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क्या राजस्थान के गरीब बच्चे नहीं पढ़ पाएंगे अंग्रेजी?

राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार पिछली सरकार के कार्यकाल में खुले महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की समीक्षा करा रही है जिसे विपक्ष इन स्कूलों को बंद करने की साजिश बता रहा है

जयपुर के विद्याधर नगर में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल का भवन
जयपुर के विद्याधर नगर में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल का भवन
अपडेटेड 29 मई , 2024

राजस्थान के अजमेर में 1874-75 में मेयो कॉलेज की स्थापना के साथ औपचारिक रूप से अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत हुई थी. पूरे भारत में इसकी काफी प्रतिष्ठा है लेकिन इसी राज्य में इन दिनों सियासत इस बात पर उबाल मार रही है कि सरकारी अंग्रेजी स्कूल हों या नहीं.

राजस्थान में अंग्रेजी स्कूलों को लेकर ताजा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब सूबे के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की समीक्षा कराए जाने का फैसला किया. ये स्कूल पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के दौरान खोले गए हैं. दिलावर की अपने फैसले के पक्ष में दलील है, "केवल भवन पर नाम लिख देने से वह विद्यालय नहीं हो जाता, जब तक उसमें पढ़ाने वाले अच्छे शिक्षक और पढ़ाई के लिए भवन न हो."

राजस्थान में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोलने वाले पूर्व शिक्षा मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा दिलावर के इस बयान पर पलटवार करते हैं. उनका कहना है, "स्टाफ, भवन या अन्य सुविधाओं का हवाला देकर इन स्कूलों को बंद नहीं किया जा सकता क्योंकि ये सुविधाएं उपलब्ध कराना तो सरकार की जिम्मेदारी है. सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए गरीब बच्चों के अंग्रेजी पढ़ने का हक नहीं छीन सकती."

इन स्कूलों पर शिक्षा मंत्री का बयान आने के साथ ही राजस्थान के शिक्षा विभाग ने चार पन्ने का एक सर्कुलर तैयार कर इन स्कूलों की समीक्षा कराए जाने का फरमान जारी कर दिया. इसके जरिए जिला और उपखंड स्तर पर संचालित महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की उपयोगिता, भवन और स्टाफ की स्थिति, हिंदी माध्यम स्कूल से दूरी और हिंदी या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई जैसी कई जानकारियां मांगी गई हैं. इनके आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी यह रिपोर्ट तैयार करेंगे कि किस स्कूल को अंग्रेजी माध्यम में जारी रखा जाए और किसे फिर से हिंदी माध्यम में तब्दील कर दिया जाए.

शिक्षा विभाग के अधिकारी सरकार के इस प्रस्ताव के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. जयपुर के जिला शिक्षा अधिकारी (माध्यमिक) राजेंद्र शर्मा कहते हैं, "स्थानीय अभिभावक अगर अपने बच्चे को हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं और छात्र अगर इंग्लिश मीडियम स्कूल में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं तो शिक्षा के अधिकार के तहत उन स्कूलों को दोबारा हिंदी मीडियम स्कूलों में कन्वर्ट करने के लिए प्रस्ताव मांगे गए हैं."

शिक्षा विभाग की ओर से यह सारी कवायद ऐसे समय में की जा रही है जब महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में प्रवेश प्रकिया चल रही है. इन स्कूलों में सत्र 2024-25 में प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे गए हैं. इस साल 48,000 बच्चों ने इन स्कूलों में पढ़ाई के लिए आवेदन किया है.

अभिभावक इस बात को लेकर दुविधा में हैं कि सरकार इन्हें बंद करेगी या चालू रखेगी. महात्मा गांधी स्कूल मानसरोवर में अपने बेटी के प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले ताराचंद कहते हैं, "मंत्री और अफसरों के खुद के बच्चे तो महंगे प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और हम गरीबों के बच्चे अगर सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ना चाहते हैं तो सरकार उनसे यह अधिकार भी छीन लेना चाहती है."   

पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में डोटासरा ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोलने का ऐलान किया था. 6 जून, 2019 को जयपुर के मानसरोवर में पहला अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोला गया. इसकी सफलता को देखते हुए सरकार ने प्रदेश के सभी 33 जिला मुख्यालय पर एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोले जाने का निर्णय किया. बाद में यह फैसला सभी ब्लॉक के लिए लागू कर दिया गया. इन स्कूलों में प्रवेश की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने 2021-22 तक प्रदेश में 2,000 अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोल दिए. फिलहाल, राजस्थान में 3,737 अंग्रेजी स्कूल संचालित हैं जिनमें 7.21 लाख छात्र-छात्राएं तालीम ले रहे हैं. इन स्कूलों में पढ़ने वाले 70 फीसद छात्र-छात्राएं ऐसे हैं जिन्होंने प्राइवेट स्कूल छोड़कर यहां दाखिला लिया है.

राजस्थान में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूल शुरू होने के साथ ही इनमें प्रवेश के लिए लंबी कतारें शुरू हो गई थीं. अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने यह मिथक भी तोड़ा है कि इन स्कूलों में सिर्फ गरीब वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं. राजस्थान में कई जनप्रतिनिधि, आईएएस, आरएएस और आरजेएस अधिकारी और डॉक्टर-इंजीनियर जैसे पेशेवर वर्ग के बच्चे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ रहे हैं. इस फेहरिस्त में प्रतापगढ़ के पूर्व विधायक रामलाल मीणा की पुत्री कुंजन, आईएएस अधिकारी रवींद्र गोस्वामी की बेटी अर्तिका, न्यायिक सेवा के अधिकारी अरविंद कुमार की बेटी गरिमा जैसे कई नाम शामिल हैं.

शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, इन स्कूलों में प्रवेश के लिए इतनी प्रतिपस्पर्धा है कि हर सीट के लिए 25 बच्चे कतार में हैं. सबसे ज्यादा आवेदन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निर्वाचन क्षेत्र सांगानेर में आए हैं जहां एक सीट के लिए 34 बच्चों ने आवेदन किया है. बच्चों का चयन लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा.

महात्मा गांधी स्कूलों में स्टाफ के चयन के लिए पूर्ववर्ती सरकार ने शिक्षा निदेशक और उप निदेशक की अध्यक्षता में समितियां बनाई थीं. इन स्कूलों के प्रिंसिपल के चयन के लिए शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता वाली समिति ने साक्षात्कार लिए, वहीं द्वितीय श्रेणी अध्यापकों का चयन उप निदेशक की अध्यक्षता वाली समितियों ने किया. तृतीय श्रेणी शिक्षकों का चयन विभागीय परीक्षा के माध्यम से किया गया. अंग्रेजी विषय पर आधारित परीक्षा में पास होने वाले शिक्षकों को ही इन विद्यालयों में नियुक्त किया गया है. इन स्कूलों में 10,000 शिक्षकों की नियुक्ति महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के नाम से नया कैडर बनाकर की गई है. राजस्थान के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के इस मॉडल को कई अन्य राज्य भी लागू करना चाहते हैं. भाजपा शासित उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग के आला अधिकारी बीते दिनों इन स्कूलों का निरीक्षण कर चुके हैं.

इन स्कूलों की समीक्षा के पीछे भाजपा का तर्क है कि पूर्ववर्ती सरकार ने इन स्कूलों में जो कमियां छोड़ दी थीं, वह समीक्षा के जरिए उनका पता लगा रही है. भाजपा प्रवक्ता लक्ष्मीकांत भारद्वाज कहते हैं, "पिछली सरकार ने वाहवाही लूटने के लिए हिंदी स्कूलों का नाम बदलकर अंग्रेजी मीडियम स्कूल तो कर दिया लेकिन वहां न शिक्षक लगाए गए और न ही भवन की व्यवस्था की गई. हमारी सरकार चाहती है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, इसीलिए सरकार इनकी समीक्षा करवा रही है." 

हालांकि डोटासरा इस तर्क को खारिज करते हुए कहते हैं, "नई शिक्षा नीति में अंग्रेजी के साथ ही फ्रेंच, जर्मन, जापानी, रूसी जैसी विदेशी भाषाओं का अध्ययन कराए जाने का भी प्रावधान है, लेकिन भाजपा और आरएसएस चाहते हैं कि कोई भी गरीब का बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त न कर पाए."

अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को लेकर भाजपा सरकार के चाहे जो भी दावे हों लेकिन शिक्षाविद् सरकार के इस कदम को उचित नहीं मानते. कई पाठ्यक्रम निर्माण समितियों से जुड़े रहे शिक्षाविद् राजाराम भादू कहते हैं, "हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, लेकिन अंग्रेजी दुनिया के दरवाजे खोलती है. अमीरों की तरह गरीबों के बच्चों का भी हक है कि वे जिस भाषा में चाहें, पढ़ाई कर सकते हैं. सरकार को इन स्कूलों को बंद करने की जगह इनकी कमियां दूर करने और संसाधन बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए."

राजस्थान बाल अधिकार संरक्षण साझा अभियान के अध्यक्ष विजय गोयल का कहना है, "कोरोना-19 के बाद एक बड़ी तादाद में बच्चों ने सरकारी स्कूलों में प्रवेश लिया था, लेकिन ऐसा लगता है कि ये स्कूल और इनमें पढ़ने वाले बच्चे सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं." इन स्कूलों की समीक्षा पर अगर सियासत हावी होती है तो इसका सबसे ज्यादा नुक्सान राजस्थान के बच्चों को उठाना होगा.

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