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कांग्रेस के उभार और कट्टरपंथियों की चुनौती के बीच पंजाब में कैसे फंस गई 'आप'?

पंजाब में अगली लड़ाई पांच विधानसभा सीटों के उपचुनाव के रूप में होगी जो मान और आप की ताकत का लिटमस टेस्ट होगा

भगवंत मान मुख्यमंत्री, पंजाब
भगवंत मान मुख्यमंत्री, पंजाब
अपडेटेड 21 जून , 2024

राष्ट्रीय स्तर पर संकट झेल रही आम आदमी पार्टी (आप) के लिए पंजाब से आई खबरें राहत देने वाली नहीं हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार के लिए एक तरह के इस मध्यावधि जनमत संग्रह में आप इस सीमांत राज्य की 13 लोकसभा सीटों में से महज तीन पर ही जीत हासिल कर सकी. उसका वोट प्रतिशत गिरकर 26.3 फीसद पर पहुंच गया जो दो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में 42 फीसद था.

दूसरे राज्यों में कांग्रेस के साथ सीटों का समझौता करने वाली आप ने पंजाब में अकेले ही लड़ने का फैसला किया और मान ने पार्टी का अभियान चलाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली. उन्होंने आप उम्मीदवारों के प्रचार के लिए दिल्ली और दूसरे राज्यों का दौरा करने के अलावा 25 दिन में 122 आम सभाएं और रोड शो किए. लेकिन उनका यह अभियान, जो 'संसद विच वी भगवंत मान'  के नारे के इर्द-गिर्द था, मतदाताओं को लुभाने में नाकाम रहा. 

नतीजों से राज्य में मान की घटती लोकप्रियता उजागर हो गई है जब दो साल पहले उन्होंने 117 विधानसभा सीटों में से 92 हासिल की थीं. इस आम चुनाव में आप के उम्मीदवार महज 27 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहे जबकि कांग्रेस 40 विधानसभा सीटों पर आगे रहते हुए सात लोकसभा सीट जीतने में सफल रही. पारंपरिक पंथिक मतदाताओं के संरक्षक शिरोमणि अकाली दल (शिअद) की सीट सिमटकर महज एक रह गई - हरसिमरत कौर बादल अपने पारिवारिक गढ़ बठिंडा में जीतीं और पार्टी महज 13.4 फीसद वोट हासिल कर पाई. कट्टरपंथियों को अच्छा-खासा समर्थन मिला.

निर्दलीय के रूप में लड़ते हुए जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह (खंडूर साहिब) और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह का बेटा सरबजीत सिंह खालसा (फरीदकोट) भारी-भरकम अंतर से जीते, जिससे राज्य में अलगाववादी आंदोलन के उभरने और सिख युवाओं के कट्टर बनने की चिंताएं फिर से बढ़ गई हैं. इस बीच, ऐसा लगता है कि पंजाबी हिंदुओं का पटियाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और गुरदासपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ झुकाव रहा. एक भी सीट न जीतने के बावजूद भगवा पार्टी ने 24 विधानसभा क्षेत्र में बढ़त हासिल की और उसे शानदार 18.6 फीसद वोट मिले. यह 2022 के विधानसभा चुनाव के 6.6 फीसद से कहीं ज्यादा है. उस चुनाव में इन सभी क्षेत्रों में आप का ही दबदबा था.

मान की पांच कैबिनेट मंत्री उतारने की भारी रणनीति के कोई वांछित नतीजे नहीं निकले. इनमें से सिर्फ गुरमीतसिंह मीत हेयर विजेता रहे, जिन्होंने मान के पुराने संसदीय क्षेत्र संगरूर को बरकरार रखा. विपक्ष के नेता, कांग्रेस के प्रतापसिंह बाजवा आप के साथ गठजोड़ के खिलाफ थे. उन्होंने जमकर पार्टी का अभियान चलाया और खुद को मान को बड़ी चुनौती देने वाले नेता के रूप में उभार पाने में कामयाब रहे.

आप की पंजाब इकाई में एक ओर गुटबाजी बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर मान को पार्टी में फिर से नियंत्रण हासिल करने और दोबारा मतदाताओं का विश्वास हासिल करने की मुश्किल चुनौती से जूझना पड़ रहा है. खास तौर पर उसके विधायकों पर सत्ता के गुमान में रहने के आरोप लग रहे हैं. मुख्यमंत्री राज्य के खजाने को भी दुरुस्त करने में नाकाम रहे हैं. पंजाब में अगली लड़ाई पांच विधानसभा सीटों के उपचुनाव के रूप में होगी जो मान और आप की ताकत का लिटमस टेस्ट होगा.

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