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राजगढ़ के चुनावी मैदान में 'हिंदुत्व' की वजह से बढ़ीं दिग्विजय सिंह की मुश्किलें

पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह 33 वर्ष बाद एक बार फिर बतौर कांग्रेस उम्मीदवार अपनी पुरानी सीट राजगढ़ से चुनाव मैदान में उतरे

दिग्विजय सिंह 5 अप्रैल को राजगढ़ लोकसभा सीट के ब्यावरा विधानसभा क्षेत्र में पदयात्रा के दौरान
दिग्विजय सिंह 5 अप्रैल को राजगढ़ लोकसभा सीट के ब्यावरा विधानसभा क्षेत्र में पदयात्रा के दौरान
अपडेटेड 17 मई , 2024

उत्तर-मध्य मध्य प्रदेश में राजस्थान सीमा से सटे जिले राजगढ़ में तापमान 40 डिग्री पर है. नरसिंहगढ़ उपमंडल के सोनकच्छ गांव में रंग-बिरंगी टोपी पहने पुरुषों का समूह नीम के पेड़ के नीचे जुटा है और ऐसा लग रहा है कि वे किसी गंभीर राजनीतिक चर्चा में लीन है. असल में वे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगमन का इंतजार कर रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस ने 33 साल बाद राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है.

समूह में चर्चा उफान पर होती है, तभी दिग्गी राजा चौपाल में पहुंचते हैं और वहां जुटी भीड़ को संबोधित करने से पहले स्थानीय देवता का आशीर्वाद लेने के लिए सीधे गांव के मंदिर जाते हैं. दिग्विजय सिंह पहली बार 1984 में राजगढ़ सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे और जीत भी हासिल की थी. लेकिन 1989 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

फिर 1991 में जनसंघ-भाजपा के विचारक प्यारेलाल खंडेलवाल के खिलाफ नजदीकी मुकाबले में उन्होंने फिर इस सीट पर कब्जा जमाया. दो साल बाद मुख्यमंत्री की भूमिका में आए तो उसके बाद भी जिले के मामलों और लोकसभा सीट की दशा-दिशा में नजर बनाए रहे. लेकिन 33 वर्षों में निर्वाचन क्षेत्र में बहुत कुछ बदल गया है, जिसमें रोजगार की बढ़ती मांग और जातिगत विभाजन जैसी उभरती चुनौतियां शामिल हैं.

फिर दिग्विजय का मुकाबला दो बार के भाजपा सांसद रोडमल नागर से है, जो पिछली बार 4,31,000 वोटों के अंतर से जीते थे. चुनौतियों को देखते हुए खुद दिग्विजय भी इसे अपना अंतिम मुकाबला मान रहे हैं और नई रणनीति के साथ किस्मत आजमा रहे हैं. मोदी प्रभाव के मुकाबले के लिए अपने प्रचार अभियान को जमीनी स्तर केंद्रित करते हुए वे पंचायत-शैली अपना रहे हैं.

सोनकच्छ में मतदाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "हमारे देश में लोकतंत्र की संसदीय शैली है, जिसमें आप उस व्यक्ति को चुनते हैं जो दिल्ली स्थित संसद में आपका प्रतिनिधित्व करता है. मैं एक वकील की तरह आपको अपनी सेवाएं दूंगा जो दिल्ली में आपके मामलों को उठाएगा. अगर आपको लगता है कि मौजूदा सांसद ने अच्छा काम किया है, तो उन्हें दोबारा चुनें. लेकिन आपको यदि भरोसा है कि मैं आपकी बेहतर सेवा कर सकता हूं, तो 7 मई को मुझे वोट देकर मेरे वकालतनामे पर हस्ताक्षर कीजिए."

उन्होंने आगे कहा, "भाजपा आप सबसे अपील कर रही है कि स्थानीय उम्मीदवार को न देखें, बल्कि पार्टी और मोदी को वोट दें. ऐसा है तो मोदी को राजगढ़ से चुनाव लड़ना चाहिए था. यदि आपको कोई समस्या हो तो कल आप किससे संपर्क करेंगे?"

उन्होंने मूल्यवृद्धि, कारोबारियों के ऋण माफ करने और मध्य प्रदेश में किसानों का ऋण माफ न किए जाने जैसे मुद्दों पर भी बात की, जो यहां के कृषक मतदाताओं को काफी लुभा भी रहे हैं.

मध्य प्रदेश भाजपा प्रवक्ता आशीष अग्रवाल कहते हैं, "राजगढ़ राष्ट्रवादी विचार का गढ़ है. यहां के मतदाता सनातन धर्म का अपमान करने वाले दिग्विजय सिंह जैसे किसी व्यक्ति को कभी जीतने नहीं देंगे. राजगढ़ का चुनाव दिग्विजय के राजनीतिक करियर का अंत साबित होगा."

कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि अगर उसे मुकाबले में बना रहना है तो चुनावी लड़ाई को दिग्विजय बनाम नागर बनाना होगा, और ऐसा नहीं होने पर राजगढ़ सीट पर भाजपा की हैट्रिक पक्की है. कुछ मोर्चों पर कांग्रेस भी मजबूत है. दिग्विजय ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जब राजगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफा दिया तो यहां की कमान उनके भाई लक्ष्मण सिंह ने संभाली और 1994 में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी यहां से जीत हासिल की.

2004 के चुनाव से ऐन पहले भाजपा में शामिल होने और फिर जीत हासिल से पहले लक्ष्मण सिंह चार बार राजगढ़ से कांग्रेस के सांसद रहे हैं. हालांकि, 2009 में वह कांग्रेस के नारायण सिंह आमलाबे से हार गए थे. वर्तमान में, लोकसभा क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से छह पर भाजपा का कब्जा है और शेष दो कांग्रेस के पास हैं. 

राजगढ़ में हिंदुत्व का प्रभाव कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है. मुस्लिम आबादी यहां पर अपेक्षाकृत कम ही है लेकिन नरसिंहगढ़, तलेन और राजगढ़ शहर में सांप्रदायिक तनाव ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन बढ़ा दिया है.

सोनकच्छ के सतीश डांगी कहते हैं, "मुसलमान हर बात पर प्रतिक्रिया देते रहे हैं लेकिन जब से राज्य और केंद्र में भाजपा सत्ता में है, तब से वे शांत हैं." अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान गांव में पूरी जोरदारी से इसके समर्थन में नारे गूंजे और लगभग हर घर पर भगवा फहराता नजर आता है. फिर, मतदाताओं के जेहन में कुछ पुरानी यादें भी ताजा हैं.

जैसा, सतीश कहते हैं, "2003 में दिग्विजय सरकार ने साझा चरनोई भूमि दलितों और अनुसूचित जनजातियों को बांट दी. इसके बाद, लाभार्थियों ने अपना कब्जा दूसरों को बेच दिया, जिससे ग्रामीणों के पास मवेशियों के लिए जगह नहीं बची."

माना जाता है कि दलितों को लाभ पहुंचाने के लिए उठाया गया यह विवादास्पद निर्णय दलितों और ओबीसी के बीच दरार का कारण बना. इसके बाद ओबीसी खुलकर भाजपा के समर्थन में आ गए और यही वजह है कि 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सरकार को हार का सामना करना पड़ा.

निवर्तमान सांसद नागर की निष्क्रियता को लेकर मतदाताओं में खासी नाराजगी है. लेकिन उन्हें पूरी उम्मीद है कि मोदी का नाम और काम उनकी जीत की राह आसान कर देगा. मालावार गांव के दुकानदार श्याम जुलानिया कहते हैं, "नागर ने पिछले एक दशक में गांव के लिए कुछ नहीं किया."

दिग्विजय कहते हैं, "निर्वाचन क्षेत्र में 2,236 मतदान केंद्र हैं. अगर आप कड़ी मेहनत से अपने बूथ पर जीत सुनिश्चित कर सकते हैं, तो हम जीतेंगे." दिग्गी राजा हर दिन 12 घंटे में दो दर्जन गांवों को कवर करते हैं. हर गांव में वे चौपाल स्तर की जनसभा को संबोधित करते हैं. उन्होंने अभियान की शुरुआत सभी आठ विधानसभा सीटों पर पदयात्रा के साथ की थी. उन्होंने प्रचार को छोटे पैमाने पर रखना ही अपना मंत्र बना रखा है कि कोई बड़ा नेता नहीं, कोई बड़ी जनसभा नहीं.

राजगढ़ के गांवों में जल संकट आम मुद्दा है. यद्यपि कई क्षेत्रों में नल कनेक्शन के साथ टंकियां स्थापित की गई हैं, लेकिन पानी सप्लाई कम है. सोनकच्छ के राधेश्याम डांगी बताते हैं, "यहां भूजल स्तर 500 फीट से भी नीचे है, गर्मी शुरू होते ही ट्यूबवेल सूख जाते हैं. हमें अधिक जल निकायों की आवश्यकता है." जाहिर है, इस समस्या का हल निकालने के सियासी वादों में कोई कमी नहीं रही है.

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