
दक्षिण-मध्य बंगाल स्थित नादिया जिले के धुबुलिया में हाल में तपती दोपहरी में हजारों लोगों की भीड़ जुटी. वहां सुकांता स्पोर्टिंग क्लब मैदान में जुटी यह भीड़ बीच-बीच में ममता के समर्थन में नारे लगाती और बेसब्री से उनका इंतजार करती नजर आ रही थी. चिलचिलाती गर्मी कृष्णानगर निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की उम्मीदवार महुआ मोइत्रा के समर्थन में जुटे इन लोगों की बेचैनी को बढ़ाती जा रही थी.
घंटों इसी स्थिति में इंतजार करते लोग प्यास बुझाने के लिए यहां-वहां पानी तलाशते और पेडस्टल पंखों की हवा खाने के लिए एक-दूसरे से धक्का-मुक्की करते रहे. हालात बेकाबू होते, इससे पहले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हेलिकॉप्टर तेज गड़गड़ाहट के साथ आसमान में चक्कर काटता नजर आया.
उसे देखते ही भीड़ में मानो खुद-ब-खुद जान वापस आ गई. एक ट्रेडमार्क बन चुकी नीली किनारे वाली सफेद साड़ी पहने ममता जैसे ही हेलिकॉप्टर से बाहर निकलीं, भीड़ एक नए उत्साह से भरी नजर आई.
बंगाल में, पिछले करीब एक दशक से मुख्यमंत्री की रैलियों में इस तरह के नजारे दिखना आम है. वैसे बीते तीन वर्ष में बंगाल की प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सुवेंदु अधिकारी को उनके मुकाबले खड़ा करने में काफी हद तक सफल रही है. अधिकारी ममता के विश्वस्त सहयोगी रहे हैं, जो 2020 में भगवा पार्टी में शामिल हुए और 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम में ममता को हराया भी था. फिलहाल राज्य में कोई अन्य विपक्षी नेता अधिकारी जितना लोकप्रिय नहीं है और उनकी रैलियों में भी ऐसा ही जनसैलाब उमड़ता नजर आता है.
वैसे तो सत्तारूढ़ टीएमसी और भाजपा के बीच घोर प्रतिद्वंद्विता कभी किसी सियासी सलीके में बंधी नजर नहीं आती, लेकिन चुनाव के दौरान तो यह और भी बदतर हो जाती है. भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए कुल 42 में से 18 सीटें जीत ली थीं, जबकि 2014 में यह आंकड़ा महज दो ही था. राज्य में वामपंथियों के पतन के बीच, भगवा पार्टी के उदय के पीछे कई सामायिक मुद्दों ने अहम भूमिका निभाई.

इसमें टीएमसी नेताओं का कथित भ्रष्टाचार, खराब कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप प्रमुख हैं. टीएमसी इन आरोपों का खंडन करती रही है और भगवा पार्टी की कथित "विभाजनकारी राजनीति" को उसने अपना सियासी हथियार बनाया है. नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) थोपने की कोशिशों और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत राज्य के बकाये का भुगतान न करने को उसने एक मजबूत आधार बनाया है.
वैसे, जैसे भाजपा अपने करिश्माई प्रधानमंत्री पर निर्भर है, उसी तरह तृणमूल की असली ताकत ममता की लोकप्रियता है. जांच एजेंसियां भले ही कथित भ्रष्टाचार सामने ला रही हों लेकिन ममता की छवि आम तौर पर इससे अछूती है. और वे इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं.
पहले चरण के मतदान से पूर्व कूचबिहार में भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा भी कि मतदान करते समय सिर्फ 'मेरे चेहरे' को ध्यान में रखें. 2021 के विधानसभा चुनाव में मजबूत स्थिति के बावजूद भाजपा को हराने से भी टीएमसी का हौसला बुलंद है. उस सफलता के मुख्य सूत्रधार रहे ममता के भतीजे, उनके सियासी उत्तराधिकारी और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस बार भी चुनाव अभियान की कमान संभाल रखी है.
वहीं, इस चुनाव में किसी को भी वाममोर्चा और कांग्रेस से किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं है. 2021 की चुनावी हार में एकदम सिमट गए इन दलों के पास बंगाल में दो लोकसभा सीटें (कांग्रेस की) ही हैं.
भ्रष्टाचार पर घिरीं
टीएमसी सरकार पिछले दो साल से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है, जिनमें कथित शिक्षक भर्ती घोटाला सबसे कुख्यात है. इसमें ममता सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी को 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार किया था. यह मामला लोगों के जेहन में ताजा हो गया जब 22 अप्रैल को कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2016 की भर्ती प्रक्रिया के तहत 25,753 सरकारी स्कूल शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी. भाजपा के इस कदम का स्वागत करने और टीएमसी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने से यह एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया. 29 अप्रैल को शीर्ष अदालत ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के लिए अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया.
फिर, मवेशी तस्करी का रैकेट भी सुर्खियों में रहा, जिसमें टीएमसी दिग्गज अनुब्रत मंडल की गिरफ्तारी हुई; कथित कोयला तस्करी घोटाले में अभिषेक से सीबीआई और ईडी ने पूछताछ की; और पीडीएस राशन घोटाले में राज्य के मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक को अक्तूबर 2023 में गिरफ्तार किया गया.
2022 के शुरू में अभिषेक को डैमेज कंट्रोल की व्यापक पहल करनी पड़ी. इसके तहत कैबिनेट में फेरबदल करके साफ-सुथरी छवि वाले आठ नए मंत्रियों को शामिल किया गया. डायमंड हार्बर सीट से सांसद अभिषेक ने अप्रैल से जून, 2023 के बीच 60 दिनों तक तृणमूल नबो ज्वार (टीएमसी में नया उत्साह) अभियान के तहत पूरे राज्य में यात्रा निकाली और निराश वोटरों को भरोसा दिलाया कि पार्टी बड़े पैमाने पर सब कुछ सुधार रही है.
अभिषेक एक नए सेनापति के तौर पर 2021 में टीएमसी की शानदार जीत के सूत्रधार भी बने. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर आए और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कई विधायकों का टिकट काटा. आखिरकार, 48 फीसद वोट शेयर के साथ पार्टी 213 सीटें जीतने में सफल रही और 38 फीसद वोट शेयर के बावजूद भाजपा 77 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई.
साल 2021 की तरह लोकसभा के लिए टीएमसी उम्मीदवारों की सूची में भी अभिषेक की छाप है. पार्टी नेताओं के मुताबिक, भाजपा से आए बिश्वजीत दास, कृष्णा कल्याणी और मुकुटमणि अधिकारी को क्रमश: बनगांव, रायगंज और राणाघाट से उतारने का फैसला अभिषेक का ही था. उन्होंने बंगाल से बाहर के दो पूर्व क्रिकेटरों यूसुफ पठान (बहरामपुर) और कीर्ति आजाद (दुर्गापुर-बर्दवान) को भी मैदान में उतारा.
टीएमसी वोट बैंक के नाम पर काफी हद तक राज्य की 30 कल्याणकारी योजनाओं के लाखों लाभार्थियों पर नजरें टिकाए है. इसके अलावा, केंद्र सरकार की कल्याणकारी पहल के साथ प्रतिस्पर्धा करती भी नजर आ रही है. मसलन, समानांतर मुफ्त राशन योजना चल रही है और लोगों को बताया जाता है कि कैसे उन्हें इसके लिए ममता दीदी का आभारी होना चाहिए. एक प्रमुख योजना लक्ष्मी भंडार भी है, जिसमें महिलाओं के खाते में 1,000 रुपए का मासिक मानदेय भेजा जाता है.
'बंगाली विरोधी' पार्टी
नरेगा और प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के तहत केंद्र से धन नहीं मिलने को टीएमसी ने एक अहम चुनावी मुद्दा बनाया है. केंद्र राज्य प्रशासन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को इसका जिम्मेदार बताता है. टीएमसी कहती है कि इस तरह से बंगाल का हक छीना जा रहा है. पार्टी पीएम मोदी और भाजपा को 'बंगाली विरोधी' के तौर पर भी पेश करती है. हाल में राज्य ने अपने खजाने से 3,732 करोड़ रुपए (नरेगा के तहत देय मजदूरी का एक हिस्सा) मंजूर किया और जॉब कार्ड धारकों को 50 दिनों के काम की गारंटी देने वाला राज्य-प्रायोजित कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया.
इस सबके बीच, सीएए ने टीएमसी को चुनाव के बीच बैठे-बैठाए एक अच्छा मुद्दा दे दिया है. विवादास्पद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के साथ जोड़कर ममता लोगों से इसके विरोध की अपील कर रही हैं. इससे खासकर उनका मकसद अपने भरोसेमंद मुस्लिम वोट बैंक को साधना है, जो राज्य में 27 फीसद हैं. टीएमसी इस रणनीति के साथ भी सीएए का मुद्दा जोर-शोर से उछाल रही है कि मुस्लिम वोट के भाजपा विरोधी पार्टियों में बंटने की संभावना को खत्म किया जा सके.
बहरहाल, भाजपा इससे असहमत है. अधिकारी कहते हैं, "टीएमसी ने सीएए का राजनीतिकरण कर 2021 में मुसलमानों को बेवकूफ बनाया. मगर अब उन्हें एहसास हो गया है कि यह उनकी नागरिकता नहीं छीनने जा रहा." मोदी, शाह और भाजपा के अन्य नेता भी इससे इनकार कर रहे हैं कि सीएए के तहत पंजीकरण से नागरिकता खत्म हो जाएगी. टीएमसी ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आई तो सीएए रद्द कर देगी, एनआरसी बंद कर देगी और यूसीसी को लागू नहीं करेगी.
भाजपा की रणनीति
सीएए मुद्दे से भाजपा भी अपना वोट बैंक साधना चाहती है. सीएए के लागू होने को मतुआ समुदाय के लिए अहम माना जा रहा है. यह दलित समुदाय है जो विभाजन के वक्त और उसके बाद पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर आया था. नए कानून पर अमल के व्यावहारिक पहलू थोड़े अस्पष्ट हैं. फिर भी, मतुआ लोगों की संख्या 30 लाख से अधिक है और वे उत्तरी 24 परगना और नादिया जिले की पांच सीटों पर चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जिनमें भाजपा के कब्जे वाली राणाघाट (सुरक्षित) और बनगांव (सुरक्षित) शामिल हैं. भाजपा को 2019 और 2021 में समुदाय का पूरा समर्थन मिला था.
भाजपा खुलकर अपनी महत्वाकांक्षा जता रही है कि वह बंगाल में 30 सीटें जीतना चाहती है. मगर पार्टी को आंतरिक कलह से भी जूझना पड़ रहा है. उम्मीदवार तय करने में अधिकारी की भूमिका काफी अहम है, और टीएमसी से पाला बदलकर आए कई नेताओं को मैदान में उतारा गया है, जिनमें तापस रॉय (कोलकाता उत्तर) और अर्जुन सिंह (बैरकपुर) शामिल हैं.
वहीं, राज्य भाजपा के पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष को मेदिनीपुर की उनकी मौजूदा सीट से हटाकार बर्दमान-दुर्गापुर भेजा दिया गया है. पार्टी में शामिल होने वाले पूर्व जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय (तमलुक) को भी खास तवज्जो मिली है. भाजपा के एक नेता ने कहा, "अधिकारी के प्रभार संभालने के साथ सुकांत मजूमदार (राज्य भाजपा प्रमुख) अपनी सीट (बालुरघाट) पर टिके रहे, यह बात दूसरे नेताओं को अच्छी नहीं लगी है." भाजपा ने भ्रष्टाचार के अलावा संदेशखाली मामले और महिलाओं की सुरक्षा को एक बड़ा मुद्दा बना रखा है.
भाजपा को 2019 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 लोकसभा सीटों में से छह और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित दोनों सीटों—झाड़ग्राम और अलीपुरदुआर—पर जीत मिली. मगर 2021 में टीएमसी ने इनके तहत आने वाली कुछ विधानसभा सीटों को फिर अपने कब्जे में ले लिया. अब भाजपा यहां फिर मजबूती से खड़ा होने की कोशिश कर ही है. उसे बांकुरा, बिष्णुपुर, झाड़ग्राम, मेदिनीपुर और पुरुलिया सीटें बरकरार रखने के लिए भी कड़ी मेहनत करनी होगी.
पार्टी ने ये सीटें कुर्मियों के समर्थन से जीती थीं. मगर यह ओबीसी समुदाय एसटी दर्जे में शामिल करने की अपनी मांग पूरी न होने से नाखुश है. कुछ ऐसी ही स्थिति उत्तर में भी है जहां राजबंगशियों का भाजपा से थोड़ा मोहभंग हो गया. उत्तर की जिन करीब पांच सीटों पर इस एससी समुदाय का वर्चस्व है, वहां पहले चरण में मतदान हो चुका है. 2019 में भगवा को व्यापक समर्थन देने वाला यह समुदाय अलग राज्य की मांग आगे न बढ़ पाने से निराश है. पश्चिम में कुर्मी बहुल सीटों पर छठे चरण में 25 मई को मतदान होना है.
लैंगिक आधार पर चुनावी रणनीति अधिक मुखरता से उभरी है. ममता को अब तक महिला मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला है, 2019 में 3.73 करोड़ महिला मतदाताओं में से 47 फीसद ने पार्टी के पक्ष में मतदान किया, और 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 50 फीसद हो गया. यही कारण है कि भाजपा संदेशखाली की घटना को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाए हुए है, जहां महिलाओं ने टीएमसी के स्थानीय कद्दावर नेता शाहजहां शेख और उनके गुर्गों के जमीन कब्जाने और यौन शोषण करने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. भाजपा ने एक प्रदर्शनकारी रेखा पात्रा को तो बशीरहाट से अपना उम्मीदवार भी बना दिया.
कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन
ममता ने राज्य में इंडिया गठबंधन की स्थिति को हास्यास्पद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. दरअसल, ममता को भरोसा था कि अकेले चुनाव लड़कर वे 2019 में टीएमसी की जीती 22 सीटों के आंकड़े को और बेहतर कर सकती हैं. साथ ही, एक और विपक्षी गठबंधन के मैदान में होने से सत्ता विरोधी वोट भी बंट सकता है. माकपा, भाकपा, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक के वामपंथी गठबंधन ने 30 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जबकि कांग्रेस ने 12 प्रत्याशी खड़े किए हैं.
कांग्रेस के पास बंगाल से दो सांसद हैं—बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और मालदा दक्षिण से अबू हाशिम खान चौधरी, जबकि वामपंथी खाली हाथ हैं. भारतीय सांख्यिकी संस्थान में प्रोफेसर सुभमय मैत्रा कहते हैं, "2019 और 2021 में वामपंथी वोटों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की झोली में चला गया था, अगर उनमें से कुछ की वापसी होती है तो जाहिर है कि इसका नुक्सान भाजपा को ही होगा."
अंतत:, बंगाल में इस बार शानदार प्रदर्शन के लिए ममता को अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के तीखे हमलों से खुद को बचाना होगा और अपने लक्ष्यों को सटीक तरीके से साधना होगा. बाकी मतदाताओं के पास तो मंथन के लिए मुद्दों की कोई कमी नहीं हैं.
—अर्कमय दत्ता मजूमदार

