—धवल एस. कुलकर्णी
नोट - यह स्टोरी 20 मई को मुंबई में वोट डाले जाने से पहले लिखी गई है
पटाखों की तड़-तड़, गुलाब की पंखुड़ियों की बौछार, और "वोट फॉर मशाल" के नारों की गूंज के बीच मुंबई दक्षिण से शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मौजूदा सांसद और दोबारा चुनाव लड़ रहे अरविंद सावंत का काफिला अचानक ठहर जाता है.
8 मई का यह नजारा इसलिए अलग है क्योंकि मुंबई के मुस्लिम इलाके बाड़ा इमाम रोड पर शिवसेना के इस जुझारू नेता का जोरदार स्वागत हो रहा है. यह जगह उस नागपाड़ा से ज्यादा दूर नहीं है जहां 1998 में छोटा शकील गिरोह के एक गुर्गे ने शिवसैनिक सलीम बडगुजर को कथित तौर पर शिवसेना की शाखा खोलने की वजह से गोली मार दी थी.
मंसूरी जमात के प्रेसिडेंट जावेद मंसूरी कहते हैं, "मैंने मुसलमानों को जिंदगी में पहली बार शिवसेना के उम्मीदवार का इतने जोश से समर्थन करते देखा है." पारंपरिक तौर पर अविभाजित शिवसेना का मुसलमानों के साथ, खासकर 1980 के दशक के आखिरी वर्षों में उसके हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति की तरफ मुड़ने के बाद, नाराजगी भरा रिश्ता रहा. 1992-93 के सांप्रदायिक टकरावों में पार्टी की कथित भागीदारी से यह खाई और गहरी हो गई.
सावंत का मुकाबला भायखला से विधायक और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली प्रतिद्वंद्वी शिवसेना की उम्मीदवार यामिनी जाधव से है. मुंबई दक्षिण भारत का सबसे प्रतिष्ठित लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र है, जहां कई अरबपति रहते हैं. जाधव ने 12 मई को इंडिया टुडे से कहा कि "नरेंद्र मोदी की लहर" और उनकी "विकास की गारंटियों" के बल पर उन्हें अपनी जीत का पक्का यकीन है.
जाधव के साथ प्रचार कर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा कहते हैं, "यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनने के लिए जनमत संग्रह है." इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर दो बार सांसद रह चुके और अब शिंदे की शिवसेना के राज्यसभा सांसद देवड़ा का कहना है कि 2014 और 2019 (जब वे सावंत से हार गए थे) की तरह इस बार भी मोदी फैक्टर काम करेगा.
शिवसेना बनाम शिवसेना की लड़ाई, 1989 से सहयोगी रही उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली अविभाजित शिवसेना और भाजपा के बीच फूट और ठाकरे की शिवसेना को मिल रहा मुसलमानों का जोरदार समर्थन राज्य की राजनीति में आए हालिया बदलावों को दर्शाते हैं. इन सामाजिक-राजनैतिक ताकतों का खेल और जवाबी खेल दोनों सेनाओं की तकदीर तय करेगा और यह भी कि भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई पर किसका नियंत्रण होगा, जहां पड़ोसी ठाणे और पालघर के साथ 20 मई को वोट डाले जाएंगे.
मुंबई की लड़ाई
मुंबई को सियासी मौसम का पता बताने वाला शहर माना जाता है. मुंबईकर किसी एक पार्टी या गठबंधन को वोट देते हैं और अपनी सभी छह सीटें उसकी झोली में डाल देते हैं. केंद्र में अब तक वही पार्टी सत्ता में आई है जिसे मुंबई वोट देती है. यह इससे भी जाहिर है कि 2009 में कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने क्लीन स्वीप किया और 2014 तथा 2019 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने वही कामयाबी दोहराई. 2004 में जब कांग्रेस की अगुआई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सत्ता में आया, शिवसेना मुंबई की महज एक सीट जीत पाई थी.
अलबत्ता इस बार महायुति और विपक्षी महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के बीच रस्साकशी मुंबई के अलावा चार अन्य पड़ोसी सीटों—ठाणे, पालघर, भिवंडी और कल्याण—पर चुनावी जीत हासिल करने तक सीमित नहीं है. नतीजे कहीं ज्यादा गहरा संदेश यह देंगे कि दो हिस्सों में बंट गई शिवसेना की विरासत पर अब किसका कब्जा है. जून 2022 में शिंदे की अगुआई में हुई फूट के बाद यह जनादेश का पहला इम्तिहान है, जो इसी साल बाद में होने वाले बेहद अहम राज्य विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल भी है.
इसमें व्यावसायिक राजधानी और धनसंपन्न बृहन्मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) पर कब्जा दांव पर लगा है. 59,954.75 करोड़ रुपए के सालाना बजट के साथ यह निगम कई छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को टक्कर दे सकता है. महायुति और एमवीए तेजी से शहरी होते जा रहे और 6,328 किमी में फैले मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन (एमएमआर) पर अपना कब्जा मजबूत करने की कोशिश भी कर रहे हैं, जिसमें मुंबई, ठाणे, पालघर और रायगड जिले शामिल हैं. एमएमआर में मुंबई और तीन पड़ोसी जिलों में फैले नौ नगर निगम आते हैं, जहां करीब 2.34 करोड़ लोग रहते हैं.
साल 1985 में मुंबई नगरपालिका की सत्ता हासिल करने के बाद शिवसेना ने इसका इस्तेमाल पूरे महाराष्ट्र में अपना विस्तार करने के लिए स्प्रिंगबोर्ड की तरह किया, जिसकी परिणति 1995 में शिवसेना-भाजपा सरकार के गठन में हुई. महाराष्ट्रियनवादी पार्टी के लिए पड़ोसी ठाणे का भी गौरवशाली स्थान है—मुंबई के इस आनुषंगिक शहर में वह पहले-पहल 1967 में सत्ता में आई जब वसंतराव मराठे नगरपालिका अध्यक्ष चुने गए. ठाणे और पालघर को शिंदे का गढ़ माना जाता है और ठाकरे उन्हें अपने विरोधी से छीनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं.
शिंदे ने भाजपा की मांगें ठुकराकर ठाणे को पूर्व मेयर नरेश महास्के के लिए बचाया, जो यहां शिवसेना (यूबीटी) के दो बार के सांसद राजन विचारे का मुकाबला करेंगे. शिंदे इसी निर्वाचन क्षेत्र से विधायक हैं. कल्याण में शिंदे के बेटे डॉ. श्रीकांत शिंदे शिवसेना (यूबीटी) की वैशाली-दरेकर-राणे से मुकाबला कर रहे हैं.
हालांकि अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित पालघर की सीट शिंदे ने भाजपा से छीन ली और वहां से शिवसेना (यूबीटी) की भारती कामडी और स्थानीय पार्टी बहुजन समाज अघाड़ी के राजेश पाटील के खिलाफ डॉ. हेमंत सावरा को खड़ा किया है. कामडी को वामपंथियों का सहारा भी हासिल है, जिनका दहाणु और तलसेरी में आधार है. यह 1960 और 1970 के दशक से बहुत अलग है जब कांग्रेस के इशारे पर शिवसेना मुंबई में वामपंथियों से लोहा लिया करती थी.
कपड़ों के शहर भिवंडी में एनसीपी (शरदचंद्र पवार) ने सहयोगी पार्टी कांग्रेस को मनाकर सीट हासिल कर ली. उसने यहां से भाजपा के कपिल पाटील (केंद्रीय राज्यमंत्री) और कांग्रेस के बागी नीलेश सांबरे के खिलाफ सुरेश 'बाल्या मामा' म्हात्रे को मैदान में उतारा है. कांग्रेस के कुछ नेताओं की नाराजगी के अलावा म्हात्रे और पाटील में आगरी समुदाय के वोटों के बंटवारे और सांबरे को कुनबियों के समर्थन से नतीजे तय हो सकते हैं. हालांकि म्हात्रे को मुसलमानों का समर्थन मिल रहा है, जिनकी भिवंडी में अच्छी-खासी तादाद है.
उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अगुआई वाली एनसीपी के एक बड़े नेता का कहना है कि पालघर और ठाणे में उम्मीदवारों के ऐलान में हुई देरी से महायुति की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है. पत्रकार और विश्लेषक संदीप प्रधान कहते हैं, "ठाणे में लड़ाई मोदी फैक्टर और ठाकरे फैक्टर के बीच है. अगर मोदी फैक्टर असर नहीं करता है और शिवसेना के दोफाड़ होने का नैरेटिव प्रभावी होता है, तो इससे ठाकरे को मदद मिलेगी."
'असली' शिवसेना कौन है?
हालांकि भारत के चुनाव आयुक्त (ईसीआई) ने फरवरी में शिंदे धड़े को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देकर उन्हें नाम और तीर-धनुष चुनाव चिह्न सौंप दिया, पर ठाकरे धड़े का अब भी यही कहना है कि मूल शिवसेना वही है. शिवसेना (यूबीटी) के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री सुभाष देसाई कहते हैं, "लोगों के जनादेश से तय होगा कि असली शिवसेना कौन-सी है." महायुति के एक सूत्र कहते हैं, "यह ठाकरे और शिंदे के बीच, और ठाकरे और भाजपा के बीच भी, जिसे पार्टी में फूट डलवाने का दोषी ठहराया जा रहा है, असल शिवसेना के निर्धारण की लड़ाई है."
अलबत्ता शिवसेना की एमएलसी मनीषा कायंदे का कहना है कि शिंदे धड़े के शिवसेना होने का मुद्दा ईसीआई के फैसले के साथ सुलझ गया. वे कहती हैं, "हम मोदी सरकार और महाराष्ट्र सरकार के कामों के आधार पर वोट मांग रहे हैं. राज्य सरकार ने दो साल में करीब 500 जन-पक्षधर फैसले लिए... लेकिन वे (प्रतिद्वंद्वी शिवसेना) अपने अभियान को भावनात्मक मोड़ देने की कोशिश कर रहे हैं. क्या ऐसे मुद्दे लोगों के लिए मायने रखते हैं?"
पत्रकार और विश्लेषक प्रताप आसबे के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के नतीजे असल शिवसेना और एनसीपी की बहस का फैसला कर देंगे. वे कहते हैं, "पार्टी में फूट के बाद ठाकरे के पक्ष में सहानुभूति है. महाराष्ट्र में फूट की राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोपियों को अंतत: सत्ता के पद मिलने की राजनीति लोगों के बीच गूंजेगी."
नए सामाजिक गठबंधन
एमवीए के नेताओं का दावा है कि मुंबई और उसके पड़ोसी इलाकों में उसे अपने पक्ष में 'ममु' यानी मराठी-मुस्लिम एकजुटता का फायदा मिलेगा. कांग्रेस के पूर्व मंत्री असलम शेख का कहना है कि मुंबई के छह निर्वाचन क्षेत्रों में से हरेक में जहां 6,500,000-7,00,000 मराठी भाषी हो सकते हैं, मुसलमानों की तादाद करीब 2,00,000 है, जो मुंबई उत्तर मध्य में 5,00,000 से मुंबई दक्षिण में 3,50,000 तक अलग-अलग है.
भिवंडी और कल्याण में भी अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी है. वे कहते हैं, "यह मराठी-मुस्लिम गठजोड़ बहुत मजबूत है." एमवीए के एक अन्य मुस्लिम नेता बताते हैं कि अल्पसंख्यक उनके पीछे अपना पूरा जोर आखिर क्यों लगाएंगे. वे कहते हैं, "मुसलमान ऐसी किसी भी पार्टी का समर्थन करने को तैयार हैं जो भाजपा को हरा सके. शिवसेना के मामले में इसे और शिद्दत से नोटिस किया जा रहा है."
वे कहते हैं, "डोंगरी (मुंबई का मुस्लिम मोहल्ला) में शिवसेना का झंडा मात्र ही आग भड़काने के लिए काफी था. अब मुस्लिम महिलाएं वहां अपने मन से प्रचार के लिए घर-घर जा रही हैं." कारोबारी शौकत मंसूरी इसकी वजह बताते हैं. उनका कहना है कि 2019 में कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के ठाकरे के फैसले और शिवसेना को "उदार" चेहरा देने की उनकी कोशिशों ने मुसलमानों को उनके पक्ष में झुकाने में मदद की.
ठाकरे के वफादारों का कहना है कि मुसलमानों और बौद्ध दलितों—यानी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायी जिन्हें बाहुबल के साथ शिवसेना का मुकाबला करने में समर्थ सामाजिक ताकत के रूप में देखा जाता है—सरीखे तबकों के समर्थन से शिवसेना (यूबीटी) को फूट के बाद अपने जत्थों में कमी की भरपाई करने में मदद मिल सकती है.
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि केंद्रीय राज्यमंत्री रामदास आठवले और जोगेंद्र कवाडे सरीखे आरपीआई के नेता जरूर भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के साथ हैं, लेकिन इस धारणा ने कि अगर मोदी सरकार विशाल बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो संविधान को बदला जा सकता है, दलितों के कुछ तबकों में डर पैदा कर दिया है. 'हिंदू राष्ट्र' के आह्वान ने इस नैरेटिव को मजबूत ही किया है.
हिंदुत्व बनाम मराठी पहचान
मुंबई इलाके में खासकर मराठी और गुजराती भाषियों के बीच भाषाई ध्रुवीकरण की प्रबल अंतर्धाराएं हैं. हालांकि वोटों का अखंड हस्तांतरण मिथ है, पर श्रमिक वर्ग के महाराष्ट्रियनों को अविभाजित शिवसेना का पारंपरिक मतदाता माना जाता है, जबकि ब्राह्मण सरीखी उच्च जातियां भाजपा का समर्थन करती हैं. गुजरातियों, मारवाड़ियों, हिंदीभाषियों और यहां तक कि मुसलमानों के बीच भी शिवसेना को समर्थन मिलता रहा है. मगर भाजपा और शिवसेना (यूबीटी) के बीच लड़ाई इस इलाके में केवल दो सीटों—मुंबई उत्तर पूर्व और पालघर—पर हो रही है.
विले पार्ले से भाजपा के विधायक पराग अलवानी का कहना है कि शिवसेना (यूबीटी) के मूल वोटर कांग्रेस के साथ उसके गठबंधन और नतीजतन हिंदुत्व के साथ किए गए समझौते को लेकर नाखुश थे. वे कहते हैं, "उद्धव ठाकरे लोगों की नहीं, अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं... लोग आपका (केवल) तभी समर्थन करेंगे अगर आप उनकी लड़ाई लड़ें."
अलवानी का कहना है कि मुफ्त अनाज सरीखी जनकल्याण योजनाओं, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं और मजबूत अंतरराष्ट्रीय हैसियत की बदौलत तो भाजपा को वोट मिलेंगे ही, इसके अलावा पार्टी ने मराठी मोहल्लों में भी पैठ बनाई है और मुंबई में उसके नेतृत्व का बहुत बड़ा हिस्सा महाराष्ट्रियनों का है. वे कहते हैं, "मुसलमानों की तरफ से थोक मतदान की प्रतिक्रिया में जवाबी ध्रुवीकरण भी होगा." भाजपा के एक और विधायक और मुंबई इकाई के अध्यक्ष आशीष शेलार का दावा है कि ठाकरे की "तुष्टीकरण की राजनीति" और "वोटों की खातिर विचारधारा बदल लेने" की कीमत उन्हें मराठी मानुस का समर्थन खोकर चुकानी पड़ेगी.
महायुति के लिए राज ठाकरे की अगुआई वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का समर्थन सोने में सुहागा है. इसकी बदौलत उन्हें मुंबई और पड़ोसी इलाकों में मराठी वोटों का कुछ हिस्सा मिल सकता है. हालांकि शिवसेना (यूबीटी) के बड़े वरिष्ठ नेता रवींद्र मिर्लेकर इससे अलग दावा करते हैं. उनका कहना है, "भाजपा के खिलाफ इस बात को लेकर गुस्सा है कि उसने (शिवसेना के) अंतत: उन्हीं नेताओं को ले लिया जिन पर पहले उसने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे."
शिवसेना (यूबीटी) के एक और बड़े पदाधिकारी का कहना है कि तत्कालीन शिवसेना समर्थक मुहल्लों के सौम्य हो जाने और महाराष्ट्रियनों के बीच विविधतापूर्ण संस्कृति के विकास की वजह से भाजपा के मतदाताओं में जैविक बढ़ोतरी हुई है, वहीं अगर भाजपा के समर्थक अपने उम्मीदवारों को वोट देने के लिए नहीं निकले तो शिंदे की शिवसेना के अभियान को झटका लग सकता है. भाजपा के दावों को खारिज करते हुए मुंबई की छह लोकसभा सीटों में से तीन—मुंबई दक्षिण, मुंबई दक्षिण मध्य और मुंबई उत्तर पश्चिम—और ठाणे की सीट शिंदे के उम्मीदवारों को मिली हैं.
यह महाराष्ट्र की अब तक की सबसे पेचीदा चुनावी जंग है और मुंबई के वोट यह तय करने में बेहद अहम होंगे कि इसके चुनावी इतिहास का अगला अध्याय कैसा होगा.

