उत्तरी गुजरात में एक सीट—बनासकांठा—छोड़ दें तो राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उम्मीद के मुताबिक अपना दबदबा बरकरार रखा है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसने सभी 26 सीटें जीती थीं. इस बार सत्तारूढ़ पार्टी का एक तरह से लक्ष्य था कि हर सीट 5 लाख वोटों के अंतर से जीतनी है.
अंतिम आंकड़े आने के बाद वह तीन सीटों—गांधीनगर में अमित शाह, नवसारी में सीआर पाटील और वडोदरा में नए उम्मीदवार हेमांग जोशी—पर यह फासला हासिल करने में कामयाब रही. राजकोट के उम्मीदवार परषोत्तम रूपाला 4,84,260 वोटों के मार्जिन से जीते.
राजपूत महाराजाओं के खिलाफ रूपाला की टिप्पणी से तूफान खड़ा हो गया था और क्षत्रिय समुदाय ने उनका टिकट वापस लेने की मांग करते हुए भाजपा के खिलाफ अभियान चलाया था. नतीजों के बाद भाजपा प्रवक्ता यमल व्यास ने कहा कि क्षत्रियों ने भाजपा के खिलाफ वोट नहीं दिया है.
अमरेली के निवासी रूपाला को राजकोट से खड़ा किया गया था. इसी तरह भावनगर के केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया को पोरबंदर से लड़ने के लिए कहा गया जहां वे 3,83,360 वोटों से जीते. भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोटों की हिस्सेदारी में क्रमश: 0.35 फीसद और 0.87 फीसद की गिरावट आई है जबकि इंडिया ब्लॉक के साथ दो सीटों पर चुनाव लड़ने वाले नए दल आम आदमी पार्टी को 2.5 फीसद वोट मिले.
भाजपा की लगातार सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदाबहार लोकप्रियता और सभी स्थानीय निकायों में पार्टी के दबदबे को दिया जाता है. निकायों में दबदबा होने से पार्टी की घर-घर तक पहुंच है. हालांकि गुजरात में मतदान के तौर-तरीकों से जाहिर होता है कि महंगाई, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने और भ्रष्टाचार से निबटे जाने की जरूरत है.
भाजपा सूत्रों ने गोपनीय तौर पर माना कि पार्टी में असंतोष है और यह असंतोष वफादार कार्यकर्ताओं की कीमत पर कांग्रेस नेताओं को शामिल करने और पुरस्कृत करने और मतदाताओं की निराशा से उपजा है, जिससे भाजपा के अभेद्य गढ़ में कुछ दरारें दिखने लगी हैं.
बनासकांठा में कांग्रेस उम्मीदवार गेनीबेन ठाकोर वाव विधानसभा क्षेत्र से दो बार की विधायक, 30,406 वोटों के मामूली अंतर से जीती हैं. 48 वर्षीया ठाकोर की जीत का श्रेय कठोर मेहनती नेता के रूप में उनकी लोकप्रियता को दिया जाता है. ठाकोर ने इस सीट पर अपने अभियान के लिए जनता से धन जुटाकर मुकाबला किया. कांग्रेस प्रवक्ता मनीष दोशी कहते हैं, "बनास नी बेन" संसद में 'गुजरात नी बेन' होंगी—जनता के असली मुद्दे दिल्ली में उठाए जाएंगे."
बनासकांठा की जीत ने उस पार्टी के अंदर नई ऊर्जा फूंक दी है जिसने 2014 और 2019 के चुनाव में एक भी सीट नहीं जीती थी. उम्मीद थी कि कांग्रेस कम से कम दो और सीट—पाटण तथा आणंद—जीतेगी जबकि भरुच में कड़ी टक्कर मानी जा रही थी. भाजपा ने सभी तीनों सीटें थोड़े कम मार्जिन के साथ जीतीं.
आम आदमी पार्टी (आप) भरुच में 85,696 वोटों से हार गई जबकि भरुच में उसके उम्मीदवार विधायक चैतर वसावा आदिवासी युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. भावनगर में आप उम्मीदवार उमेश मकवाणा 4,55,000 वोट से हारे.
लुब्बोलुबाब? लोकसभा चुनाव नतीजों में गुजरात के मतदाताओं ने विनम्रता से भाजपा को याद दिला दिया है कि उनकी वफादारी को हमेशा के लिए पक्का नहीं माना जा सकता.

