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लोकसभा चुनाव 2024 : महाराष्ट्र के सियासी समीकरण में कौन है सबसे आगे?

महाराष्ट्र में अब तक की सबसे पेचीदा सियासी जंग में वोटों की तलाश करते ढुल-मुल गठबंधन सत्ता संघर्षों और विश्वासघातों की दिलचस्प महागाथा रच रहे हैं

मुंबई में 1 सितंबर, 2023 को कांग्रेस नेता राहुल गांधी, एनसीपी (एससीपी) मुखिया शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे
मुंबई में 1 सितंबर, 2023 को कांग्रेस नेता राहुल गांधी, एनसीपी (एससीपी) मुखिया शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे
अपडेटेड 15 मई , 2024

अभी वे दुश्मनों की तरह लड़ा करते थे. मगर 18 अप्रैल को एक तपती दोपहरी उन्होंने पुणे की एक रैली में एक साथ मंच साझा किया. वहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उनके साथी उप-मुख्यमंत्री अजित पवार, राज्य के पूर्व मंत्री हर्षवर्धन पाटील, एनसीपी के दत्तात्रेय भराणे और विधान परिषद की उप सभापति डॉ. नीलम गोरे मंच पर विराजमान थीं.

अजित पवार ने भाजपा और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाले शिवसेना गुट की महायुति सरकार में शामिल होने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को तोड़ दिया था. वहीं, हर्षवर्धन कांग्रेस से पाला बदलकर भाजपा में आए, तो भराणे ने उन्हें पुणे की इंदापुर विधानसभा सीट से दो बार 2014 और 2019 में हराया था. गोरे भी अब शिंदे की शिवसेना में हैं.

मंच पर मौजूद कई नेताओं की तरफ इशारा करते हुए फडणवीस ने हुंकार भरी, "जीतने के लिए करीब सात से आठ लाख वोट चाहिए...जो लोग इस मंच पर हैं, उनमें 12 से 15 लाख वोट लाने की क्षमता है."

महाराष्ट्र 48 सीटों के साथ उत्तर प्रदेश (80) के बाद संसद के निचले सदन में सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाला दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. ऐसे में यह सत्तासीन महायुति गठबंधन और उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) दोनों के लिए बेहद अहम है. कुछ समय पहले तक राज्य का सियासी परिदृश्य स्थिर था. मगर, दोनों गठबंधन मौके की नजाकत और जरूरत के हिसाब से बनाए गए ऐसे सतरंगी गठबंधन हैं जिनसे महाराष्ट्र की सियासी महागाथा के पेचीदा घुमावों और उतार-चढ़ावों की झलक मिलती है.

चाचा और भतीजे, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, ननद और भाभी एक दूसरे के खिलाफ इस कदर डटी हैं कि महाराष्ट्र के महाभारत का सियासी संस्करण बॉलीवुड की धमाकेदार हिट से हिट फिल्म को भी शर्मिंदा कर दे. असल में, इन दोनों गठजोड़ के किरदारों का प्रदर्शन इनसे भी व्यापक गठबंधनों—राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और विपक्षी इंडियन नेशनलिस्ट डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया)—की किस्मत तय करेगा.

राज्य में कांग्रेसमुखी पार्टियों का पारंपरिक दबदबा 2014 में उस वक्त टूट गया जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने कांग्रेस और एनसीपी के कई दिग्गजों को धूल चटाते हुए राज्य की 42 सीटें जीत लीं. कुछ महीने बाद हुआ विधानसभा चुनाव जीतकर भगवा गठबंधन राज्य की सत्ता में भी आ गया. 2019 के चुनाव में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन ने 48 में से 41 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस एकमात्र जीत विदर्भ के चंद्रपुर में हासिल कर सकी.

पांच साल बाद काफी कुछ बदल चुका है. पारंपरिक भूमिकाओं को उलटकर भाजपा की जूनियर पार्टनर की हैसियत में धकेल दी गई शिवसेना ने 2019 में अपने विरोधियों कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया और उसके अध्यक्ष उद्धव ठाकरे की अगुआई में एमवीए की सरकार बनाई. मगर भाजपा तीन साल बाद ठाकरे के पैरों तले जमीन खिसकाने में सफल रही.

जून, 2022 में भाजपा ने शिंदे के हाथों शिवसेना में फूट डलवा दी और उन्हें मुख्यमंत्री और उस पद पर रह चुके फडणवीस को उनका डिप्टी बनाकर सरकार का गठन किया. महज एक साल बाद जुलाई, 2023 में नेता विपक्ष अजित पवार एनसीपी को तोड़कर और अपने चाचा और पार्टी सुप्रीमो शरद पवार को छोड़कर आ गए और भाजपा ने भी उन्हें इस दुश्चिंता में हाथों-हाथ लिया कि शिंदे लोकसभा चुनाव में शायद नतीजे न दे पाएं. 

महायुति के नेता सार्वजनिक तौर पर भले जितना भी आत्मविश्वास दिखाएं, उनके कार्यकर्ता और निचले स्तर के नेता स्वीकार करते हैं कि राजनीति की उलझी हुई दुनिया में दो और दो मिलकर हमेशा चार नहीं होते. दोनों पार्टियों में दो फाड़, विपक्षी जमात से दलबदल, दबी हुई सत्ता-विरोधी भावना (स्थानीय निकायों के चुनाव दो साल टालकर सरकार हालात के अनुकूल होने का इंतजार करती रही है).

प्रभावशाली मराठों और उभरते अन्य पिछड़ों के बीच कोटे की मांगों से बढ़ता जाति विभाजन, ज्यादा से ज्यादा दो ध्रुवीय होती राजनीति जिसमें छोटे खिलाड़ियों के लिए कम ही जगह रह गई है, विपरीत उद्देश्यों से काम कर रहे नेताओं का एक खेमे में आ जाना, और सामाजिक ताकतों का नाटकीय पुनर्गठन, इन सबने मिलकर इसे बहुस्तरीय चुनाव में बदल दिया है. राजनैतिक विभाजन के दोनों तरफ के नेता मानते हैं कि राज्य के सभी 48 निर्वाचन क्षेत्रों में कांटे की लड़ाई को देखते हुए इस चुनाव के बारे में कुछ भी कह पाना मुश्किल हो सकता है.

शिंदे और अजित अब आधिकारिक शिवसेना और एनसीपी के प्रमुख हैं, जबकि प्रतिद्वंद्वी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और एनसीपी (शरदचंद्र पवार) मूल राजनैतिक पार्टियों की नुमाइंदगी के उनके दावों को चुनौती दे रही हैं. इसने एमवीए को उसका सबसे ताकतवर मुद्दा—यानी महायुति को घेरने के लिए मजबूत क्षेत्रीय नैरेटिव दे दिया है और वह यह है कि महाराष्ट्र में सत्ता हथियाने के लिए भाजपा ने दो क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ दिया.

अप्रैल की 18 तारीख को महायुति की रैली से महज एक किमी दूर बड़े पवार ने सत्ता के 'दुरुपयोग' को लेकर नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार को जमकर लताड़ा. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरीखे विपक्षी नेताओं के जेल में बंद होने की तरफ इशारा करते हुए एक जनसभा में पवार ने कहा, "सत्ता में बैठे लोगों ने दिखा दिया है कि सत्ता का अहंकार और दंभ कैसा होता है." उन्होंने आरोप लगाया, "पिछले 10 साल से सत्ता में बैठे लोगों ने महंगाई, बेरोजगारी और महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों के मामले में देश की जनता को धोखा दिया है...उनके आश्वासनों और वास्तविकता के बीच बड़ा फासला है."

विपक्षी नेताओं का दावा है कि भाजपा ने अजित और पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण सरीखे नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सरीखी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया और इस नैरेटिव ने लोगों के दिलों के तार छू लिए हैं. मध्य प्रदेश की एक जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी की जुबानी एनसीपी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने के महज कुछ ही दिन बाद अजित ने एनसीपी में फूट को अंजाम दिया. इसी तरह चव्हाण फरवरी में तब भाजपा में आए जब भारतीय अर्थव्यवस्था पर केंद्र की तरफ से जारी श्वेत पत्र में उस कथित आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले का जिक्र किया गया जिसकी वजह से चव्हाण को 2010 में मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था.

अलबत्ता भाजपा के नेताओं का कहना है कि मोदी के लिए तीसरे कार्यकाल का उनका चुनाव प्रचार यह पक्का करने में जुटा है कि जनता के बीच नैरेटिव से स्थानीय मुद्दे गायब हो जाएं. यही नहीं, महाराष्ट्र में अभूतपूर्व पांच चरणों में मतदान (2019 में तीन चरणों में हुआ था) का मतलब यह है कि भाजपा ही शायद अकेली पार्टी है जिसके पास थककर चूर हुए बिना पूरी ताकत झोंकने के संसाधन भी हैं और दमखम भी. तिस पर भी, अपने कुछ सांसदों के खिलाफ सत्ता-विरोधी भावना होने के बावजूद ज्यादातर सांसदों को बनाए रखने और राज ठाकरे की अगुआई वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) जैसे छोटे खिलाड़ियों को अपने साथ लेने सरीखे भाजपा के कदमों से धारणा तो यही बनी है कि वह बैकफुट पर है.

दूसरी तरफ एमवीए के भीतर भी चीजें ठीक-ठाक नहीं हैं. कांग्रेस नेता सांगली और भिवंडी सरीखी उनकी पारंपरिक सीटें छीन लेने की वजह से शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एससीपी) से नाराज हैं. सूत्रों का कहना है कि एमवीए की पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल उतना अच्छा नहीं है जितना होना चाहिए.

दो ध्रुवीय मुकाबला होने के बावजूद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर और किसान नेता राजू शेट्टी की अगुआई वाले वंचित बहुजन अघाड़ी सरीखे छोटे खिलाड़ियों को साथ नहीं ला पाना कुछ सीटों पर विपक्षी खेमे की संभावनओं को प्रभावित कर सकता है. वोटों के हस्तांतरण का सिद्धांत किसी भी चुनाव पूर्व गठबंधन की आधारशिला है, लेकिन दोनों खेमों में शामिल पार्टियों की बेमेल फितरत और दुश्मनी के इतिहास को देखते हुए यह भी एक बड़ा सवाल है कि वे अपने साथी दलों को वोटों का हस्तांतरण करवा पाएंगी या नहीं.

सहानुभूति का असर

एमवीए नेताओं का दावा है कि शिवसेना और एनसीपी में विभाजन से सत्तारूढ़ मोर्चे के खिलाफ क्षेत्रीय भावनाओं में इजाफा हुआ है और पवार तथा ठाकरे के प्रति सहानुभूति पैदा हुई है. पवार के सहयोगी और मराठा संगठन संभाजी ब्रिगेड के प्रवीण गायकवाड़ कहते हैं, "सत्ता पाने के लिए भाजपा ने दो क्षेत्रीय पार्टियों में टूट पैदा कर दी...अगर आत्मसम्मान को चोट पहुंचाई जाती है तो महाराष्ट्र के लोग नाराज हो जाते हैं."

"हमारी परिवार पंपरा में बुजुर्गों का हमेशा सम्मान किया जाता है. अगर ऐसे वरिष्ठ लोगों पर हमला किया जाता है तो लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचती है." शिवसेना (यूबीटी) के नेता और विधायक भास्कर जाधव का दावा है कि लोग 'नरेंद्र मोदी के अहंकार' से खफा हैं. वे इलजाम लगाते हैं, "विपक्ष के नेताओं के खिलाफ आरोप लगाए गए और फिर उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया गया." उनका कहना है कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा का वादा कहीं पीछे छूट गया.

पुणे में 18 अप्रैल को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (बीच में), उप-मुख्यमंत्री अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस (दाएं)

भाजपा के नेता इस सहानुभूति के दावे को खारिज करते हैं. फडणवीस ने इंडिया टुडे से कहा कि यह पवार ही थे जिनकी "पार्टियों में तोड़फोड़ करने में महारत" रही है. "पवार ने कांग्रेस, शिवसेना और अन्य पार्टियों में कई बार विभाजन करवाया. कम से कम उन्हें तो शिकायत नहीं करनी चाहिए." फडणवीस ने कहा, "दोनों दलों (शिवसेना और एनसीपी) को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए...क्यों उनके लोग छोड़कर चले गए. ऐसे कई उदाहरण हैं जब विपक्ष के लोग सत्तारूढ़ पार्टी में चले गए, लेकिन यह पहला उदाहरण है जिसमें सत्तारूढ़ दल पाला बदलकर विपक्ष के साथ चला आया. आखिरकार इन दोनों दलों में लोगों को घुटन महसूस हो रही थी और उन्हें लग रहा था कि उनका भविष्य जोखिम में है."

भाजपा के एक पूर्व मंत्री ने स्वीकार किया कि ठाकरे और पवार के मूल, सहायक और फ्लोटिंग मतदाताओं के बीच दोनों के पक्ष में भावनात्मक रुझान है, तो भाजपा ने मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के बीच अपना मुख्य समर्थन बरकरार रखा है, और उसे लाभार्थी वोट हासिल करने की भी उम्मीद है. उनका दावा है, "मतदाता का व्यवहार हर चुनाव में अलग-अलग होता है. हमें उम्मीद है कि कुछ मराठी मतदाता लोकसभा में मोदी को वोट देंगे और विधानसभा चुनाव में वे ठाकरे के पास लौट आएंगे." शिंदे की शिवसेना के एक नेता ने भी यही भरोसा जताते हुए कहा, "मोदी बनाम एमवीए उम्मीदवार" का नैरेटिव महायुति के पक्ष में काम कर सकता है.

अंदरखाने बदलाव?

साल 2014 और 2019 के चुनाव के विपरीत इस बार मोटे तौर पर कोई मोदी लहर नजर नहीं आती और इसके बजाए टीना (कोई विकल्प नहीं) फैक्टर ने ले ली है जो यह बताता है कि कैसे विपक्ष का इंडिया ब्लॉक एकजुट नहीं है और उसमें मोदी के कद की टक्कर वाला कोई नेता नहीं है. भाजपा के पूर्व मंत्री कहते हैं, "एक तरह से हमारे पक्ष में लहर तो नहीं है लेकिन हमें उम्मीद है कि टीना फैक्टर काम करेगा." वहीं, मुंबई के एक भाजपा नेता कहते हैं, "खिचड़ी सरकार से नीतिगत पंगुता आ सकती है, इसलिए शिक्षित और खामोश बैठे मतदाता स्थिर सरकार के लिए हमारे साथ आएंगे."

फडणवीस इस तर्क से सहमति जताते हैं. उनका कहना है, "लंबे समय बाद कोई ऐसी सरकार है जिसके पक्ष में स्पष्ट सत्ता-समर्थक रुझान है. लोग मोदी के लिए वोट देना चाहते हैं...समाज से सभी वर्गों के लोगों की जिंदगी को उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित किया है...मुझे नहीं लगता कि कोई अन्य प्रधानमंत्री ऐसा कभी कर सका है."

हालांकि, सेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत इस तर्क को खारिज करते हैं कि टीना फैक्टर महायुति के पक्ष में काम कर सकता है. वे कहते हैं, "वे इसका फैसला कैसे कर सकते हैं? अगर (भाजपा का) कोई विकल्प नहीं है, उन्होंने पार्टियों में विभाजन क्यों कराया, दलबदल क्यों कराया, एजेंसियों का दुरुपयोग क्यों किया? उनको अपनी आसन्न हार का डर है. वे हर सीट पर जोड़तोड़ सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं और सिर्फ नांदेड़ जीतने के लिए उन्होंने अशोक चव्हाण को भाजपा में शामिल किया और उन्हें राज्यसभा टिकट दिया." उन्होंने कहा, "राम मंदिर मुख्य मुद्दा नहीं है. महंगाई, बेरोजगारी और किसान आत्महत्या (है)."

वहीं, मुंबई के एक अन्य भाजपा नेता चिंता जताते हैं कि विपक्षी दलों को तोड़ने के लिए केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल का प्रचार और यह कि भाजपा दल-बदल करने वाले दागी नेताओं को बेदाग करने वाली वॉशिंग मशीन है, का भी असर है. मगर, फडणवीस ने शिवसेना और एनसीपी में विभाजन के लिए केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल के आरोप को खारिज किया.

वे कहते हैं, "एकनाथ शिंदे के खिलाफ कोई जांच नहीं हो रही थी. उनके खिलाफ ईडी के पास एक भी शिकायत नहीं थी. उन्होंने (शिवसेना से विद्रोह) खुद किया." मुंबई के भाजपा नेता भी मानते हैं कि इस धारणा से भी उनकी संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा, "जब तक कोई अखिल भारतीय पार्टी भाजपा को चुनौती देने लायक नहीं दिखती, हमें कोई डर नहीं है. ऐसी अखिल भारतीय पार्टी सिर्फ कांग्रेस है और वह पस्त है."

एनसीपी के एक सूत्र की अलग फिक्र है. उनका कहना है कि सत्ता विरोधी रुझान, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां साफ दिखते हैं, मगर वहां मतदाताओं के बीच 'उत्साह' गायब है. वे स्वीकार करते हैं, "लोगों में राजनीति और राजनेताओं के खिलाफ नफरत पैदा हो गई है." उस सूत्र को लगता है कि कई सीटों पर स्थानीय कारक अहम बन गए हैं. वे स्पष्ट करते हैं, "जिन चुनाव क्षेत्रों में विपक्ष का मजबूत उम्मीदवार मैदान में है, वहां एमवीए की जीत के अच्छे आसार हैं."

शिवसेना (यूबीटी) के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि कैसे भाजपा ने कुछ इलाकों में बढ़त के लिए कांग्रेस और एनसीपी के स्थानीय क्षत्रपों के दलबदल के लिए धन का इस्तेमाल किया और उसके वफादार इन सब के दौरान नजरअंदाज किए जाने से नाराज हैं. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि कई आंतरिक मतभेदों के बावजूद बहुसंख्यकवाद की बढ़ती भावना के कारण भाजपा को लाभ होगा.

यह भावना उसके मुख्य आधार और राम मंदिर निर्माण तथा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार की कार्रवाई से मजबूत हुई है. वे कहते हैं, "2025 में आरएसएस अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है, इसलिए हमारे कार्यकर्ता यह सुनिश्चित करने के लिए काम करेंगे कि उस समय भाजपा की ही सरकार हो." पूर्व विधायक और शिंदे की शिवसेना के प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े कहते हैं कि महायुति गठबंधन 45 सीट जीतेगा और देश में 400 से अधिक सीट हासिल करने के मोदी के लक्ष्य में मदद करेगा.

जाति और सामाजिक खेमे

1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के पूर्वार्ध में सांप्रदायिक रूप से तनावग्रस्त महाराष्ट्र में शिवसेना को राजनैतिक हिंदुत्व के अकेले झंडाबरदार के रूप में देखा जाता था. यही वह काल था जब शिवसेना मुंबई और आसपास के इलाकों के मराठी भाषियों के प्रतिनिधि संगठन से बदल कर हिंदुत्व समर्थक पार्टी बन गई. पार्टी सुप्रीमो बाल ठाकरे ने भी अपने आप को 'हिंदू हृदय सम्राट' के रूप में बदल लिया.

हालांकि मुसलमानों, जो राज्य की आबादी का करीब 14 फीसद हैं और जिनका बड़ा हिस्सा शहरी इलाकों में है, के नेता कहते हैं कि अतीत की परंपरा तोड़कर 'अल्पसंख्यकों का बहुमत' भाजपा को हराने के लिए, जहां शिवसेना मैदान में है, वहां शिवसेना (यूबीटी) को वोट देगा. इसका कारण ठाकरे की सॉक्रट इमेज, पार्टी को "धर्मनिरपेक्ष बनाने" की कोशिशें और बुल्लीबाई ऐप के डेवलपरों, जिसने मुस्लिम महिलाओं की मॉक ऑनलाइन नीलामी लॉन्च की, पर कार्रवाई और यह धारणा भी है कि शिवसेना भाजपा को हराने में सबसे अच्छी स्थिति में है.

एमवीए के एक घटक के नेता कहते हैं, "मुस्लिम वोट भाजपा के खिलाफ है और इसलिए मुसलमान एमवीए के किसी भी घटक का समर्थन करेंगे." वे कहते हैं कि शिवसेना (यूबीटी), जो मुंबई और ग्रेटर मुंबई क्षेत्र में ज्यादा सीटों पर लड़ रही है, के लिए मराठी-मुस्लिम गठजोड़ अच्छा साबित हो सकता है क्योंकि दोनों समुदाय शहर के मतदाताओं के 50 फीसद से अधिक वोट होते हैं. वे समझाते हैं, "इस बार इसके बहुत कम आसार हैं कि छोटी पार्टियां मुस्लिम वोटों में बंटवारा कर पाएंगी. हालांकि एमवीए ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है लेकिन समुदाय भाजपा को हराने के लिए एक ही एजेंडे पर काम करेगा."

ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसी ऑर्गेनाइजेशन के शब्बीर अंसारी कहते हैं कि महायुति से मुकाबले में एमवीए को थोड़ी बढ़त हासिल है, मगर सत्तारूढ़ दल के घटकों, खासतौर पर भाजपा, के पास खर्च करने के लिए ज्यादा संसाधन हैं. वे कहते हैं, "मुसलमान नाराज हैं...अपने साथ की जा रही नाइंसाफी से. वे भाजपा को छोड़कर किसी को भी वोट देने के इच्छुक हैं." ओबीसी आंदोलन के दिग्गज नेता अंसारी कहते हैं कि कुछ इलाकों में मराठा बनाम पिछड़ी जातियों का विभाजन सरकार विरोधी भावनाओं के कारण खत्म हो गया है.

एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि लहर के अभाव या मतदाताओं के बड़े पैमाने पर एकजुट न होने से हालात सीट दर सीट निर्भर करेंगे. मराठों को ओबीसी कोटे में शामिल करने के लिए मनोज जरांगे पाटील के आंदोलन से पिछड़ों में भी हलचल है जो मराठा उम्मीदवारों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं, खासतौर से मराठवाड़ा में परभणी जैसी सीटों पर. वे मानते हैं कि विभाजन और दलबदल के खिलाफ नाराजगी भी साफ दिखती है.

सभी राजनैतिक दलों के नेताओं का कहना है कि मतदाताओं के वंचित तबकों को डर है कि अगर भाजपा सत्ता में लौटी तो दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों का आरक्षण हटाया जा सकता है. भाजपा नेताओं की टिप्पणियों ने चिनगारी भड़का दी है और कांग्रेस नेताओं ने इस मुद्दे को पकड़ लिया. उस महाराष्ट्र में जो दलित एकजुटता और ब्राह्मïण विरोधी आंदोलनों के लिए जाना जाता है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जिन्होंने अकोला में रैली को संबोधित किया, समेत भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इन आश्वासनों के साथ इस नुक्सान की भरपाई की कोशिश की कि वे न संविधान में संशोधन करेंगे और न ही आरक्षण हटाएंगे. 

असली मुद्दे

कार्यकर्ताओं और राजनेताओं को शिकायत है कि भावनात्मक एजेंडे के इर्द-गिर्द बढ़ते ध्रुवीकरण से चुनाव में असली मुद्दे हवा हो गए हैं. शेतकरी संगठन के किसान नेता विजय जावंधिया स्पष्ट करते हैं, "असली मुद्दे किसानों, कृषि मजदूरों और बेरोजगारी से जुड़े हैं. विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में बहुत कम औद्योगिक विकास है, इसलिए कृषि के सिवा कोई विकल्प नहीं है."

वे कहते हैं कि कृषि बाजार में उतार-चढ़ाव का ही नतीजा है कि दो साल पहले कपास के जो भाव 12,000 प्रति क्विंटल थे, वे अब महज 7,000 रुपए हैं. वे कहते हैं, "सोयाबीन और मक्का की कीमतें बहुत कम हैं, प्याज के निर्यात पर उस समय प्रतिबंध लगा दिया गया जब उसकी अच्छी कीमत मिलने लगी थी. पंजाब और उत्तर भारत के किसानों के विपरीत विदर्भ के किसान आंदोलन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास इतने संसाधन नहीं हैं जिसकी वजह उनकी सीमांत जोत, वर्षा सिंचित और एक ही फसल वाली भूमि होना है." 

श्रमजीवी संगठन का नेतृत्व करने वाले पूर्व विधायक और कार्यकर्ता विवेक पंडित कहते हैं कि घरों में पीने के पानी के कनेक्शन मुहैया कराने वाली जल जीवन मिशन सरीखी अच्छे इरादे वाली योजनाएं ठेकेदारों और अधिकारियों की आपस में मिलीभगत की वजह से क्रियान्वयन के स्तर पर दम तोड़ गईं. उनका कहना है, "भाजपा ने इस पर अमल सुनिश्चित नहीं किया और इसकी खामियों के बारे में विपक्ष ने भी कुछ नहीं कहा. ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल की हालत दयनीय है और शिक्षा से जुड़े मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं."

पश्चिम महाराष्ट्र के एक गांव के सरपंच भी इसी तरह की बात कहते हैं, "कृषि उत्पादों को लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है, पेयजल का संकट बढ़ता जा रहा है, रसोई गैस और आवश्यक चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं जबकि ग्रामीण मजदूरी जहां की तहां है." लेकिन, वे कहते हैं कि ये मुद्दे लोकप्रिय राजनैतिक बहसों से गायब हैं. 

मतदाताओं के मिजाज को बताते हुए पत्रकार और विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, "आपको मोदी लहर महसूस नहीं होगी. इसके विपरीत भाजपा के खिलाफ अंदर ही अंदर एक लहर है." हालांकि पश्चिमी महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ राजनेता इसका पटाक्षेप करते हुए कहते हैं, "राजनीति में खामोश मतदाता ही चमत्कार करते हैं. हम इम्तिहान के लिए पढ़ते हैं, मगर मतदाता ही प्रश्नपत्र बनाते हैं और वही उत्तर कॉपी भी जांचते हैं."

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