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क्या आरक्षित लोकसभा सीटों पर टूट पाएगा भगवा खेमे का वर्चस्व?

आरक्षित लोकसभा सीटों पर पिछले दो चुनाव में एकतरफा प्रदर्शन करने वाली भाजपा की राह कठिन करने के लिए सपा ने बिछाईं गोटियां

डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
अपडेटेड 16 मई , 2024

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के चुनाव से चार दिन पहले 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर सभी राजनैतिक दलों ने दलित मतदाताओं को संदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. भाजपा ने इस दिन को यूपी के सभी 1.62 लाख बूथ पर सामाजिक समरसता दिवस के रूप में मनाया. पार्टी की ओर से प्रत्येक बूथ, मंडल, जिला व प्रदेश स्तर पर बाबा साहेब को पुष्पांजलि अर्पित की गई.

दलित बस्तियों में समरसता भोज का भी आयोजन हुआ. लखनऊ के गौतमपल्ली स्थित प्रदेश कार्यालय में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने आंबेडकर को पुष्पांजलि अर्पित कर संविधान बचाने का संकल्प किया. वहीं बहुजन समाज पार्टी ने भी आंबेडकर की प्रतिमा पर फूल चढ़ाकर बुद्ध पूजा का आयोजन किया. इस तरह लोकसभा चुनाव के बीच दलित वोटों को लुभाने का हरसंभव प्रयास किया गया. 

चुनाव की घोषणा से ठीक पहले भाजपा ने आगरा के कोठी मीना बाजार मैदान में दलित महासम्मेलन करके सुरक्षित सीटों पर अपने दबदबे को कायम रखने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिया था. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में आयोजित इस सम्मेलन के कार्यक्रम स्थल पर भाजपा राज में दलित महापुरुषों के सम्मान में किए कार्यों को बताती एक प्रदर्शनी भी लगाई गई. इस महासम्मेलन के पहले माहौल बनाने के लिए 5 मार्च को आगरा और आसपास के जिलों में दलित बस्तियों में आमंत्रण यात्रा निकाली गई.

आगरा कॉलेज में प्रोफेसर लवकुश मिश्र बताते हैं, "आगरा में यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां पर जाटव-दलित आबादी बड़ी संख्या में है जो बसपा का कोर वोट बैंक है. इसीलिए आगरा को यूपी की 'दलित राजधानी' भी कहा जाता है. यहां से निकला संदेश प्रदेश के दूसरे इलाकों में फैले जाटव-दलितों तक आसानी से पहुंच जाता है." अनुसूचित महासम्मेलन के जरिए भाजपा ने न केवल प्रदेश के दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने बल्कि आरक्षित लोकसभा सीटों पर पिछले 10 वर्ष से कायम दबदबे को जारी रखने की कोशिश की. 

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित ये 17 सीटें हैं: आगरा, बहराइच, बांसगांव, बाराबंकी, बुलंदशहर, इटावा, हरदोई, हाथरस, जालौन, कौशांबी, लालगंज, मछलीशहर, मिसरिख, मोहनलालगंज, नगीना, रॉबर्ट्सगंज और शाहजहांपुर. इनमें लालगंज और नगीना (दोनों पर बसपा जीती) को छोड़कर, शेष सीटें पांच साल पहले भाजपा की झोली में चली गई थीं. अनुसूचित जाति या दलित वोट, जो यूपी में मतदाताओं का लगभग 21% है, इनमें मोटे तौर पर जाटव (11.7%), पासी (3.3%), वाल्मीकि (3.15%), गोंड, धानुक, खटीक (1.2%) और अन्य (1.6%) में विभाजित है.

लवकुश मिश्र बताते हैं, "2022 के विधानसभा चुनाव में यह स्पष्ट हो गया कि दलितों के बीच बसपा की पकड़ कुछ कमजोर हुई है. बसपा से छिटकने वाले दलित मतों में भाजपा और सपा ने सेंधमारी की है."

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सियासी गलबहियां करने वाली सपा पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यक (पीडीए) फॉर्मूले के जरिए भाजपा को आरक्षित सीटों पर भी चुनौती दे रही है. समाजवादी बाबा साहब आंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मिठाई लाल भारती के नेतृत्व में पार्टी ने सपा के बारे में दलितों के बीच फैले भ्रम को दूर करने के लिए गोष्ठियों व छोटी सभाओं का सहारा लिया.

आरक्षित सीटों पर सभी उम्मीदवार दलित हैं, इसलिए यहां गैर-दलित मतदाता निर्णायक कारक हैं. इसलिए आरक्षित सीटों पर सपा के फ्रंटल संगठनों ने भी पिछड़ा और मुस्लिम मतदाताओं के बीच संपर्क अभियान चलाकर पार्टी के लिए जिताऊ जनाधार तैयार करने की हर संभव कोशिश की है. दलित समाज को सकारात्मक संदेश देने के लिए फैजाबाद और मेरठ लोकसभा सामान्य सीट पर सपा ने दलित नेताओं को उम्मीदवार बनाया है. पिछले दो लोकसभा चुनावों से सपा एक भी आरक्षित सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सकी है. इस बार अगर सपा आरक्षित सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करती है तो इसकी कीमत भाजपा को ही चुकानी पड़ेगी.

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