scorecardresearch

हरियाणा में सियासी दंगल हुआ दिलचस्प, इन सीटों पर है सबसे कड़ा मुकाबला

भाजपा नेता भी दबी जबान में यह मान रहे हैं कि इस बार पार्टी के लिए 2019 की तरह लोकसभा की दसों सीट पर जीत मिलना आसान नहीं है

कांग्रेस से भाजपा में आए अशोक तंवर सिरसा से पार्टी के उम्मीदवार हैं
कांग्रेस से भाजपा में आए अशोक तंवर सिरसा से पार्टी के उम्मीदवार हैं
अपडेटेड 29 मई , 2024

हरियाणा उन राज्यों में शुमार है जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव की सफलता दोहराना मुश्किल लग रहा है. तब पार्टी ने यहां की सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी. राज्य में उसे मुख्य चुनौती दे रही कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में छह-सात सीटों पर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार जीत सकते हैं. दूसरी तरफ, भाजपा नेता भी अनौपचारिक बातचीत में मान रहे हैं कि 2019 की सफलता दोहराना काफी मुश्किल है. उनके मुताबिक, पार्टी को इस बार एक या दो सीटों का नुक्सान हो सकता है.

जिन सीटों पर केंद्र और राज्य की सत्ताधारी भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला है, उनमें रोहतक सबसे आगे है. दिल्ली से सटी इस सीट पर 2019 में भाजपा के अरविंद शर्मा ने कांग्रेस के दीपेंद्र हुड्डा को 7,503 वोटों से हराया था. यह ऐसी सीट है जहां भाजपा पहली बार 2019 में ही जीती थी. जिस जनसंघ से भाजपा निकली है, उसके उम्मीदवार जरूर यहां से दो बार 1962 और 1971 में चुनाव जीते थे. यानी यह कांग्रेस का एक मजबूत किला है.

पिछले करीब तीन दशकों से इस सीट पर कांग्रेस की मजबूती की एक प्रमुख वजह हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं. 1991 में भूपेंद्र हुड्डा यहां से पहली बार सांसद बने और तब से 2004 तक के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 1999 का चुनाव हारे. लेकिन जब 2004 के अंत में वे हरियाणा के मुख्यमंत्री बने तो फिर 2005 में इस सीट पर उपचुनाव हुआ और उनके बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा इस सीट से सांसद बने. दीपेंद्र न सिर्फ 2009 में यह सीट जीतने में कामयाब हुए बल्कि नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद 2014 में भी उन्होंने यह सीट अपने पास बरकरार रखी.

आखिर जिस सीट पर हुड्डा परिवार का इतना असर है, उस पर 2019 में दीपेंद्र हुड्डा कैसे हार गए? वे इसके जवाब में बताते हैं, "मेरे संसदीय क्षेत्र में सेना से जुड़े परिवारों की बड़ी संख्या है. बालाकोट की वजह से इन लोगों में मोदी सरकार के प्रति समर्थन का भाव था. फिर भी स्थानीय लोगों के बीच मुझे ज्यादा बढ़त मिल रही थी लेकिन मैं पोस्टल बैलेट में मामूली अंतर से हार गया. इस बार यहां ऐसा कुछ नहीं है और मुझे बड़े अंतर से जीत का भरोसा है."

आखिर यह भरोसा क्यों हैं? दीपेंद्र बताते हैं, "मेरे पिता (भूपेंद्र हुड्डा) जब मुख्यमंत्री थे, तब उन पर सबसे बड़ा आरोप यही लगता था कि प्रदेश के दूसरे हिस्सों की उपेक्षा करके वे रोहतक के विकास पर अधिक ध्यान दे रहे हैं. सांसद के तौर पर मैंने अनगिनत विकास कार्यों के अलावा रोहतक को एजुकेशन हब बनाने की कोशिश की. लोगों के बीच उनके सुख-दुख में न सिर्फ सांसद के तौर पर रहा बल्कि चुनाव हारने के बाद भी रहा. इसलिए मुझे जीत का पक्का भरोसा है."

एक वजह जो दीपेंद्र हुड्डा नहीं बता रहे, वह है रोहतक संसदीय क्षेत्र का सामाजिक समीकरण. इस क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन 18.67 लाख है. इनमें से तकरीबन 6.5 लाख जाट हैं. हुड्डा खुद इसी समाज से आते हैं और यह उनका सबसे बड़ा वोट बैंक है. इनके साथ अगर दूसरे समाज के वोटर भी थोड़े-थोड़े जुड़ जाते हैं तो फिर जीत पक्की हो जाती है. यही वजह रही कि 2019 के लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस रोहतक संसदीय क्षेत्र की सात विधानसभा सीटों पर जीतने में कामयाब हुई और भाजपा को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा. दीपेंद्र की सभाओं में इस बार काफी जोर भी दिया जा रहा है कि यह एक नहीं बल्कि 36 जातियों की सभा है. यह इसलिए ताकि उन्हें सिर्फ जाटों का नहीं बल्कि हर समाज का नेता माना जाए.

रोहतक से कांग्रेस उम्मीदवार दीपेंद्र सिंह हुड्डा एक चुनावी रैली में

रोहतक और हिसार के कुछ हिस्से को जाटों का देशवाली क्षेत्र माना जाता है. यहां हुड्डा परिवार बेहद मजबूत है, जबकि हिसार का अधिकांश हिस्सा और सिरसा, जाट समाज का बागड़ क्षेत्र है. बागड़ में चौटाला परिवार की स्थिति मजबूत रही है.

जिस रोहतक में कांग्रेस इतनी मजबूत स्थिति में है, वहां 2019 की जीत दोहराने के लिए भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद अरविंद शर्मा को फिर उम्मीदवार बनाया है. वे अपनी जीत का दावा करते हुए कहते हैं, "हुड्डा परिवार का तिलिस्म 2019 में ही टूट चुका है. वे सिर्फ समाज के एक वर्ग की राजनीति करते हैं जबकि भाजपा मोदी जी के सबका साथ, सबका विकास की नीति के मुताबिक सबको साथ लेकर चलती है. यही वजह है कि रोहतक की जनता इस बार मुझे और बड़े अंतर से जिताएगी."

रोहतक से सटा हुआ संसदीय क्षेत्र हिसार है. वैसे तो चौटाला परिवार मूल रूप से सिरसा का है लेकिन उसकी राजनीति का केंद्र हिसार ही रहा है. भाजपा के नजरिए से देखें तो हिसार बेहद मुश्किल सीट रही है. जब ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोक दल (इनेलो) के साथ मिलकर भाजपा चुनाव लड़ती थी तो यह सीट चौटाला की पार्टी के हिस्से में जाती थी. 2019 में पहली बार यहां कमल खिला था. वह भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह को टिकट देने के बाद. बृजेंद्र सिंह ने जननायक जनता पार्टी (जजपा) के सर्वेसर्वा दुष्यंत चौटाला को तीन लाख वोटों के अधिक अंतर से हराया था. यही दुष्यंत चौटाला इनेलो की टिकट पर इस सीट से 2014 में सांसद बने थे. 2019 के विधानसभा चुनाव में दुष्यंत चौटाला की पार्टी को कुल 10 में से चार सीटें सिर्फ हिसार में मिली थीं. इस सीट का राजनैतिक समीकरण तब दिलचस्प हो गया जब वीरेंद्र सिंह और बृजेंद्र सिंह लोकसभा चुनाव के ठीक पहले वापस कांग्रेस में चले गए लेकिन बृजेंद्र को टिकट नहीं मिला. कांग्रेस ने 2004 में चुनाव जीतने वाले अपने पुराने नेता जयप्रकाश पर फिर भरोसा जताया है.

हिसार सीट इस मायने में भी दिलचस्प है कि यहां चौटाला परिवार के तीन सदस्य चुनावी मैदान में हैं. भाजपा ने रणजीत सिंह चौटाला को अपना उम्मीदवार बनाया है. रणजीत चौटाला हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के भाई हैं. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री के एक बेटे अजय चौटाला की पत्नी और प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की मां नैना चौटाला जजपा की उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में हैं. ओमप्रकाश चौटाला के दूसरे बेटे अभय चौटाला की पत्नी सुनैना चौटाला इनेलो की उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रही हैं. यानी हिसार के चुनावी मैदान में भाजपा उम्मीदवार के तौर पर 79 वर्ष के रणजीत चौटाला का मुकाबला अपने ही परिवार की दो बहुओं से है.

इस चुनाव में भाजपा की चुनौतियों से जुड़े सवाल पर रणजीत चौटाला कहते हैं, "यह विचारधारा का चुनाव है. यह चुनाव देश के विकास के लिए है. मोदी जी के नेतृत्व में जो काम हुआ है, उसे आगे बढ़ाने के लिए यहां की जनता भाजपा को वोट दे रही है." रणजीत चौटाला ने 2019 का विधानसभा चुनाव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी जीता था और बाद में वे मनोहर लाल खट्टर सरकार में बिजली और जेल मंत्री बने.

हिसार भी जाट बहुल क्षेत्र है. यहां के कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन 17.65 लाख है. इनमें से तकरीबन सात लाख जाट हैं. इसी वोट बैंक पर चौटाला परिवार के तीनों उम्मीदवारों की नजर है और इसमें बिखराव के साथ-साथ अन्य जातियों का समर्थन हासिल करने की उम्मीद कांग्रेस ने लगा रखी है. कांग्रेस उम्मीदवार जयप्रकाश कहते हैं, "हमें सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है. हरियाणा की खट्टर सरकार ने और केंद्र की मोदी सरकार ने किसान आंदोलन को कैसे कुचलने का काम किया, उसे यहां के किसान भूले नहीं हैं और किसी भी कीमत पर भाजपा का साथ नहीं देंगे." हिसार के आम लोग खुलकर यह नहीं बताते कि वे किसका समर्थन करेंगे और खुद मतदाता ही बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि इस बार क्षेत्र का वोटर बहुत साइलेंट है और पता नहीं किसे वोट दे.

हिसार से सटे सिरसा में भी दिलचस्प मुकाबला है. हरियाणा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित दो सीटों में से एक सिरसा है. रोहतक के बाद कांग्रेस जिस सीट से सबसे ज्यादा उम्मीदें लगाकर बैठी है, वह सिरसा ही है. यहां कांग्रेस उम्मीदवार पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुमारी सैलजा हैं. कुमारी सैलजा सिरसा से 1991 और 1996 में दो बार सांसद रही हैं. उनका मुकाबला कांग्रेस के ही एक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के टिकट पर ही 2009 में यहां से सांसद बने अशोक तंवर से है. वे 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार हैं. सिरसा भाजपा की पारंपरिक सीट नहीं रही है. पार्टी 2019 में पहली बार यहां से चुनाव जीती थी. तब सुनीता दुग्गल सांसद बनी थीं. पार्टी ने इस बार उनका टिकट काटकर कांग्रेस के ही एक और दिग्गज अशोक तंवर को भाजपा में शामिल कराके टिकट दिया है.

हरियाणा में सिरसा किसान आंदोलन का केंद्र रहा है. मोदी सरकार के प्रस्तावित कृषि कानूनों के खिलाफ हरियाणा के किसानों की पहली पंचायत सिरसा में ही हुई थी. ऐसे में इस सीट पर किसानों का असंतोष भाजपा के लिए भारी पड़ने का अंदेशा है. इस बारे में पार्टी उम्मीदवार अशोक तंवर कहते हैं, "मैं लगातार इस क्षेत्र में घूम रहा हूं. मुझे यह मुद्दा नजर नहीं आता. यहां के किसान जानते हैं कि राजनीति से प्रेरित कुछ लोगों के छिटपुट समूह हैं, वे भाजपा विरोधी राजनैतिक दलों के इशारे पर किसानों को उकसाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सिरसा के किसानों को भी पता है कि उनके खाते में मोदी जी ही हर साल 6,000 रुपए भेज रहे हैं. लोगों को पता है कि कैसे एमएसपी बढ़ाकर और अन्य उपाय अपनाकर मोदी सरकार ने किसानों को समृद्ध किया है."

वहीं कांग्रेस प्रत्याशी कुमारी सैलजा अपनी संभावनाओं के बारे में कहती हैं, "मोदी सरकार और खट्टर सरकार के असली चेहरे से जनता वाकिफ हो गई है. प्रदेश और केंद्र की सरकार ने कैसे किसान विरोधी रुख अपनाया, यह सबने देखा. प्रदेश की जनता इनसे त्रस्त हो गई है और इस बार पूरे हरियाणा में इनको पहले लोकसभा और बाद में विधानसभा चुनाव में सबक सिखाएगी."

सिरसा में कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन 19.60 लाख है. इनमें से तकरीबन छह लाख जाट हैं. अशोक तंवर और कुमारी सैलजा दोनों यह दावा कर रहे हैं कि इस वर्ग का वोट उन्हें मिलेगा. सिरसा के स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुमारी सैलजा की असली चुनौती कांग्रेस के अंदर से है. इस बार टिकट बंटवारे में उनकी बिल्कुल नहीं चली और पूरा टिकट बंटवारा भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हिसाब से हुआ. कांग्रेस कार्यकर्ता कहते हैं कि अब तक यह साफ नहीं है कि भूपेंद्र हुड्डा कुमारी सैलजा का चुनाव प्रचार करने आएंगे या नहीं और अगर वे नहीं आते हैं तो फिर कुमारी सैलजा के लिए सिरसा से तीसरी बार सांसद बनने की राह मुश्किल हो जाएगी. कांग्रेस की इस आंतरिक खींचतान पर भाजपा के एक स्थानीय नेता यह दावा भी करते हैं, "जिन भूपेंद्र हुड्डा ने कांग्रेस में अशोक तंवर को हमेशा परेशान किया, वही हुड्डा अब परदे के पीछे से इस बार अशोक तंवर को चुनाव जिताएंगे."

सिरसा में अशोक तंवर को मजबूती देने का काम गोपाल कांडा की हरियाणा लोकहित पार्टी भी कर रही है. गोपाल कांडा बताते हैं, "एनडीए में साझेदार के तौर पर हम भाजपा प्रत्याशी का समर्थन कर रहे हैं. इस क्षेत्र में भाजपा और हमारी पार्टी के एक साथ आने से एक और एक दो की नहीं बल्कि एक और एक ग्यारह की स्थिति है."

सिरसा अलग-अलग डेरों का भी एक प्रमुख केंद्र है. ये डेरे अब भी बेहद प्रभावी हैं. डेरा सच्चा सौदा और राधास्वामी सत्संग व्यास जैसे कई डेरे यहां हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि सार्वजनिक तौर पर ये डेरे किसी का समर्थन नहीं करते लेकिन आखिरी समय पर अंदर ही अंदर किसी राजनैतिक दल का समर्थन कर देते हैं और इन्हें मानने वाले लोग इसी हिसाब से मतदान करते हैं. 2019 में डेरों का समर्थन भाजपा को मिला था और इस बार भी ऐसी ही संभावना जताई जा रही है. ऐसा माना जाता है कि यहां के डेढ़ से दो लाख वोटों पर डेरों का नियंत्रण है.

हरियाणा में रोहतक, हिसार और सिरसा के अलावा एक और दिलचस्प सीट कुरूक्षेत्र बताई जा रही है. 2014 और 2019 में यहां से भाजपा जीती थी. 2019 में इस सीट से सांसद बनने वाले नायब सिंह सैनी अब हरियाणा के मुख्यमंत्री हैं. कांग्रेस के टिकट पर दो बार सांसद रहे नवीन जिंदल इस बार भाजपा के उम्मीदवार हैं. इंडिया गठबंधन के तहत यह सीट आम आदमी पार्टी (आप) को मिली है. आप ने दिल्ली से अपने पूर्व राज्यसभा सांसद सुशील कुमार गुप्ता को यहां से उम्मीदवार बनाया है. यहां इनेलो के उम्मीदवार अभय चौटाला हैं. स्थानीय लोग इसे कांटे की टक्कर वाली सीट मान रहे हैं.

पूरे हरियाणा में 2024 के लोकसभा चुनाव में एक ट्रेंड साफतौर पर दिख रहा है. भाजपा जहां यह चुनाव राष्ट्रीय मुद्दे पर लड़ रही है, वहीं कांग्रेस बहुत आक्रामक ढंग से स्थानीय मुद्दे उठा रही है. कांग्रेस की तरफ से हर छोटी-बड़ी सभा में कहा जा रहा है कि पहले भाजपा को लोकसभा में हराना है और इसके बाद विधानसभा में. कांग्रेस की सभाओं में लगातार चंडीगढ़ में प्रदेश सरकार बदलने की बातें की जा रही हैं. 

दरअसल, लोकसभा चुनावों के छह महीने के अंदर हरियाणा में विधानसभा चुनाव होना है. ऐसे में कांग्रेस लोकसभा चुनावों को विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल बनाकर लड़ने की कोशिश कर रही है.

Advertisement
Advertisement