सुर्खियां जनादेश 2024 : असम
असम के नगांव जिले के एक छोटे-से ग्रामीण ब्लॉक जुरिया-रुपाही में अप्रैल की यह एक गरम दोपहर है. गांव के युवा और बूढ़ों से लेकर पुरुष और महिलाएं सभी रैली स्थल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, जहां मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा उन्हें संबोधित करने वाले हैं. अति उत्साही लोगों ने मुख्यमंत्री के हेलिकॉप्टर को उतरते ही उसे चारों ओर से घेर लिया. अनुमानित 95 फीसद मुस्लिम आबादी वाली यह जगह चुनावी तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के किसी नेता के लिए 'शत्रु इलाका' मानी जा सकती है.
लेकिन सरमा के लिए नहीं. वे हेलिकॉप्टर से उतरते हैं, वहां जुटे करीब 10,000 लोगों की ओर दौड़ते हैं और बैरिकेड कूदकर उन तक पहुंचते हैं जिससे भीड़ में हलचल मच जाती है. लोग सरमा को गले लगाते हैं, उन्हें छूते हैं और उनसे हाथ मिलाते हैं तथा इस सबमें उनकी बाहों पर कई खरोंच पड़ जाती हैं.
बैकग्राउंड में पार्टी का प्रचार गीत 'एकोउ एबार मोदी सरकार' (एक बार फिर मोदी सरकार) जोर से बज रहा है. सरमा स्टेज पर आते हैं जहां नरेंद्र मोदी के दो विशाल कट-आउट लगे हैं और वे एक रॉकस्टार की तरह गाना और नृत्य करना शुरू कर देते हैं. भीड़ खुशी से झूम उठी तथा उसमें शामिल हो गई और कार्यक्रम स्थल 'भारत माता की जय' और 'मोदी जिंदाबाद' के नारों से गूंज उठा.
असम में कथित मुस्लिम प्रवासियों के खिलाफ अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाने वाले इस शख्स के लिए यह अविश्वसनीय बदलाव है. कुछ समय पहले ही सरमा ने बंगाली मुस्लिम प्रवासियों के वंशजों के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि उन्हें 'मियां' वोट नहीं चाहिए. अब उसी तबके को लुभाने की कोशिश उनकी रणनीति में बदलाव का संकेत देती है. यह राज्य में भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सीट संख्या को ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले जाने और पार्टी में अपना दबदबा बढ़ाने की उनकी बेचैनी को दिखाता है.
साल 2019 में भाजपा ने असम की 14 लोकसभा सीटों में से नौ पर जीत दर्ज की थी जो 2014 में हासिल सात सीटों से अधिक थी. वहीं उसके सहयोगी कोई सीट नहीं जीत सके थे. इस बार भाजपा 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि सहयोगी असम गण परिषद (एजीपी) को लड़ने के लिए दो सीटें और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) को एक सीट मिली है. और, सरमा अपनी पार्टी के लिए सभी 11 सीटों पर जीत से कम पर थमने को तैयार नहीं हैं.
पिछले साल की परिसीमन की प्रक्रिया के बाद यह पहला चुनाव है. उस परिसीमन के बाद कई निर्वाचन क्षेत्रों में जनसांख्यिकी बदल गई है और इससे सरमा को मदद मिलने की संभावना है. मसलन, कलियाबोर निर्वाचन क्षेत्र को खत्म कर दिया गया है और नए बने काजीरंगा की भौगोलिक सीमाएं अलग कर दी गई हैं, जिससे मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव काफी कम हो गया है.
यही वजह है कि कलियाबोर से सांसद गौरव गोगोई पड़ोसी मुस्लिम बहुल नगांव सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जहां उनकी पार्टी संभावनाएं तलाश रही है. मगर उन्हें जोरहाट से संतोष करना पड़ा. जोरहाट निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व पहले उनके पिता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कर चुके हैं. इसी तरह, कांग्रेस के गढ़ बारपेटा की सीमाओं के साथ भी इसी तरह के नतीजों के साथ बदलाव किए गए हैं जिससे एनडीए को बढ़त मिल गई है.
यहां एजीपी का मुकाबला कांग्रेस से है, जिसने 2019 में भाजपा के 35 फीसद के मुकाबले 44 फीसद वोट हासिल किए थे. सरमा मंत्रिमंडल में एक मंत्री और एजीपी नेता स्वीकार करते हैं, "परिसीमन की वजह से मुस्लिम वोटों में कमी और फिर हिंदू वोटों के एकजुट होने से हमारी जीत की राह प्रशस्त हो जाएगी."
मगर सबसे अहम बात यह है कि 2021 में सर्बानंद सोनोवाल की जगह मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला बड़ा चुनाव है. सोनोवाल ने 2014 और 2019 में भाजपा के अभियान का नेतृत्व किया था. साल 2014 में सरमा कांग्रेस में थे. मगर 2019 में उनके प्रबंधन कौशल तथा लोकप्रियता ने भगवा झोली में दो और सीटें जोड़ने में अहम भूमिका अदा की थी.
अगर सरमा यह साबित करना चाहते हैं कि सोनोवाल, जो अब केंद्रीय मंत्री हैं, राज्य की राजनीति में कोई खिलाड़ी नहीं हैं, तो उन्हें भाजपा की सीटों में सुधार करना होगा. इसका अर्थ यह है कि सोनोवाल की अगुआई में पार्टी की जीती गई किसी एक भी सीट पर हार का सामना न करना पड़े.
यही वजह है कि सरमा कहीं अधिक जोर लगा रहे हैं. मसलन, उन्होंने अधिकतम समय जोरहाट में प्रचार में बिताया, जहां पहले चरण में चुनाव हुए और वहां गौरव गोगोई की उम्मीदवारी ने मौजूदा भाजपा सांसद तपन गोगोई के लिए मुकाबला कठिन बना दिया है. गौरव गोगोई ने संसद में अपने आक्रामक भाषणों के जरिए प्रशंसकों का एक मजबूत वर्ग बना लिया है. सरमा ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वे अगला विधानसभा चुनाव जोरहाट से लड़ेंगे जो उनका जन्मस्थान भी है.
उन्होंने भरोसा जताया कि भाजपा इस लोकसभा सीट पर 'एक से दो लाख वोटों के अंतर' से जीत दर्ज करेगी. इस बीच, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कोकराझार सीट से दो बार के निर्दलीय सांसद नाबा सरानिया का नामांकन खारिज होने से एनडीए के लिए एक और अवसर खुल गया है. इस बोडो बहुल निर्वाचन क्षेत्र में अब भाजपा सहयोगी यूपीपीएल और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के बीच सीधा मुकाबला होगा.
इन संभावनाओं से इतर भाजपा सीएम के रूप में सरमा के प्रदर्शन पर निर्भर है. रैलियों में मुख्यमंत्री पूछते हैं कि क्या उन्होंने (सरमा ने) उन लोगों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया है, तो लोग जोरदार तरीके के हामी भरते हैं. लोगों के बीच वे 'मामा' के रूप में लोकप्रिय हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने नौकरियां और सड़कें उपलब्ध कराई हैं तथा जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाई है.
धार्मिक बयानबाजी से दूरी बरतते हुए, सरमा भाजपा के आधार का विस्तार करने के लिए विकास और सामाजिक उत्थान के वादे के साथ लोगों के बीच पहुंच रहे हैं.
सरमा कहते हैं, "पिछले तीन साल में, अधिकतर गरीब मुसलमानों को उन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिला जिसे पहले बिचौलिए हड़प लेते थे." सरमा के भरोसेमंद सिपहसलारों का अनुमान है कि 20 फीसद मुस्लिम मतदाता इस बार भाजपा का समर्थन करेंगे.

