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अधीर रंजन चौधरी : क्या मुश्किल हालात में लगा पाएंगे जीत का 'सिक्सर'?

1999 से प. बंगाल के बहरामपुर से जीत रहे अधीर रंजन चौधरी जहां छठी बार वहां से जीतने की फिराक में हैं वहीं भाजपा और टीएमसी उनके गढ़ में सेंध लगाने का प्रयास कर रही हैं

बहरामपुर में 18 अप्रैल की रैली में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी और सीपीआई (एम) के मोहम्मद सलीम
बहरामपुर में 18 अप्रैल की रैली में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी और सीपीआई (एम) के मोहम्मद सलीम
अपडेटेड 17 मई , 2024

अप्रैल की 18 तारीख को मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में कांग्रेस-सीपीआई (एम) की संयुक्त रैली का दृश्य लोगों को चौंका रहा था. समर्थकों को बहरामपुर के सीपीआई (एम) के चुनाव चिह्न वाला गमछा लपेटे निवर्तमान कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने आश्चर्यचकित कर दिया. चौधरी बंगाल कांग्रेस के प्रमुख हैं और 1999 से बहरामपुर से जीत रहे हैं और छठी बार वहां से चुने जाने की जुगत में लगे हैं.

कांग्रेस और लेफ्ट असामान्य साथी हैं, मगर यह बंगाल में नई सियासी हकीकत है जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया. और, टीएमसी से सीट समझौते का विरोध करने वाले चौधरी ममता के धुर विरोधी हैं. उनके बगल में मुर्शिदाबाद सीट से गठबंधन के उम्मीदवार और सीपीआई (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम खड़े थे. 

हर मॉनसून 'रॉबिनहुड ऑफ बहरामपुर' के फॉलोअर्स राशन, तिरपाल और अन्य राहत सामग्री इकट्ठा करते हैं और उन्हें ट्रक में भरकर बाढ़ प्रभावित इलाकों में भेजा जाता है. साल 2009 में उन्हें मतदान में 56 फीसद से अधिक वोट मिले थे और वह उनकी सबसे बड़ी जीत थी. मगर उसके बाद से बोरदा (बड़े भाई) के लिए काफी कुछ बदल गया है. उस साल वे कांग्रेस और टीएमसी गठबंधन के साझा उम्मीदवार थे. लोकसभा में विपक्ष के निवर्तमान नेता चौधरी 2024 के इस चुनाव में टीएमसी और भाजपा के साथ त्रिकोणीय मुकाबले में हैं. कांग्रेस-वाम मोर्चा गठबंधन ने चौधरी को बहरामपुर से तो मुर्तजा हुसैन को जंगीपुर से मैदान में उतारा है.

चौधरी आत्मविश्वास से लबरेज हैं. वे कहते हैं, "मुर्शिदाबाद में हम सभी तीनों सीटें जीतेंगे." मगर यह खालिस बहादुरी दिखाने वाला बयान है. साल 2012 में टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन के खत्म हो जाने के बाद, टीएमसी ने चौधरी को कमजोर करने पर ध्यान केंद्रित किया और उनके कुछ करीबी सहयोगियों को लुभाने में कामयाब रही. जमीनी हालात उस बदलाव को साफ करते हैं: 2021 में, टीएमसी ने बहरामपुर की सात विधानसभा सीटों में से छह पर कब्जा कर लिया; और एक भाजपा के खाते में चली गई.

इस बार टीएमसी ने पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को बहरामपुर से उम्मीदवार बनाया है. पार्टी को उम्मीद है कि बाहरी सेलिब्रिटी पठान मुस्लिम वोटों को उसके पक्ष में एकजुट करने में सफल होंगे. बहरामपुर में करीब 59 फीसद मुस्लिम आबादी है और उनकी वफादारी लगातार कांग्रेस से टीएमसी की ओर जा रही है. साल 2019 में, वोट शेयर के मामले में टीएमसी उम्मीदवार अपूर्व सरकार की ओर से छीने गए चार विधानसभा क्षेत्रों में से दो में मुस्लिम आबादी 55 फीसद से अधिक है; अन्य दो में यह 70 फीसद से अधिक है. 

भाजपा ने भी बहरामपुर शहर में उल्लेखनीय बढ़त बना ली है. 2021 में उस विधानसभा सीट से उसके उम्मीदवार सुब्रत मैत्रा ने जीत दर्ज की. 2024 में बहरामपुर में भाजपा के उम्मीदवार निर्मल कुमार साहा हैं जो आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले लोकप्रिय सर्जन हैं. साहा कहते हैं, "बहरामपुर जो भी जीते...यह कांटे की टक्कर होगी."

चौधरी सत्ता विरोधी लहर से भी जूझ रहे हैं. बेरोजगारी और पलायन मुर्शिदाबाद के लिए अभिशाप बन गए हैं. यह 2009 के बाद से चौधरी के वोट शेयर में गिरावट से भी स्पष्ट होता है. उनके विरोधी अब खुलकर उनके खिलाफ नाराजगी दिखा रहे हैं. जब चौधरी 17 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस के दौरान शक्तिपुर में सांप्रदायिक झड़प के पीड़ितों से मिलने बहरामपुर मेडिकल कॉलेज गए तो उन्हें भाजपा समर्थकों ने वहां जाने से रोक दिया.

वैसे चौधरी को कुछ बढ़त हासिल हैं. पहली बात यह कि 2023 के पंचायत चुनाव में वाम-कांग्रेस गठबंधन ने बहरामपुर में 36 फीसद वोट हासिल किए जो 2021 के बाद से उनके पाले में वोटरों के फिर से जुटने का संकेत है. दूसरी बात यह कि बंगाली बोलने में असमर्थता की वजह से पठान को मतदाताओं से जुड़ने में दिक्कत आ रही है.

और आखिरकार, चौधरी के पास अब भी 20-25 फीसद का अहम वोट फीसद बरकरार है. कांग्रेस के पूर्व नेता मनोज चक्रवर्ती कहते हैं, "हिंदू-मुस्लिम बोरदा को वोट देंगे...लोकसभा चुनाव में वे उन दोनों की पहली पसंद हैं." चौधरी को जीत हासिल करने के लिए निश्चित रूप से इन सबकी सख्त जरूरत है.

—अर्कमय दत्ता मजूमदार

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