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नीतीश कुमार : सौ बार फना होके, सौ बार खड़े होंगे

लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार की सियासत के खत्म होने की पेशीन-गोई की जा रही थी लेकिन नतीजे आने के साथ ही वे किंगमेकर बन गए

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 11 मई को सीतामढ़ी में जद (यू) उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार के दौरान 
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 11 मई को सीतामढ़ी में जद (यू) उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार के दौरान 
अपडेटेड 20 जून , 2024

यह 3 जून का दिन था. एग्जिट पोल के नतीजों के शोर के बीच नीतीश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने दिल्ली गए थे. वे बिहार के कुछ मसलों पर मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मिलकर बात करना चाहते थे. वे चाहते थे कि दोएक दिन यानी दिल्ली में नई सरकार के गठन तक वहीं रहें. मगर मोदी से बातचीत के दौरान संभवत: उन्हें अच्छा रेस्पॉन्स नहीं मिला, इसलिए तय यात्रा अधूरी छोड़ वे पटना लौट आए.

उनके करीबी लोग बताते हैं कि इस यात्रा से वे खासे निराश थे. कहने लगे थे कि ज्यादा दबाव बढ़ा तो अब वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे. 4 जून को नतीजे वाले दिन वे सुबह-सुबह सात सर्कुलर रोड वाले उस सरकारी बंगले की तरफ गए, जिसमें वे 2015 में रहा करते थे, जब उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ मिल भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था और कड़ी शिकस्त दी थी.

चार जून को जैसे-जैसे नतीजे सामने आने लगे, उनकी उदासी छंटने लगी. एक वक्त उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) अपने हिस्से की 16 में से 14 सीटों पर आगे चल रही थी, जबकि भाजपा 17 में से 12 पर. अंत में भाजपा और जद (यू) के हिस्से 12-12 सीटें आईं. इन नतीजों ने उनके चेहरे पर स्थायी किस्म की मुस्कुराहट ला दी.

अगले दिन वे फिर दिल्ली रवाना हो गए. इस बार वे बिन बुलाए मेहमान न थे. दिल्ली में पक्ष और विपक्ष हर कोई उनका इंतजार कर रहा था. विमान में उनके सहयात्रियों में कुछ ही महीने पहले उनके डिप्टी रहे तेजस्वी यादव भी थे, जिन्होंने इस चुनाव के बाद जद (यू) के खत्म होने की घोषणा की थी, हालांकि इस चुनाव में उनकी पार्टी राजद के हिस्से सिर्फ चार सीटें आईं.

वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की बैठक में शामिल होने दिल्ली पहुंचे थे मगर उनके आवास के बाहर विपक्षी दलों के राजनैतिक कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे, "नीतीश जी हमारे साथ आ जाइए." कभी पलटू बाबू कहकर नीतीश का मजाक उड़ाने वाले विपक्षी और समर्थक उनसे राष्ट्रहित में एक बार और पलट जाने की गुहार लगा रहे थे.

दिनभर इस बात के कयास लगते रहे कि नीतीश एनडीए में रहेंगे या फिर से इंडिया गठबंधन की तरफ आ जाएंगे. मगर वे इन कयासों के बीच अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ एनडीए की बैठक में अपने पुराने मित्र चंद्रबाबू नायडू के साथ बैठे थे, जिन दोनों के हाथों में इस बार सत्ता की असल कुंजी है.

तीन से 5 जून के बीच काफी कुछ बदल गया. लोकसभा चुनाव के बाद उनके खत्म होने की भविष्यवाणी तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर तक ने कर दी थी. वही नीतीश अब नई सरकार के किंगमेकर कहे जा रहे हैं. बहुमत से 32 सीटें पीछे छूट गई भाजपा उनके तमाम नखरे उठा रही है.

उनके कहे बिना ही बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने घोषणा कर दी है कि एनडीए राज्य में 2025 का विधानसभा चुनावी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा. ये वही सम्राट हैं जिन्होंने नीतीश को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतारने के लिए कभी पगड़ी बांध ली थी और कहा था कि यह पगड़ी तभी उतरेगी, जब नीतीश कुर्सी छोड़ेंगे. सम्राट नीतीश की ही सरकार में डिप्टी सीएम हैं और पगड़ी सिर पर अभी भी बंधी है.

इधर, जद (यू) के प्रवक्ता प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नई सरकार के सामने कई शर्तें रख रहे हैं. इनमें बिहार को विशेष दर्जा देने, अग्निवीर योजना वापस लेने और समान नागरिक संहिता जैसी योजना पर फिर से विचार करने जैसी बातें हैं. पार्टी की तरफ से कम से कम तीन कैबिनेट मंत्रालय की मांग है. इशारों-इशारों में कहा जा रहा है कि वाजपेयी सरकार में पार्टी के पास रक्षा और रेल जैसे मंत्रालय रहे हैं. तीन दिन पहले अप्रासंगिक मान लिए गए नीतीश की यह नई ताकत सबको हैरत में डाल रही है. जानकार उनकी तुलना उस फीनिक्स पक्षी से कर रहे हैं, जो आखिर में खुद को जला लेता है और अपनी राख से ही फिर से पैदा हो जाता है.

हीरो से जीरो और जीरो से हीरो हो जाना नीतीश के राजनैतिक करियर के लिए कोई नया मामला नहीं. वे पहले भी कई दफा अप्रासंगिक मान लिए गए थे पर कुछ ही दिन बाद फिर से प्रासंगिक हो गए. सबसे दिलचस्प मामला 2014 लोकसभा चुनाव का है. पीएम पद की महत्वाकांक्षा लिए नीतीश ने वह चुनाव अकेले लड़ा और राज्य में महज दो सीटों पर सिमट गए.

फिर उन्होंने सीएम की कुर्सी भी छोड़ दी और अपनी ही पार्टी के महादलित नेता जीतनराम मांझी को सीएम बना दिया. मांझी जल्द हाथ से निकल गए और उन्होंने बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें सत्ता से हटाया. अगले ही साल उन्होंने चिर-प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव से समझौता किया और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में अजेय मानी जाने वाली मोदी और शाह की भाजपा को जबरदस्त शिकस्त दी.

2020 के विधानसभा चुनाव में भी जब उनकी सीटें 71 से घटकर 43 रह गईं और वे भाजपा के रहमो-करम पर आ गए तो भविष्यवाणी की जाने लगी कि भाजपा कभी भी जद (यू) को अपने में समेट लेगी. 2022 में फिर से उन्होंने राजद का साथ लिया और भाजपा के मंसूबे धरे के धरे रह गए.

इस चुनाव ने साबित किया है कि भले लोग नीतीश के खत्म हो जाने की भविष्यवाणी करते रहें, 2005 के बाद जिस अति पिछड़ा और महिला वोटरों को उन्होंने साथ जोड़ा है, वह कमोबेश उनके साथ खड़ा है. 2019 में 17 सीटों पर लड़ते हुए जद (यू) को 22.3 फीसद वोट मिले थे, 2024 में 16 सीटों पर उसे 18.52 फीसद वोट मिले हैं.

नीतीश की राजनीति को शुरू से देखने वाले राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी भी उनकी इस ताकत की सराहना करते हैं. वे कहते हैं, "2005 से ही नीतीश ने अति पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को साथ जोड़ा है. उन्हें आगे बढ़ाया है. मुसलमानों में पसमांदा वर्ग को साथ लिया. महिलाओं का नीतीश के जमाने में अच्छा इंपावरमेंट हुआ है. वे चाहे पंचायत की महिलाएं हों, जीविका दीदियां या बिहार पुलिस की महिलाएं. ये महिलाएं उनके शासन काल में सशक्त हुई हैं तो भला उनका साथ कैसे छोड़ सकती हैं. इसके अलावा, नीतीश भाजपा के साथ रहने पर भी सांप्रदायिक मुद्दों पर भाजपा को बहुत छूट नहीं देते. ये बातें उनके पक्ष में जाती हैं. हालांकि भ्रष्टाचार के मसले पर वे अभी भी कुछ निर्णायक नहीं कर पाए. मैं इसे उनकी कमजोरी समझता हूं."

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, पटना के पूर्व प्रभारी पुष्पेंद्र कहते हैं, "उन्होंने बिहार को हिंसा के दौर से बाहर निकाला, बिहार में शांति बहाल की. यह बात महिलाओं को काफी पसंद आई है. जीविका से जुड़ी महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हुई. शराबबंदी के फैसले ने भी इस महिलाओं को नीतीश का प्रशंसक बनाया है. इसकी वजह से नीतीश के असर में वैसी गिरावट नहीं आई, जिसकी हम कल्पना कर रहे थे."

इस नई ताकत ने उनकी सेहत को लेकर चल रही चर्चाओं को भी पीछे छोड़ दिया है. उनके करीबी जो उनकी मानसिक सेहत को लेकर परेशान रहते थे, अब कह रहे हैं, यह पावर आने के बाद उनकी स्थिति स्थिर लग रही है. मगर इसके साथ ही नीतीश को लेकर कई तरह के कयास भी हैं: वे कब तक एनडीए के साथ रहेंगे? कहीं वे बीच में ही साथ छोड़ उस इंडिया गठबंधन की तरफ तो नहीं चले जाएंगे, जिसे खड़ा करने की शुरुआत उन्होंने खुद की थी?

नीतीश के करीबी मानते हैं, फिलहाल राज्य और केंद्र दोनों भाजपा का रुख नीतीश के प्रति न सिर्फ सकारात्मक है, बल्कि वह नीतीश की सियासी ताकत को स्वीकार कर चुकी है. ऐसे में अगर भाजपा ने उन्हें छेड़ा नहीं, उनकी कुछ शर्तें मान लीं और 2025 का चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा गया तो वे शायद ही अब छोड़कर जाएं. वे रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहे हैं. 2025 का चुनाव शायद उनका आखिरी हो. फिर वे दिल्ली में किसी अच्छे पद के साथ रिटायर होना चाहते हैं. उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति का पद, जिसकी आकांक्षा वे लंबे समय से पाले हैं. इस बीच वे मजबूत उत्तराधिकारी तलाशने की कोशिश भी करते रहेंगे.

इस चुनाव में एनडीए की मुख्य घटक भाजपा ने भी 12 सीटें हासिल की हैं. हालांकि उसने जद (यू) के मुकाबले एक ज्यादा यानी 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे अपनी पांच सीटें गंवानी पड़ीं: औरंगाबाद, बक्सर, सासाराम, पाटलिपुत्र और आरा. सबसे अच्छे नतीजे तो चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) के आए. पांच सीटों पर मैदान में थी, पांचों जीत गई. आधिकारिक तौर पर तो चिराग पासवान ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन दिया है, पर चर्चा है कि पार्टी दो मंत्रालय चाहती है.

बिहार में इंडिया गठबंधन का प्रदर्शन पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर पर अपेक्षा के अनुरूप न था. राजद, खासकर पार्टी के शीर्ष नेता तेजस्वी यादव ने इस चुनाव के लिए खासी मेहनत की थी. उन्होंने 251 रैलियां कीं मगर पार्टी को 23 में से सिर्फ चार सीटें हाथ आईं.

चुनाव में कांग्रेस और भाकपा माले का प्रदर्शन अच्छा रहा. कांग्रेस को 9 में से तीन सीटें हाथ आईं: किशनगंज, कटिहार और सासाराम. माले को तीन में से दो सीटों पर सफलता मिली: आरा और काराकाट. सबसे बड़ी कामयाबी तो निर्दलीय पप्पू यादव के हाथ आई, जो चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के सदस्य बने थे. अपनी जनाधिकार पार्टी का उन्होंने कांग्रेस में विलय किया था. मगर पूर्णिया सीट पर राजद ने बीमा भारती को टिकट दे दिया, सो उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा. उनके विरोध में नरेंद्र मोदी की रैली भी हुई, तेजस्वी ने तो कैंप भी किया. पप्पू फिर भी पास हुए.

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