजमल को 10 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराकर 60 फीसद वोट हासिल किए.

इस तरह से इन दो सीटों पर कांग्रेस को मिली जीत ने असम की 14 लोकसभा सीटों—भाजपा (9) और सहयोगी (2)—पर एनडीए के शानदार प्रदर्शन को कुछ हद तक फीका कर दिया. हालांकि 2019 की उसकी टैली में दो और सीटें जुड़ गईं. असम के अलावा, भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश (2) और त्रिपुरा (2) में चार में से चार सीटें जीतकर अन्य दो गढ़ों में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है. इस तरह पूर्वोत्तर में उसकी समग्र संख्या लगभग पहले जैसी बनी हुई है.

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