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यूपी में 'इंडिया गठबंधन' को हराने के लिए मायावती ने चला मुस्लिम प्रत्याशियों का दांव?

जौनपुर, बस्ती समेत कई लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी बदलने, भतीजे आकाश आनंद पर कार्रवाई करने से बसपा सुप्रीमो मायावती पर लगे भाजपा को मदद पहुंचाने के आरोप

लखनऊ में पार्टी की रैली में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती
लखनऊ में पार्टी की रैली में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती
अपडेटेड 31 मई , 2024

पूर्वांचल का राजनैतिक प्रवेशद्वार कही जाने वाली जौनपुर लोकसभा सीट की चुनावी जंग पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का टिकट मिलने से काफी रोचक हो गई थी. श्रीकला ने नामांकन भी कर दिया था. यहां से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह को मैदान में उतारा है. कभी बसपा सुप्रीमो के करीबी रहे बाबू सिंह कुशवाहा समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार बने.

तब तक जौनपुर सीट पर दो क्षत्रिय उम्मीदवार होने के कारण भाजपा प्रत्याशी कृपाशंकर सिंह की राह मुश्किल लग रही थी. जौनपुर का सियासी तापमान बढ़ ही रहा था कि अचानक 6 मई को बसपा ने श्रीकला का टिकट काटकर यहां से पार्टी के वर्तमान सांसद श्याम सिंह यादव को थमा दिया.

धनंजय का कहना है, "हमारे साथ धोखा हुआ है. टिकट कटने से मेरी पत्नी आहत है." जबकि बसपा कोऑर्डिनेटर घनश्याम खरवार दावा करते हैं कि धनंजय ने ही उन्हें फोन किया और कहा था कि पिताजी ने चुनाव लड़ने से मना किया है. अब श्याम सिंह यादव के आने से सपा के कोर यादव वोट बैंक में बिखराव का अंदेशा है. राजनैतिक विश्लेषक इसका फायदा भाजपा उम्मीदवार को मिलने की संभावना जता रहे हैं. 

बसपा ने 6 मई को जौनपुर के साथ बस्ती सीट पर भी प्रत्याशी बदलकर सपा की राह मुश्किल कर दी. बस्ती सीट पर नामांकन शुरू होने के कुछ दिन पहले भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और प्रभावी नेता दयाशंकर मिश्र ने बसपा का दामन थाम लिया था. बसपा ने बिना देर लगाए दयाशंकर को प्रत्याशी घोषित कर दिया. दयाशंकर ने नामांकन भी कर दिया. ऐसा माना जा रहा था कि दो ब्राह्मण उम्मीवार के होने से भाजपा के वर्तमान सांसद और उम्मीदवार हरीश द्विवेदी की राह मुश्किल हो सकती है.

इसी बीच बस्ती लोकसभा सीट पर नामांकन के अंतिम दिन 6 मई को अचानक पूर्व विधायक नंदू चौधरी के बेटे लवकुश पटेल ने बसपा उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि लवकुश के मैदान में आने से कुर्मी मतों में बंटवारे की नींव पड़ गई है. इससे इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी रामप्रसाद चौधरी के लिए मुश्किल हो सकती है. जबकि ब्राह्मण उम्मीदवार के हटने से बस्ती लोकसभा सीट में भाजपा प्रत्याशी हरीश द्विवेदी की राह थोड़ी आसान हो सकती है. हालांकि इंडिया गठबंधन के नेता बसपा के इस कदम को भाजपा की मदद करने वाला बता रहे हैं. 

बसपा के उम्मीदवार बदलने से उठे सवाल केवल जौनपुर और बस्ती तक ही सीमित नहीं हैं. बसपा पूर्वांचल की कई सीटों पर अपनी ही चाल में उलझ गई है. पूर्वी यूपी की वाराणसी, आजमगढ़, संत कबीरनगर और भदोही लोकसभा सीटों को बसपा ने मानो अपनी राजनैतिक प्रयोगशाला बना लिया है. 20 दिनों के भीतर बसपा इन सीटों पर 2 मई को तीसरा प्रत्याशी लेकर सामने आई.

उम्मीदवारों में यह परिवर्तन तब हुआ जब बसपा के निवर्तमान नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद अप्रैल के अंतिम हफ्ते में पूर्व प्रत्याशियों के समर्थन में आजमगढ़ और वाराणसी में चुनावी रैली भी कर चुके थे. संतकबीर नगर सीट पर जब बसपा ने 2 मई को नदीम अशरफ को पार्टी का नया उम्मीदवार घोषित किया तो इलाके के बसपा नेता भी अचरज में पड़ गए. अशरफ बीते 13 दिनों में बसपा का प्रत्याशी बनने वाले तीसरे नेता थे.

पार्टी ने संतकबीर नगर सीट से 19 अप्रैल को मोहम्मद आलम को प्रत्याशी बनाया था. वे प्रचार में जुट गए थे. क्षेत्र में एक सभा भी करवाई थी. अचानक 28 अप्रैल को उनका टिकट काटकर सैयद दानिश को मैदान में उतार दिया गया. मोहम्मद आलम टिकट कटने की वजह खुद भी समझ नहीं पाए थे. सैयद दानिश चुनाव प्रचार में जुटे ही थे कि उनकी जगह 2 मई को नदीम अशरफ को बसपा ने प्रत्याशी बना दिया. 

इस तरह यूपी की एक दर्जन से अधिक सीटों पर बसपा ने कई बार उम्मीदवार बदले हैं जिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं. हालांकि, बस्ती में बसपा के मंडल कोऑर्डिनेटर रामसूरत चौधरी बताते हैं कि पार्टी ने जाति समीकरण और प्रभावशीलता के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया है. पार्टी उम्मीदवारों की निगरानी कर रही है जहां वे कमजोर साबित हो रहे हैं, उन्हें बदला जा रहा है. चौधरी के मुताबिक, "दूसरी पार्टियों ने बसपा से कहीं ज्यादा प्रत्याशी बदले लेकिन उन पर सवाल न खड़े कर एक साजिश के तहत बसपा को निशाना बनाया जा रहा है."

बरेली सीट पर पार्टी प्रत्याशी का पर्चा खारिज होने के बाद बसपा प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से कुल 79 पर चुनाव लड़ रही है. इनमें 23 ओबीसी, 20 मुस्लिम, 18 सवर्ण, 17 दलित और एक सिख प्रत्याशी हैं. यूपी में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ रही बसपा ने सबसे बड़ा दांव मुसलमानों पर खेला है. यह 2019 के आम चुनावों में लोकसभा उम्मीदवारों के लिए बसपा की रणनीति के बिल्कुल विपरीत है, जब सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरी पार्टी ने 38 में से केवल छह मुस्लिम उम्मीदवारों पर भरोसा किया था, जो कि कुल घोषित उम्मीदवारों का केवल 15% था.

उनमें से तीन गाजीपुर से अफजाल अंसारी, अमरोहा से दानिश अली और सहारनपुर से हाजी फजलुर रहमान ने चुनाव जीता था. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा की मुस्लिम उम्मीदवारों पर निर्भरता अचानक नहीं हैं. मायावती ने ऐसा ही प्रयोग 2017 के प्रदेश विधानसभा चुनाव में 99 मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर किया था. राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि मायावती के इस कदम से मुस्लिम वोट बंट गए और भाजपा को भारी जीत मिली, जिसने 403 विधानसभा सीटों में से 313 सीटें जीत ली थीं.

बसपा खुद सिर्फ 19 सीटें जीत सकी, जिनमें से पांच मुसलमानों के खाते में गई थीं. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद, जहां बसपा ने सिर्फ एक सीट जीती और 13% से कम वोट शेयर हासिल किया, मई 2023 में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में बसपा ने फिर से मुसलमानों पर भरोसा किया. पार्टी ने 11 मुसलमानों को मेयर पद के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा. उत्तर प्रदेश में मेयर की 17 सीटें हैं और बसपा को एक भी सीट नहीं मिली. रुहेलखंड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर अजीजुल हलीम बताते हैं, "पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि बसपा ने जब-जब चुनाव में मुस्लिम अधिक संख्या में उतारे हैं, मुस्लिम मतों में बंटवारा हुआ है और उसका फायदा भाजपा को मिला है."

पश्चिमी यूपी में अपनी रैलियों में मायावती ने कहा कि पार्टी ने अपनी मूलभूत विचारधारा, 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के अधिकांश मुसलमानों को टिकट दिए हैं, यह नारा 1984 में पार्टी संस्थापक कांशीराम ने दिया था. कन्नौज, फिरोजाबाद, बदायूं और आजमगढ़ जैसी मुलायम सिंह यादव परिवार का गढ़ कही जाने वाली लोकसभा सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारना और मैनपुरी में यादव उम्मीदवार को बसपा का टिकट थमाने को सपा नेता भाजपा को लाभ पहुंचाने की रणनीति मान रहे हैं.

तीसरे चरण के चुनाव में फिरोजाबाद सीट पर हुए मतदान पर मुस्लिम वोट के एकतरफा सपा उम्मीदवार अक्षय यादव के पक्ष में जाने की संभावना से बसपा प्रत्याशी चौधरी बशीर की हताशा साफ झलकी. चौधरी बशीर ने एक वीडियो जारी करके कहा, "अल्लाह से नहीं, सैफई परिवार से डरते हैं मुस्लिम मतदाता." कांग्रेस नेता और अमरोहा से प्रत्याशी दानिश अली बताते हैं, "बसपा ने जिस तरह प्रत्याशी बदले हैं, उससे लगता है कि वह किसी के इशारे पर काम कर रही है. बसपा ने अपने प्रत्याशी इंडिया गठबंधन को नुक्सान और भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए उतारे हैं."

लोकसभा चुनाव के दौरान मायावती ने संगठन में भी बदलाव किए हैं. ऐन चुनाव के समय बसपा ने संतकबीर नगर के जिलाध्यक्ष धर्मदेव प्रियदर्शी को हटाकर झिनकान प्रसाद की ताजपोशी कर दी. इसके अलावा वे चुनाव के दौरान बरेली के जोनल कोऑर्डिनेटर ब्रह्मस्वरूप सागर, जिलाध्यक्ष राजीव सिंह को हटा चुकी हैं. झांसी के जिलाध्यक्ष जयपाल अहिरवार को तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है.

संगठन में सख्त रवैया दिखा रही मायावती का 7 मई को भतीजे आकाश आनंद को बसपा के नेशनल कोऑर्डिनेटर पद से हटाने और अपना उत्तराधिकारी होने की जिम्मेदारी से अलग करने का निर्णय राजनैतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया. 28 अप्रैल को सीतापुर में आयोजित जनसभा में आकाश आनंद प्रदेश सरकार पर विवादित टिप्पणी कर गए. इसके बाद आकाश समेत बसपा के चार अन्य प्रत्याशी चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मुकदमे के दायरे में आ गए.

मायावती को यह नागवार गुजरा. उन्होंने आकाश की रैलियों पर रोक लगा दी. सीतापुर में आकाश की रैली के नौ दिन बाद मायावती ने पार्टी के एकमात्र नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद से आकाश को मुक्त कर दिया. 2024 का लोकसभा चुनाव आकाश आनंद की राजनैतिक समझ और उनके तेवरों के लिए भी जाना जाएगा. उनके यही तेवर भारी पड़ गए. बताया जा रहा है कि सत्तारूढ़ दल के खिलाफ की गई आक्रामक टिप्पणियों को लेकर मायावती भतीजे से नाराज हैं. हटाए जाने के बाद आकाश ने सोशल मीडिया पर मायावती को संबोधित करते हुए लिखा, "आपका आदेश सिर माथे."

मायावती की इस कार्रवाई को राजनैतिक दल भाजपा के इशारे पर किया गया काम बता रहे हैं. सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद बताते हैं, "आकाश लगातार भाजपा से सवाल पूछ रहे थे जो सत्तारूढ़ दल को चुभ रहे थे. उन्हें हटाकर मायावती ने यह बात जगजाहिर कर दी है कि बसपा और भाजपा का अघोषित गठबंधन है."

लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रमुख ब्रजेश मिश्र बताते हैं, "उभरते हुए युवा दलित नेता और कुशल वक्ता को अपमानित करते हुए पद से हटाना मायावती की बहुत बड़ी भूल है. इससे बसपा का कोर जाटव वोट बैंक भी उससे छिटकेगा और पार्टी का जनाधार अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाएगा." बहरहाल, इतना तय है कि प्रदेश में बसपा का प्रदर्शन उसके राजनैतिक भविष्य की दिशा तय करेगा.

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