चन्नी, पप्पी, रिंकू, टीनू, बिट्टू बब्बू, बॉबी...पंजाब में लोकसभा सीटों के लिए चुनावी मुकाबले में खड़े विभिन्न दलों, इलाकों और जातियों के कुछ उम्मीदवारों के ये अंतिम नाम या उपनाम हैं. ये चाहे परिवार की ओर से प्यार से पुकारे जाने वाले नाम हों या फिर सहयोगियों की ओर से गढ़े गए उपनाम, इस सीमावर्ती राज्य में ऐसे वैकल्पिक नाम रखना आम बात है.
यूं ही अनौपचारिक बात-व्यवहार तक सीमित रहने वाले इन प्यारे नामों ने पिछले दशक में राजनैतिक अभियान सामग्री, यहां तक कि चुनावी हलफनामों और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर भी जगह बना ली है.उपनाम चुनने के मामले में पंजाब में समानांतर संस्कृतियां हैं. जैसे कुछ तो अपने गांव का नाम चुनते हैं तो कई अपनी जाति या उपजाति का.
वहीं ग्रामीण दलित समुदाय तो यहां तक कि बड़े जमींदारों का अंतिम नाम अपना लेते हैं. मगर राज्य के दोआबा इलाके में दलित सिखों ने पारंपरिक अंतिम नामों को पूरी तरह त्यागकर नए उपनामों को अपनाना शुरू कर दिया है. शायद यही वजह है कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से कांग्रेस प्रत्याशी चरणजीत सिंह चन्नी को भले ही अपनी दलित पहचान बताना प्रासंगिक लग सकता है, फिर भी वे अपने नाम के पीछे उपनाम लगाना पसंद करते हैं.
कांग्रेस जालंधर में मतदाताओं के साथ जुड़ाव बनाने के लिए 'साड्डा चन्नी' (हमारा चन्नी) अभियान भी चला रही है. इसी तरह जालंधर से सांसद और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार सुशील कुमार रिंकू ने बुलाए जाने वाले नाम को अपने उपनाम में बदल दिया है. वहीं, उनके प्रतिद्वंद्वी दलित कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी (आप) उम्मीदवार पवन कुमार टीनू तथा कांग्रेस के पुराने दिग्गज और अब शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार मोहिंदर सिंह केपी ने इसके बजाए अपने पिता के उपनाम को लगाना पसंद किया है.
कुछ लोगों का मानना है कि उपनाम लोगों को अलहदा बना देता है. पिछले दशक में जैसे-जैसे पुराने दिग्गज नेताओं ने अपनी युवा पीढ़ियों को कमान सौंपी, पार्टी हलकों में उपनामों से जाने जाने वाले उनके बेटों, पोते-पोतियों और भतीजे-भतीजियों ने उन नामों को अपनी सार्वजनिक शख्सियत में शामिल कर लिया. मसलन, पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह झज्ज को ही लें.
तीन बार के ये कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू के नाम से मशहूर हैं और वे भाजपा उम्मीदवार के तौर पर लुधियाना सीट को बरकरार रखने की कोशिश कर रहे हैं. यह चलन पड़ोसी राज्यों में भी फैल गया है. हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अपने पुकारू उपनाम को अपना लिया है. हालांकि, यह परंपरा विशिष्ट रूप से पंजाब में मौजूद है. यहां तक कि 2019 में भाजपा ने गुरदासपुर के अपने उम्मीदवार और अभिनेता सनी देओल को उनके असली नाम - अजय सिंह देओल - के बजाए उनके पुकारू और सिनेमा में इस्तेमाल किए जाने वाले नाम का प्रयोग करने के लिए चुनाव आयोग से विशेष अनुमति मांगी थी.
इसमें संदेह नहीं कि उपनामों को याद रखने के साथ कई बार उनका उच्चारण करना भी आसान होता है. यही वजह है कि अकाली दल के नेता जोरा सिंह मान के बेटे नरदेव सिंह खुद को बॉबी मान कहलाना पसंद करते हैं. उन्हें पार्टी ने फिरोजपुर से उतारा है. आप से उनके प्रतिद्वंद्वी जगदीप सिंह उर्फ काका बराड़ हैं. यहां तक कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह बरार भी अपना उपनाम राजा वाडिंग ही रखते हैं. राजा उनका उपनाम है तो वाडिंग उनके गांव का नाम. वे लुधियाना में भाजपा के बिट्टू और आप के अशोक प्रशर पप्पी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में लुधियाना में एक हालिया रैली में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने चुटकी ली, "लोग केहंदे ने राजा ते बिट्टू गप्पी, जीतेगा अपना पप्पी (लोग कहते हैं कि राजा और बिट्टू तो झूठे हैं जी, सो जीतेगा अपना पप्पी जी)." जाहिर है, इन उपनामों से आकर्षक नारे भी बन जाते हैं.

