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क्या हरियाणा से हो जाएगा जेजेपी का सफाया, राज्य के वोटर क्या कहते हैं?

जेजेपी के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पार्टी 'वन इलेक्शन वंडर' साबित होगी, हालांकि यह सवाल तगड़ी राजनैतिक विरासत वाले पार्टी के संस्थापक दुष्यंत चौटाला के बारे में अभी नहीं उठाया जा सकता

जेजेपी के सह-संस्थापक दुष्यंत चौटाला के लिए आगे की राह मुश्किल
जेजेपी के सह-संस्थापक दुष्यंत चौटाला के लिए आगे की राह मुश्किल
अपडेटेड 6 जून , 2024

हरियाणा के हिसार के आजाद नगर में जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) का कार्यालय है. हरियाणा के पूर्व उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी के उम्मीदवार के लिए यही केंद्रीय कार्यालय के तौर पर काम कर रहा है. यहां उम्मीदवार कोई और नहीं बल्कि दुष्यंत की मां नैना चौटाला हैं. जेजेपी कार्यालय से बमुश्किल 25 मीटर की दूरी पर बनी एक चौपाल पर तकरीबन डेढ़ दर्जन लोग बैठकर चुनावी चर्चा कर रहे हैं. इनमें से एक हैं स्थानीय किसान हरवीर सिंह. वे कहते हैं, "चौटाला परिवार की कर्मभूमि हिसार से जेजेपी इस चुनाव में और इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से साफ हो जाएगी. हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार और केंद्र की मोदी सरकार किसान आंदोलन के दौरान हम किसानों पर जुल्म कर रही थीं, तब दुष्यंत सत्ता में भागीदार थे और यह सब चुपचाप देख रहे थे. आज हिसार का हर वर्ग उनके खिलाफ है."

लोकसभा चुनाव में पूरे हरियाणा में भले ही सीधा मुकाबला प्रदेश और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी कांग्रेस में है लेकिन यहां की 10 लोकसभा सीटों पर जजपा और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में हैं. दोनों पार्टियां इनमें से उन सीटों पर अपने उम्मीदवारों की बेहतर संभावना देख रही हैं, जिन पर भाजपा के साथ गठबंधन में होने पर जेजेपी की मूल पार्टी इनेलो अपने उम्मीदवार उतारती थी. हिसार और सिरसा की गिनती ऐसी ही लोकसभा सीटों में होती है. ये दोनों ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां 2019 में पहली बार भाजपा जीती थी. 

हरियाणा की जाट राजनीति के केंद्र रोहतक, हिसार और सिरसा ही हैं. रोहतक और हिसार के कुछ हिस्से को जाटों का देशवाली क्षेत्र माना जाता है. इसमें प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा मजबूत माने जाते हैं. वहीं हिसार के एक बड़े हिस्से और सिरसा को मिलाकर जाट समाज का जो बागड़ क्षेत्र है, उसमें चौटाला परिवार मजबूत है. हरियाणा की इन जाट बहुल तीनों लोकसभा सीटों पर आम लोगों से बातचीत का लुब्बेलुबाब यही निकलता है कि चौटाला परिवार की विरासत के साथ खड़ी हुई इस नई-नवेली पार्टी जेजेपी से उनका मोहभंग हो रहा है.

दरअसल, जब ओमप्रकाश चौटाला की अध्यक्षता वाली पार्टी इनेलो को संभालने और आगे लेकर जाने पर चौटाला परिवार में विवाद हुआ तो उनके दोनों बेटों अजय चौटाला और अभय चौटाला ने अपने रास्ते अलग कर लिए. हुआ यह था कि 2018 के अक्तूबर में गोहाना में इनेलो की एक रैली हुई. इसमें पार्टी कार्यकर्ताओं ने अभय चौटाला को अपमानित किया. ओमप्रकाश चौटाला ने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई तो पता चला कि उनके दूसरे बेटे अजय चौटाला के बेटों दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला के समर्थकों ने योजनाबद्ध ढंग से अभय चौटाला को निशाना बनाया. इसके बाद ओमप्रकाश चौटाला ने दोनों पोतों को पार्टी से निलंबित कर दिया. जब अपने बेटों के समर्थन में अजय चौटाला भी उतर पड़े तो ओमप्रकाश चौटाला ने उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

इसके बाद 9 दिसंबर, 2018 को अजय चौटाला ने जेजेपी का गठन किया. कुछ ही महीने बाद 2019 के लोकसभा चुनाव हुए. पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन खाता तक नहीं खुल पाया. जिस हिसार को चौटाला परिवार की कर्मभूमि माना जाता है, वहां से इनेलो के टिकट पर दुष्यंत 2014 का लोकसभा चुनाव जीते थे. लेकिन 2019 में वे जेजेपी के उम्मीदवार के तौर पर तीन लाख से अधिक वोटों से चुनाव हार गए. हरियाणा में जेजेपी ने 2019 का लोकसभा चुनाव आम आदमी पार्टी (आप) के साथ मिलकर लड़ा था. गठबंधन के मुताबिक, सात सीटों पर जजपा और तीन सीटों पर आप ने अपने उम्मीदवार उतारे. इसके बावजूद जेजेपी खाता नहीं खोल पाई.

लेकिन लोकसभा चुनावों के छह महीने के अंदर जब विधानसभा चुनाव हुए तो अपने चुनाव चिह्न 'चाबी' को मायने देते हुए जेजेपी ने हरियाणा में सत्ता की चाबी हासिल कर ली. 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में से किसी को बहुमत नहीं मिला. 90 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा 40 सीटों पर तो कांग्रेस 31 सीटों पर रुक गई. जेजेपी को 10 सीटें मिलीं. इनमें से पार्टी की अधिकांश सीटें उसके पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र हिसार और सिरसा से थीं. खुद दुष्यंत हिसार की एक विधानसभा सीट ऊंचा कलां से विधायक बने. लोकसभा के 4.9 प्रतिशत के मुकाबले विधानसभा चुनावों में जेजेपी का वोट शेयर बढ़कर 14.8 प्रतिशत हो गया. भाजपा ने जेजेपी के समर्थन से फिर से एक बार हरियाणा में अपनी सरकार बनाई और दुष्यंत को उप-मुख्यमंत्री का पद मिला. तकरीबन साढ़े चार साल तक खट्टर सरकार में उप-मुख्यमंत्री रहने के बाद इस साल मार्च में मुख्यमंत्री पद से खट्टर के इस्तीफे के बाद जजपा से भाजपा ने नाता तोड़ा और नायब सिंह सैनी को नया मुख्यमंत्री बना दिया.

लोकसभा चुनाव के लिहाज से बीते कुछ महीनों में भाजपा छोटी से छोटी पार्टी को भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में लाने की कोशिश करती रही है. ऐसे में जेजेपी को बाहर का रास्ता दिखाना हैरानी भरा था. हालांकि बाद में भाजपा सूत्रों की तरफ से इसकी दो संभावित वजहें सामने आईं. पहली यह कि लोकसभा सीटों की जेजेपी की मांग अव्यावहारिक थी. दूसरी यह कि जाट मतदाताओं में बिखराव के लिए भाजपा ने एक रणनीति के तहत जेजेपी को अलग किया है और बाद में दोनों फिर साथ आ जाएंगी.

भाजपा के साथ मिलकर प्रदेश सरकार चलाने वाली जेजेपी 2024 के लोकसभा चुनावों में बगैर किसी सहयोगी दल के अकेले मैदान में है. किसान आंदोलन में दुष्यंत की चुप्पी के अलावा स्थानीय लोग कुछ अन्य वजहों से भी उनसे नाराज हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव में सिरसा से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाकर पटखनी खाने वाले बंसीलाल गोदारा कहते हैं, "दुष्यंत चौटाला ने पूरे प्रदेश में गली-गली में शराब की दुकानें खुलवा दीं. एक्साइज और टैक्सेशन के मंत्री होने के नाते उनके कार्यकाल में गड़बड़ियों के कई आरोप लगे. लेकिन कभी किसी की जांच नहीं हुई. उप-मुख्यमंत्री रहते हुए सिरसा के लिए भी कुछ खास नहीं किया. कोई बड़ी परियोजना न सिरसा में शुरू कराई, न हिसार में. इन सबसे जेजेपी के प्रति लोगों में काफी नाराजगी है."

इनेलो ने किसान आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था. कहा जा रहा है कि अब इसकी वजह से जेजेपी समर्थक एक बड़ा तबका वापस इनेलो की तरफ खिसक रहा है. किसानों का यही मोहभंग जेजेपी के लिए जमीनी स्तर पर भारी पड़ रहा है. सिरसा के विधायक और भाजपा की सहयोगी हरियाणा लोकहित पार्टी के अध्यक्ष गोपाल कांडा कहते हैं, "दुष्यंत ने अपनी राजनैतिक पूंजी गंवा दी है. इसकी मुख्य वजह तो किसान आंदोलन ही है. अब जेजेपी का इस क्षेत्र में फिर से खड़ा हो पाना बेहद मुश्किल है. वहीं उनके जो 10 विधायक जीते थे, उनमें से अधिकांश तो आज भाजपा के पाले में चले गए हैं." बीते दिनों खट्टर ने भी सार्वजनिक तौर पर दावा किया था कि जेजेपी के छह विधायक उनके संपर्क में हैं. प्रदेश भाजपा के नेता तो अनौपचारिक बातचीत में यह दावा भी कर रहे हैं कि आज अगर भाजपा चाहे तो जेजेपी के दो-तिहाई विधायकों के समर्थन से दुष्यंत चौटाला और उनके परिजनों को उनकी अपनी पार्टी से ही बाहर कर सकती है.

हालांकि इन सभी संभावनाओं को जेजेपी खारिज करती है. दुष्यंत की मां और हिसार से पार्टी की उम्मीदवार नैना चौटाला कहती हैं, "किसानों में पार्टी के प्रति कोई नाराजगी नहीं है. इस बार के लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव के परिणाम बताएंगे कि प्रदेश में जेजेपी पहले के मुकाबले कहीं बड़ी ताकत साबित होगी."

जेजेपी के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पार्टी 'वन इलेक्शन वंडर' साबित होगी, हालांकि यह सवाल तगड़ी राजनैतिक विरासत वाले पार्टी के संस्थापक दुष्यंत चौटाला के बारे में अभी नहीं उठाया जा सकता.

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