क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कथित भूमि घोटाले के मामले में हिरासत में होने के कारण हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के लिए सहानुभूति वोटिंग हुई? हां और नहीं. हालांकि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से नौ पर जीत हासिल की, लेकिन वह राज्य में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए आरक्षित सभी पांच सीटें हार गया.
इसकी वजह से 2019 के पिछले चुनाव में जीती गई 12 सीटों से उसकी संख्या तीन कम हो गई. जेएमएम और उसके सहयोगियों ने जनवरी में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के हाथों हेमंत की गिरफ्तारी को केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आदिवासी विरोधी रुख के उदाहरण के रूप में पेश किया है. 4 जून को एक ओर जेएमएम ने एसटी सीटों में से तीन पर जीत हासिल की, वहीं दो पर सहयोगी कांग्रेस ने जीत हासिल की.
भाजपा की कम सीटें और एसटी-आरक्षित सीटों के नतीजे हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन के लिए राहत की बात है, जो अपने पति की गिरफ्तारी के बाद से जेएमएम का सार्वजनिक चेहरा बनकर उभरी हैं. उनके लिए 4 जून के नतीजे व्यक्तिगत जीत भी लेकर आए. 31 जनवरी को गिरफ्तारी से पहले हेमंत के सीएम पद से इस्तीफे से राज्य की जेएमएम-कांग्रेस-राष्ट्रीय जनता दल सरकार के नेतृत्व में भी एक शून्य पैदा हो गया था. इस खाली जगह को कल्पना अपनी भाभी सीता सोरेन की ओर से उठाई गई आपत्तियों की वजह से नहीं भर सकीं.
सीता तब झामुमो की विधायक थीं. नतीजतन, 67 वर्षीय चंपई सोरेन को सीएम बनाया गया. कल्पना ने 4 जून को 20 मई को हुए गांडेय उपचुनाव में भी 27,149 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. उनकी जीत में जो चीज अतिरिक्त मिठास जोड़ सकती है, वह है सीता का परिवार के गढ़ दुमका से हारना. मार्च में सीता ने भाजपा में शामिल होने के लिए झामुमो को छोड़ दिया और उन्हें दुमका से एनडीए उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा गया. लेकिन वे झामुमो के नलिन सोरेन से 22,527 मतों के अंतर से सीट हार गईं.
राजनैतिक पर्यवेक्षक सुमन के. श्रीवास्तव ने कहा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे झारखंड में भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी हैं, खासकर जब राज्य में चुनाव सिर्फ तीन महीने बाद अक्तूबर में होने हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, झारखंड के मतदाताओं में 26 फीसद आदिवासी हैं. भाजपा ने अतीत में इस समुदाय के प्रभाव का अनुभव किया है. 2019 में राज्य में लोकसभा चुनाव जीतने के कुछ महीनों बाद पार्टी और उसके सहयोगी विधानसभा चुनाव हार गए. इसकी वजह यह बताई गई कि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भाजपा ने खराब प्रदर्शन किया, जिनमें से भाजपा केवल दो सीटें जीत पाई थी.

