दरअसल, के. चंद्रशेखर राव ने राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता से कदम रखने के ऐलान के साथ जब अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) रखा तो तेलंगाना भवन 'देश के नेता केसीआर' जैसे नारे से गूंज उठा था. यह बात 5 अक्टूबर, 2022 की है.
अब, कभी तेलंगाना में बेहद मजबूत पकड़ रखने वाली बीआरएस को ए. रेवंत रेड्डी की अगुआई वाली कांग्रेस से विधानसभा चुनाव में मिली हार के बमुश्किल छह महीने बाद ही लोकसभा चुनाव में भी शर्मनाक शिकस्त का सामना करना पड़ा है. 2019 में राज्य की 17 लोकसभा सीटों में से 9 सीटें जीतने वाली पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर 41.3 फीसद से गिरकर 16.7 फीसद हो गया. विधानसभा चुनाव में 37.4 फीसद वोट शेयर के साथ महज एक-तिहाई सीटें जीतने के बाद कमजोर पड़ी बीआरएस में नई जान फूंकने के लिए केसीआर ने जोरशोर से बस यात्रा निकाली और अपने प्रचार अभियान में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. मगर सत्तारूढ़ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी पर उनके हमले निरर्थक साबित हुए.
दोनों राष्ट्रीय दलों ने आठ-आठ सीटें जीतीं. वहीं, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी हैदराबाद में अपना गढ़ बचाने में कामयाब रहे. कांग्रेस की सीटों के बढ़ने का श्रेय मुख्यमंत्री रेड्डी को मिल रहा है जो राज्य में पार्टी के अध्यक्ष भी हैं. मगर, असल सफलता तो भाजपा के हाथ लगी है, जिसने राज्य में बीआरएस की कीमत पर अपनी पैठ बढ़ाई है. भगवा पार्टी का उदय उसके कांग्रेस के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरने का स्पष्ट संकेत है.
तेलंगाना में करीब एक दशक तक शासन करने वाली बीआरएस के पतन के लिए मुख्य तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री की गलतियों को ही जिम्मेदार माना जा सकता है. किसानों के लिए महत्वाकांक्षी रायथु बंधु योजना शुरू में तो बीआरएस समर्थकों का दिल जीतने में सफल रही. मगर बाद में पार्टी भ्रष्टाचार के आरोपों के भंवर में घिर गई. बीआरएस को सियासी संकट से उबारने के केसीआर के प्रयास नाकाफी रहे. साथ ही कई बीआरएस नेताओं के पाला बदलकर कांग्रेस और यहां तक भाजपा में शामिल होने से भी उन्हें करारी चोट पहुंची. अब केसीआर के लिए अपने 39 विधायकों को पार्टी के प्रति निष्ठावान बनाए रखना भी मुश्किल होगा, क्योंकि 119 सदस्यीय विधानसभा में 64 के साधारण बहुमत वाली कांग्रेस जरूर अपनी ताकत बढ़ाना चाहेगी.
बहरहाल, बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष और केसीआर के बेटे के.टी. रामा राव दावा करते हैं कि पार्टी 'हार नहीं मानेगी' और 'फिर उठ खड़ी होगी.' केसीआर की तात्कालिक चुनौती यह है कि कुछ ही समय बाद होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन कैसे सुधरेगा. उन्हें अहम वोट बैंक माने जाने वाले पिछड़े वर्गों (बीसी) का समर्थन बनाए रखना होगा क्योंकि अन्य वंचित तबकों का झुकाव कांग्रेस की ओर हैं. वैसे, राजनीति विज्ञानी ई. वेंकटेशु का मानना है कि कृषि ऋण माफी और जाति जनगणना के रेड्डी के वादे को देखते हुए यह काम थोड़ा मुश्किल है. ऐसे में बीआरएस कोई मजबूत रणनीति बनाकर ही खुद को बचा सकती है.

