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कितना मुश्किल है 'आप' के लिए इस अग्निपरीक्षा से पार पाना?

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के रूप में अपने शीर्ष नेताओं की गैरमौजूदगी में आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे कार्यकर्ताओं का हौसला बनाए रखा जाए

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जेल जाने से उनके समर्थकों का उत्साह और बढ़ गया है
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जेल जाने से उनके समर्थकों का उत्साह और बढ़ गया है
अपडेटेड 10 मई , 2024

नोट - ये स्टोरी इंडिया टुडे के 8 मई के अंक में प्रकाशित हुई थी. तब अरविंद केजरीवाल जेल में थे.

अप्रैल की 16 तारीख को दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी संकल्प सभाओं की शुरुआत की. ठिकाना था राष्ट्रीय राजधानी के आंबेडकर नगर की जोशी कॉलोनी. पास की ही बस्ती मदनगीर में फोटो कॉपी की दुकान चलाने वाले 37 वर्षीय सुभाष कुमार भी उसमें शामिल होने आए थे. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दिनों से ही वे अरविंद केजरीवाल से जुड़े हैं.

सुभाष के ही शब्दों में, "कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद जब मैंने केजरीवाल को भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते सुना, तभी से उनका प्रशंसक हो गया. आम आदमी पार्टी बनने पर उसके कार्यक्रमों में भी जाने लगा. पूरा समय तो पार्टी को नहीं दे पाया लेकिन रोजी-रोटी चलाते हुए साथ जुड़ा रहा. जिस केजरीवाल ने लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है, उसे भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में डालने से सबको समझ आ रहा है कि यह भाजपा की साजिश है." इसी तरह की बातें सभा में मौजूद और भी कई लोगों ने कही.

तो क्या केजरीवाल और आप के पीछे के कार्यकर्ताओं की फौज अब भी जस की तस बरकरार है? थोड़ा ठहरें. सरकारी सेवा से रिटायर एक बुजुर्ग देर तक इधर-उधर की बात करने के बाद खुलते हैं, ''आप की सभाओं में अब अपेक्षाकृत कम लोग आ रहे हैं. कुछ दिन पहले केजरीवाल की गिरफ्तारी के विरोध में जंतर मंतर पर पार्टी के धरने में कितने कम लोग आए थे. एक दौर था कि जंतर मंतर रोड एक छोर से दूसरे छोर तक पैक रहता था."

ऐसा क्यों? वे जवाब देते हैं, "आप के नेताओं पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों में अंत में भले कोई सचाई न निकले पर बहुत-से कार्यकर्ताओं-समर्थकों के मन में संदेह पैदा हो गया है. यही कि जिनके पीछे वे दिन-रात लगे हुए थे, वे भी औरों जैसे ही निकले!" इस बुजुर्ग का दावा था कि कई लोग व्यक्तिगत उम्मीद में आप से जुड़े थे. ऐसे लोग भी निराशा में साथ छोड़ रहे हैं.

आंबेडकर नगर की इस सभा में और 16 अप्रैल को ही दिल्ली विश्वविद्यालय में हुए विरोध प्रदर्शन में आप कार्यकर्ताओं से बात करने पर एक बात गौर करने लायक मिली. यही कि विरोध-प्रदर्शनों में आने वाले लोगों की संख्या कम हुई है. हालांकि, पार्टी के नेता इससे इनकार करते हैं. उनका तर्क है कि वर्किंग डे और गर्मी की वजह से कभी-कभी किसी कार्यक्रम में लोग थोड़ी कम संख्या में आते हैं और ऐसा हर पार्टी के साथ होता है.

आप के शीर्ष नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया शराब घोटाले से संबंधित मामले में अभी दिल्ली के तिहाड़ जेल में हैं. केजरीवाल और सिसोदिया की जोड़ी पुरानी है. वे दोनों कबीर संस्था बनाकर सूचना का अधिकार को लेकर काम करते थे. इंडिया अगेंस्ट करप्शन में वैसे तो कई और बड़े लोग थे लेकिन व्यावहारिक तौर पर नेतृत्व केजरीवाल-सिसोदिया ही कर रहे थे. हाल तक आप के एक और वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी जेल में थे. केजरीवाल के जेल जाने के बाद उन्हें जमानत मिली है. इसी तरह से पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता और केजरीवाल सरकार में मंत्री रहे सत्येंद्र जैन भी जेल में हैं. 

शराब घोटाले के मामले में अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की योजना आम आदमी पार्टी को ही अभियुक्त बनाने की है. ईडी का दावा है कि शराब घोटाले के पैसे का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी के लिए किया गया, इसलिए उसे पार्टी को अभियुक्त बनाने की छूट मिलनी चाहिए. ईडी का कहना है कि प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग कानून की धारा 70 के तहत कंपनी की जो परिभाषा है, उसके आधार पर आप को एक कंपनी माना जा सकता है और अभियुक्त बनाया जा सकता है.

हालांकि, आप के वकील अभिषेक मनु सिंघवी इस बात को खारिज करते हैं कि किसी राजनैतिक दल को कंपनी मानने का कोई प्रावधान कानून में है. अगर अदालत ईडी को एक पार्टी के तौर पर आप को अभियुक्त बनाने की छूट दे देती है तो आप का सांगठनिक संकट बढ़ जाएगा. केजरीवाल-सिसोदिया की जोड़ी के एक साथ जेल में होने की वजह से आप के लिए न सिर्फ दिल्ली सरकार चलाना एक चुनौती है बल्कि पार्टी के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे लोकसभा चुनाव में भाजपा का मुकाबला करते हुए खुद को मजबूत करना बहुत बड़ी चुनौती है.

दोनों शीर्ष नेताओं की गैरमौजूदगी में उनकी सांगठनिक जिम्मेदारियां कौन निभा रहा है? पार्टी नेता इसका सीधा जवाब देने से बचते हैं. अलग-अलग नेताओं से बातचीत में एक बात समझ में आती है कि पहले तो असमंजस-ऊहापोह था पर अनुभवी नेता संजय सिंह के बाहर आने के बाद हालात काफी हद तक संभले हैं. केजरीवाल-सिसोदिया की अनुपस्थिति में अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में दिल्ली सरकार में मंत्री आतिशी और सौरभ भारद्वाज संजय सिंह के साथ दिखते हैं. केजरीवाल की पत्नी सुनीता भी हैं पर वे हर सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं दिखतीं.

उनकी भूमिका खुद को पीछे रखकर काम करने की ज्यादा है. पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को पार्टी दिल्ली से बाहर अपनी संभावनाएं मजबूत करने को इस्तेमाल कर रही है. मान की सभाएं उन लोकसभा क्षेत्रों में हो रही हैं, जहां आप के उम्मीदवार अच्छे मुकाबले की स्थिति में हैं. राष्ट्रीय संगठन महासचिव संदीप पाठक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वे न सिर्फ दिल्ली में संगठन को एकजुट रखने में जुटे हैं बल्कि प्रदेश के बाहर भी पार्टी के सांगठनिक ढांचे को मजबूत बनाने का काम करते हैं. हाल में वे केजरीवाल से मिलने तिहाड़ जेल गए थे.

पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके शीर्ष नेता केजरीवाल चुनाव प्रचार नहीं कर पाएंगे. ऐसे में कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रख पाना मुश्किल होगा. केजरीवाल को अदालत से राहत न मिली तो फिर चुनाव प्रचार अभियान की रणनीति क्या होगी? पाठक कहते हैं, "हर चीज की स्क्रिप्ट भाजपा कार्यालय में लिखी जा रही है. ऐसे में कोई एजेंडा बनाना मुश्किल है. यह इस पर निर्भर करता है कि भाजपा आगे क्या करती है."

तो क्या पार्टी भाजपा की चालों को देखते हुए अपनी रणनीति बनाएगी? चुनाव के लिए अपनी कोई तैयारी नहीं? आप के दिल्ली प्रदेश संयोजक गोपाल राय बताते हैं, "हमने 'जेल का जवाब वोट से संकल्प सभा' की शुरुआत की है. हर लोकसभा क्षेत्र में हम 40 ऐसी सभाएं करेंगे. इसमें पार्टी के सभी विधायक लगेंगे. सभाओं में हमारे नेता और कार्यकर्ता जेल का जवाब वोट से देने का संकल्प लेंगे." यह अभियान 23 मई तक चलेगा. 16 अप्रैल को इसकी शुरुआत संजय सिंह ने आंबेडकर नगर से और गोपाल राय ने विश्वास नगर से की.

हालांकि, इन सभाओं को लेकर भी एक राजनीति चल रही है. आप इस बार का लोकसभा चुनाव इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ रही है. इसके तहत दिल्ली की चार लोकसभा सीटें आप को और तीन कांग्रेस को मिली हैं. आप इन सभाओं का आयोजन उन्हीं संसदीय क्षेत्रों में कर रही है, जहां उसके उम्मीदवार मैदान में हैं.

जिन संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस चुनाव लड़ रही है, उन इलाकों के आप विधायकों को भी आप की चार सीटों के अलग-अलग क्षेत्रों में सभा करने की जिम्मेदारी दी गई है. मसलन, उत्तर पश्चिमी दिल्ली के किराड़ी से आप विधायक ऋतुराज को दक्षिणी दिल्ली लोकसभा सीट का प्रभारी बनाया गया है. यहां से आप के उम्मीदवार सही राम पहलवान हैं. इस रणनीति से स्पष्ट है कि इन सभाओं के माध्यम से आप अपने संगठन को मजबूत करते हुए अधिक से अधिक वोट बटोरने की कोशिश कर रही है.

पार्टी के एक नेता कहते हैं कि संगठन के लिहाज से देखें तो आप में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों से कार्यकर्ता आए थे. एक ऐसे समय में जब आप नेतृत्व के मामले में संकट की स्थिति में दिख रही है तो भाजपा से आए कार्यकर्ताओं को अपने साथ बरकरार रखना एक चुनौती है. वे कहते हैं कि राम मंदिर से लेकर हिंदुत्व के तमाम मुद्दों पर आप का रुख एक तरफ हिंदू वोटर्स को अपने साथ जोड़े रखने की रणनीति का हिस्सा है तो दूसरी तरफ भाजपा पृष्ठभूमि वाले कार्यकर्ताओं को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी है.

केजरीवाल की गिरफ्तारी से तकरीबन तीन हफ्ते पहले 4 मार्च को जब दिल्ली की वित्त मंत्री आतिशी ने 2024-25 के लिए तकरीबन 76,000 करोड़ रुपए का बजट पेश किया तो पता चला कि इसकी केंद्रीय थीम 'राम राज्य' रखी गई है. आप अब इसे और आगे बढ़ा रही है. 17 अप्रैल यानी ठीक रामनवमी के दिन आप ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए जो कैंपेन वेबसाइट लॉन्च किया उसका नाम 'आप का राम राज्य' रखा. इस वेबसाइट को खोलने पर होम पेज पर ही लिखा आता है—क्या है आपका राम राज्य.

इसके नीचे लिखा है, "दिल्ली विधानसभा में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बताया, क्या है आप की राम राज्य की संकल्पना." यह लिंक एक वीडियो पर ले जाता है जिसमें केजरीवाल राम राज्य के बारे में बताते हैं. इसके अलावा वेबसाइट में यह जानकारी दी गई है कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर केजरीवाल ने बतौर मुख्यमंत्री अपने नौ वर्षों के कार्यकाल में क्या-क्या किया है और विभिन्न विषयों पर पार्टी का क्या विजन है और उसके चुनावी वादे क्या हैं. हालांकि, राम और हनुमान को लेकर आप का यह प्रेम नया नहीं है. बल्कि केजरीवाल कई मौकों पर कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर जाते रहे हैं और उन्होंने पूरी दिल्ली में इसी साल जनवरी में सुंदर कांड और हनुमान चालीसा का भी पाठ कराया था.

क्या दिल्ली में होने वाली तकरीबन 200 संकल्प सभाएं और पार्टी की अन्य गतिविधियां केजरीवाल-सिसोदिया की गैरमौजूदगी में आप को संगठित रख पाएंगी? इसके जवाब में कुछ साल पहले आप से अलग हुए एक नेता बताते हैं, "संजय सिंह का जेल से बाहर आना पार्टी के लिए अच्छा रहा.

उनकी गैरमौजूदगी में अगर सुनीता केजरीवाल को नेता बनाने की कोशिश होती तो दिक्कतें आतीं. आप में ऐसे कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी संख्या है जिनकी ज्यादा दिलचस्पी दिल्ली प्रदेश की राजनीति में है क्योंकि उनके छोटे-मोटे कारोबार हैं. अगर कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद आप लोकसभा चुनाव में दिल्ली में सीटें जीतने या अच्छा वोट लाने में कामयाब नहीं होती है, तब संगठन के स्तर पर ऐसी स्थिति आ सकती है कि पार्टी में भगदड़ देखी जाए."

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