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बिहार में नेताजी नहीं, चुनाव लड़ेंगे बेटीजी-बेटाजी

बिहार में बड़े नेताओं के छह बच्चों समेत 28 खानदानी प्रत्याशी मैदान में, तो क्या चुनावी टिकट नेताओं के परिजनों को ही मिला करेंगे और कार्यकर्ता सिर्फ दरियां बिछाया करेंगे?

पिता लालू प्रसाद यादव के साथ रोहिणी आचार्य
पिता लालू प्रसाद यादव के साथ रोहिणी आचार्य
अपडेटेड 16 मई , 2024

समस्तीपुर शहर के बीचोबीच हरी दीवारों और एसबेस्टस की छत वाले एक छोटे-से मकान कर्पूरी आश्रम में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का जिला कार्यालय है. 27 अप्रैल की दोपहर इसी में 8-10 कार्यकर्ताओं की बैठकी जमी हुई थी. जिक्र चला नेताओं के बेटे-बेटियों के चुनाव लड़ने का.

बातों ही बातों में कार्यकर्ता मनोरंजन प्रसाद यादव के मुंह से निकल गया, "किसी एक पार्टी का नहीं, सबका यही हाल है. कार्यकर्ता लोग पांच साल दरियै बिछाता रह जाता है और लीडर बम्बई से लाकर कंडीडेट उतार देते हैं. कार्यकर्ता को कोई पुछबै नहीं करता, ऊ इलक्सन लड़े भी तो कैसे लड़े. कम से कम पांच करोड़ त नगदी चाही ना, पॉकिट में!"

मनोरंजन का इशारा समस्तीपुर लोकसभा सीट की तरफ था. वहां इस बार दोनों प्रमुख धड़ों से दो बड़े राजनेताओं के बच्चे चुनाव में हैं. एनडीए की तरफ से लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी (लोजपा रामविलास) के टिकट पर शांभवी चौधरी चुनाव लड़ रही हैं, जो जनता दल यूनाइटेड (जद-यू) नेता अशोक चौधरी की बेटी हैं.

वहीं, इंडिया गठबंधन की तरफ से कांग्रेस के सन्नी हजारी मैदान में हैं, जो जद (यू) के ही महेश्वर हजारी के बेटे हैं. दिलचस्प है कि दोनों संतानों ने नॉमिनेशन से चंद रोज पहले ही अपनी-अपनी पार्टियों की मेंबरशिप ली है. इससे पहले वे किसी राजनैतिक दल में नहीं थे. ऐन चुनाव के वक्त इधर जॉइनिंग, उधर टिकट हाथ में.

ये दोनों कोई इकलौती मिसाल नहीं हैं, जो मां-बाप की सियासी विरासत की वजह से चुनाव में उतरे हैं. बिहार में इस बार कम से कम छह उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्हें माता-पिता की वजह से पहली बार बिना किसी खास अनुभव के बड़े गठबंधनों से लोकसभा का टिकट मिला है. लालू प्रसाद यादव की दूसरी संतान रोहिणी आचार्य भी इनमें शुमार हैं. उन्हें राजद ने उस छपरा लोकसभा सीट से टिकट दिया है, जहां पहले लालू खुद चुनाव लड़े थे.

रोहिणी ने पिता को अपनी किडनी डोनेट की है. लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती 2014 से ही पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव लड़ती रही हैं और इस बार भी मैदान में हैं.

कांग्रेस ने सन्नी हजारी के अलावा महाराजगंज सीट से प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह के बेटे आकाश सिंह को टिकट दिया है. आकाश पिछली बार राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी (रालोसपा) के टिकट पर पूर्वी चंपारण लोकसभा सीट से लड़े, लेकिन हार गए थे.

पटना साहिब लोकसभा सीट से कांग्रेस ने अबकी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के बेटे अंशुल अविजित को उतारा है. पेश से पत्रकार रहे अंशुल पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.

लोजपा ने जमुई सीट से चिराग पासवान के बहनोई अरुण भारती को उतारा है, जिनकी मां ज्योति विधायक रह चुकी हैं. राजद ने इस बार मधेपुरा सीट से पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार रवि के पुत्र कुमार चंद्रदीप को टिकट दिया है, जो पटना के एक कॉलेज में लेक्चरर हैं.

दोनों बड़े गठबंधनों - एनडीए और इंडिया - के सभी उम्मीदवारों का आकलन किया जाए तो पता चलता है कि 22 उम्मीदवार ऐसे हैं, जो किसी न किसी बड़े राजनेता की संतान हैं. इनमें 12 इंडिया गठबंधन के हैं और 10 एनडीए के. सियासी परिवारों से जुड़े लोगों की बात जोड़ दी जाए तो छह महिलाएं ऐसी हैं जो किसी चर्चित या दबंग राजनेता की पत्नी हैं. इनमें तीन-तीन दोनों धड़ों की हैं.

मगर इस लंबी सूची में समस्तीपुर की सीट कुछ खास अहमियत है. वजह? यही कि यहां दोनों धड़ों ने नेताओं की संतानें ही मैदान में हैं. दोनों को दलगत राजनीति में आए अभी महीना भी नहीं गुजरा है. दिलचस्प है कि अशोक चौधरी और महेश्वर हजारी दोनों नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में मंत्री हैं. समस्तीपुर में 13 मई को वोट पडऩे हैं. हालांकि चिलचिलाती धूप में भी चुनाव का माहौल गरमा नहीं रहा. मगर दोनों नौसिखुआ कैंडिडेटों ने क्षेत्र में दिन भर चक्कर लगाना शुरू कर दिया है. 25 साल की शांभवी के साथ उनका लंबा-चौड़ा परिवार घूम रहा है, तो 33 साल के सन्नी अकेले भटक रहे हैं. उनके पिता अपनी पार्टी की मजबूरी की वजह से उनका प्रचार नहीं कर पा रहे.

सन्नी दिन के 11 बजे अपने चुनाव कार्यालय में मिलते हैं. कार्यकर्ताओं की टोली के साथ वे प्रचार में जाने की तैयारी कर रहे हैं. इंडिया टुडे से बातचीत में वे स्पष्ट करते हैं, "भले ही मैं सियासी परिवार से हूं मगर अपनी जमीन मैंने खुद बनाई है. करियर की शुरुआत मैंने पंचायत चुनाव से की, अभी प्रमुख हूं. मेरे पिता बिहार सरकार में मंत्री हैं मगर मुझे उन्होंने यही सलाह दी कि अपनी जमीन खुद तैयार करूं. मैं पैराशूट लैंडिग वाला उम्मीदवार नहीं."

उनका कहना था कि राहुल गांधी से प्रभावित होने की वजह से वे कांग्रेस में आए. मगर उनके जाने के बाद अनौपचारिक बातचीत में कार्यकर्ता बताते हैं कि वे आखिर-आखिर तक लोजपा (रामविलास) से टिकट लेने के जुगाड़ में लगे थे. पिछले चुनाव में यहां लोजपा से चिराग के चचेरे भाई प्रिंस जीते थे, जो पार्टी में बंटवारे के बाद उनके चाचा पशुपति पारस के साथ चले गए थे. ऐसे में चिराग के करीबी रिश्तेदार सन्नी को उम्मीद बंध रही थी कि चिराग उन्हें टिकट देंगे. पिछले दिनों सन्नी की बेटी के जन्मदिन में शामिल होने चिराग खुद उनके घर आए थे. सन्नी भी चिराग के बहनोई अरुण भारती के नॉमिनेशन के दौरान जमुई गए थे. वहां चिराग के साथ उनकी तस्वीर आज भी उनके फेसबुक पेज पर दिखती है.

बताते हैं, चिराग ने जब समस्तीपुर से उनके बदले शांभवी का नाम फाइनल कर दिया तो आनन-फानन में सन्नी ने अपने पिता की मदद से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह और राजद सुप्रीमो लालू यादव से संपर्क साधा और उन्हें टिकट मिल गया.

बाहर के लोगों को चिराग और सन्नी के आपसी रिश्तों के बारे में कम मालूम है मगर समस्तीपुर के कई लोग इनके रिश्तों के बारे में विस्तार से बताते मिल जाएंगे. लोग बताते हैं कि चिराग के पिता दिवंगत रामविलास पासवान और सन्नी के पिता महेश्वर हजारी ममेरे-फुफेरे भाई हैं. महेश्वर हजारी के पिता रामसेवक हजारी 1977 में रोसड़ा (अब समस्तीपुर) से सांसद चुने गए थे. वे रामविलास के सगे मामा थे और दावा किया जाता है कि मामा ही उन्हें राजनीति में लाए थे.

समस्तीपुर पासवान-हजारी परिवार की पारिवारिक सीट बन गई है. पासवान 1991 में इसी सीट से जीते. 1999, 2004, 2014 और 2019 में उनके छोटे भाई रामचंद्र पासवान जीते. रामचंद्र की मृत्यु के बाद 2019 में हुए उपचुनाव में उनके बेटे प्रिंस ने इस सीट पर जीत दर्ज की. 2009 में खुद सन्नी के पिता महेश्वर हजारी यहां से सांसद बने. इस तरह इस सीट पर पासवान और हजारी परिवार का लंबे अरसे तक कब्जा रहा. यह एक तरह से उनकी पारिवारिक सीट बन गई है.

हालांकि इस सीट पर कांग्रेस की तरफ से कई लोगों का दावा था. मसलन, अशोक राम, तमिलनाडु के पूर्व डीजीपी और सहरसा के रहने वाले ब्रजकिशोर रवि और समस्तीपुर की मेयर अनीता राम. अनीता टिकट के लिए दिल्ली तक गई थीं. रवि ने निर्दलीय लड़ने का फैसला कर लिया था. सबसे ज्यादा नाराजगी अशोक राम को हुई. वे पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस की तरफ से लड़ते और कम अंतराल से हारते रहे. उन्हें लगता था कि इस बार उन्हें टिकट मिला तो वे पक्का जीतेंगे. टिकट न मिलने पर उन्होंने सोनिया गांधी को शिकायती चिट्ठी लिखी. 

उन्हीं के शब्दों में, "मैंने लिखा है कि पार्टी अगर इसी तरह आखिरी वक्त में जॉइन करने वाले लोगों को टिकट देती रही तो समर्पित लोगों का क्या होगा? मैंने सन्नी के साथ, मुजफ्फरपुर से पार्टी का टिकट पाने वाले अजय निषाद का भी जिक्र किया है." वैसे, राम को सन्नी के एक बड़े राजनेता का पुत्र होने की वजह से टिकट पाने को लेकर कोई शिकायत नहीं है. "राजनीति में तो लोग विरासत से आते ही हैं. मेरे पिता बालेश्वर राम खुद समस्तीपुर के सांसद रहे हैं."

समस्तीपुर के आम कार्यकर्ताओं को भी इस तरह के परिवारवाद से ज्यादा दिक्कत नहीं है. अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं से बातचीत के दौरान यही राय उभरी कि चुनाव लड़ने के लिए मोटे पैसे और क्षेत्र में संपर्क की जरूरत होती है. किसी बड़े राजनेता की संतान को यह सब सहज उपलब्ध होने की वजह से उनके लिए चुनाव लड़ना आसान हो जाता है. तभी तो महज 25 साल की शांभवी चौधरी भी मैदान में हैं. टिकट पाने के एक दिन पहले ही वे लोजपा की सदस्य बनीं.

उस रोज वे हाया घाट के अलग-अलग इलाकों में घूम रही थीं. कई परिजन भी साथ थे: पति शायन कुणाल, मां-चाची और बहनें वगैरह. उनके पिता अशोक चौधरी भी अक्सर उनके क्षेत्र में आते हैं और कभी उनके साथ घूमते हैं तो कभी ऑफिस में बैठकर सब संभालते हैं. पूर्व आइपीएस अफसर और महावीर मंदिर न्यास बोर्ड के सचिव, उनके ससुर किशोर कुणाल भी इन दिनों समस्तीपुर में उनकी मदद करने आए हैं. शांभवी से पहले उनके पिता शांभवी के पति शायन को टिकट दिलाने की कोशिश कर रहे थे मगर आखिरी वक्त में लोजपा ने शांभवी को समस्तीपुर से टिकट दे दिया.

शांभवी से धनौली गांव में भेंट हुई, जहां उनका काफिला लंच के लिए गांव की ठाकुरबाड़ी में जुटा था. शांभवी 27 दिन से इलाके में घूमते हुए कुछ हद तक राजनैतिक रूप से मैच्योर लग रही थीं. उन्होंने इस इलाके की बदहाल सड़कों, समस्तीपुर के किसानों और यहां के लिए फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की संभावनाओं के बारे में बताया.

परिवारवाद और वंश परंपरा के सवाल पर शांभवी कहती हैं, "यह किसी परिवार का नहीं, कुछ हद तक दो लोगों का चुनाव है, मगर असल में दो विचारधाराओं का मुकाबला है. मैं यह नहीं मानती कि कार्यकर्ताओं को मौका नहीं मिलता. पार्टी सर्वेक्षण के बाद ही किसी को मौका देती है. पार्टी कार्यकर्ता जब चाहते हैं, तभी कोई चुनाव में खड़ा होता है. आज अगर हम यहां से चुनाव लड़ रहे हैं तो इसलिए कि पार्टी कार्यकर्ता हमारे साथ हैं."

हालांकि अंदरूनी खबर यह है कि नीतीश इस तरह से शांभवी के लोजपा से चुनाव लड़ने की खबर से नाराज हैं. लोजपा के साथ अभी भी वे बहुत सहज नहीं हैं. मगर शांभवी को भरोसा है कि नीतीश उनका प्रचार करने के लिए जल्द आएंगे. वे कहती हैं, "नीतीश जी, मेरे पिता के लगातार संपर्क में हैं और हमेशा हमारी खबर पूछते रहते हैं."

शांभवी की तरह पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के पुत्र अंशुल अविजित को कांग्रेस ने पटना साहिब सीट से टिकट दिया है. वे अपने नाना प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और भारत सरकार की पहली कैबिनेट के मंत्री जगजीवन राम के कदमकुआं, पटना स्थित आवास में मिलते हैं. इस आवास के दरवाजे पर अब उनकी मां मीरा कुमार का नाम लिखा है. अंशुल अपने नाना की तरह अपनी दादी सुमित्रा देवी को भी गर्व से याद करते हैं, जो बिहार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री थीं.

वे अपने आपको राजनीति का अनुभवी इंसान मानते हैं. वे कहते हैं, "1986 से अब तक मैं अपनी मां के सभी चुनाव में आकर संचालन करता रहा हूं. सियासत में मेरा तजुर्बा काफी लंबा और गहरा रहा है. 2019 में मैं आधिकारिक रूप से कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता बन गया. तब से आज तक कांग्रेस के विचार को मैं लोगों तक पहुंचाता रहा हूं."

वंशवाद के सवाल पर वे कहते हैं, "मुझे अपने परिवार और पृष्ठभूमि पर बड़ा गर्व है, मैं इसी की वजह से राजनीति में आया. यह सच है कि राजनैतिक परिवार से राजनीति में आना आसान है. मगर आप आगे तभी बढ़ते हैं, जब आप में काबिलियत हो. वैसे, मुझे लगता है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को भी भरपूर मौके मिलते हैं और मिलते रहेंगे." 

इन तीनों के अलावा कुमार, चंद्रदीप मधेपुरा से चुनावी तैयारी में व्यस्त हैं. रोहिणी आचार्य ने छपरा में चुनावी अभियान छेड़ रखा है. अरुण भारती का चुनाव पहले चरण में संपन्न हो चुका है. इनमें से ज्यादातर लोगों से अब कोई यह नहीं पूछ रहा कि वे हवाई उम्मीदवार की तरह अचानक मैदान में क्यों उतर आए.

चुनाव से पहले भाजपा ने परिवारवाद और वंशवाद के खिलाफ अभियान छेड़ रखा था. 6 मार्च को पश्चिमी चंपारण में बेतिया आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालू के परिवारवाद पर अपने संबोधन में तगड़ी चोट की थी. इसके बाद एनडीए नेता लगातार राजद के परिवारवाद पर हमला करने लगे थे. मगर अप्रैल के पहले हफ्ते में तेजस्वी यादव ने एक सूची जारी करते हुए बताया कि एनडीए के 14 प्रत्याशी राजनैतिक परिवारों से संबंधित हैं. इसके बाद एनडीए की तरफ से परिवारवाद पर हमला बंद हो गया. 

हालांकि जनसुराज अभियान के तहत पिछले डेढ़ साल से लगातार पदयात्रा कर रहे प्रशांत किशोर हमेशा राजनीति में परिवारवाद के सवाल को उठाते हैं. उनकी टीम ने एक सर्वेक्षण कराया है, इसका हवाला देते हुए वे कहते हैं, "पिछले तीस वर्ष में सिर्फ 1,250 परिवार के लोग ही विधायक और सांसद बने हैं. इस तरह यहां कुछ परिवारों का राजनीति पर कब्जा है. अगर आपके बाबूजी पहले से राजनीति में नहीं हैं, आपके पास बहुत पैसा नहीं है तो चुनाव लड़ने का अवसर आपके पास नहीं है. ऐसा सिर्फ लालू जी के केस में नहीं है. भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी खुद बड़े नेता हैं और कई पार्टियों में सक्रिय हैं. हर प्रखंड में कुछ परिवारों ने राजनीति पर कब्जा कर रखा है."

ऐसा क्यों है? यह जानने के लिए इंडिया टुडे ने राजनीति और समाज पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों से बातचीत की. ए.एन. सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक डी.एम. दिवाकर कहते हैं, "ऐसा इसलिए है कि आजादी के बाद हमने नागरिकों का निर्माण ही नहीं किया. राजनीति में धन बल का कब्जा हो गया और लोकतंत्र लोगों के द्वारा तो चलता रहा, मगर लोगों के लिए नहीं हो पाया."

वहीं अशोका फेलो और संविधान पर लगातार लेखन करने वाले सचिन जैन कहते हैं, "इसकी सबसे बड़ी वजह कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों के निर्माण की प्रक्रिया को बाधित करना है. बिहार में संपूर्ण क्रांति के वक्त के छात्र आंदोलन से जो राजनेताओं की पीढ़ी राजनीति में आई थी, वही अभी राज कर रही है. अगर कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में छात्र संगठन पहले की तरह बनते और सक्रिय रहते तो राजनेताओं की नई पीढ़ी भी आती रहती. मगर उसे पठन-पाठन में बाधा मानकर बाधित किया जा रहा है और ऐसे में पुराने राजनेताओं के बच्चों को ही राजनीति में जगह मिल रही है."

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