राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले में एक अरसे से चल रहे सियासी ड्रामे में 8 अप्रैल को अचानक नया मोड़ आ गया. भारतीय आदिवासी पार्टी (बाप) के साथ कांग्रेस का गठबंधन यहां बनते-बनते बिगड़ गया.
राजस्थान में नागौर और सीकर सीट पर कांग्रेस ने रालोपा और माकपा के साथ तालमेल किया है, वहीं बांसवाड़ा-डूंगरपुर सीट पर गठबंधन को लेकर पार्टी आखिरी समय तक असंमजस में रही क्योंकि उसके स्थानीय नेता इसके खिलाफ थे.
राजनीतिक विश्लेषक विजय विद्रोही कहते हैं, "कांग्रेस के आदिवासी नेताओं को डर सता रहा था कि बाप के साथ गठबंधन हुआ तो उनका राजनीतिक भविष्य संकट में आ जाएगा. बाप का बढ़ता प्रभाव यहां कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है."
इसी भय के चलते यहां से कांग्रेस विधायक रमिला खड़िया, गणेश घोघरा और पूर्व सांसद ताराचंद भगोरा जैसे आदिवासी नेताओं ने कुछ दिनों पहले कांग्रेस आलाकमान को चिट्ठी लिखकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं.
गठबंधन को लेकर डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों की कांग्रेस इकाई भी दो धड़ों में बंटी नजर आ रही थी. डूंगरपुर कांग्रेस जिलाध्यक्ष वल्लभ पाटीदार शुरू से गठबंधन के विरोध में थे जबकि बांसवाड़ा जिलाध्यक्ष रमेश पंड्या और विधायक अर्जुन सिंह बामनिया इसके पैरोकार थे.
यही वजह थी कि इस सीट पर दूसरे चरण में 26 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए कांग्रेस नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन 4 अप्रैल तक उम्मीदवार का फैसला नहीं कर पाई. अंतिम दिन उसने विधायक अर्जुन बामनिया को इस सीट से प्रत्याशी बनाने का ऐलान किया. बामनिया को पहले से गठबंधन का आभास था. गठबंधन के पक्ष में होने के बावजूद वे खुद को दांव पर नहीं लगाना चाहते थे. उन्होंने पार्टी से चुनाव का खाली सिंबल उनका नाम लिखे बगैर ही भेजने का आग्रह किया.
सिंबल आ जाने पर उन्होंने खुद नामांकन दाखिल न करके पर्चा भरने की अंतिम समय सीमा से महज पंद्रह मिनट पहले अपने भरोसेमंद अरविंद डामोर को सिंबल सौंपकर कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उनका नामांकन दाखिल करवा दिया.
इसी बीच 7 अप्रैल की शाम कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने सोशल मीडिया के जरिए डूंगरपुर-बांसवाड़ा सीट पर बाप के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया. रविवार रात बामनिया ने डामोर से नाम वापस लेने का आग्रह किया. डामोर सकते में आ गए. उन्होंने इसे अपना अपमान माना और मोबाइल स्विच ऑफ कर भूमिगत हो गए. 8 अप्रैल को नामांकन वापसी के अंतिम दिन कांग्रेस उन्हें तलाशती रह गई.
रात 10 बजे सामने आकर उन्होंने कहा, "मुझे बाप से गठबंधन के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस का चुनाव चिह्न देकर चुनाव लड़ने के लिए कहा गया था...लड़ाना ही नहीं था तो मेरा 17 साल का सियासी करियर क्यों दांव पर लगाया? अब मैं कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के तौर पर पूरे दम-खम के साथ चुनाव लडूंगा."
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि कांग्रेस ने जनहित में बाप के साथ गठबंधन का फैसला किया है. हम बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा और बागीदौरा विधानसभा क्षेत्र में बाप उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे. डामोर नामांकन वापस लें या नहीं, कांग्रेस का कोई नेता उनका साथ नहीं देगा. हम निर्वाचन आयोग से उनका नामांकन खारिज करने की मांग करेंगे.
डामोर के डटे रहने के पीछे हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर प्रत्याशी बने महेंद्रजीत सिंह मालवीय और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास माने जाने वाले दिनेश खोड़निया का हाथ बताया जा रहा है.
मालवीय की चिंता का कारण पिछले साल के विधानसभा चुनाव के नतीजों से समझा जा सकता है. उसमें बाप ने डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में 4.81 लाख वोट हासिल किए थे जो भाजपा को मिले 5.30 लाख वोटों से करीब पचास हजार ही कम थे.
कांग्रेस को 5.97 लाख वोट मिले जो भाजपा से 67,000 ज्यादा थे. फिर भी कांग्रेस डूंगरपुर-बांसवाड़ा में बाप के साथ गठबंधन को इसलिए भी तैयार हुई क्योंकि मालवीय को हराना अकेले कांग्रेस के लिए आसान न था.
इस ड्रामे के बाद कांग्रेस ने पार्टी का आदेश न मानने पर डामोर को छह साल के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया. सियासी जानकारों की मानें तो निर्वाचन आयोग में उनके नाम का चुनाव चिह्न जमा होने के कारण डामोर ही डूंगरपुर-बांसवाड़ा से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ेंगे. उधर, बाप पार्टी ने भी ऐलान कर दिया कि अब कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं होगा. बाप राजस्थान में अकेले ही लड़ेगी.
बांसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा क्षेत्र को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है, पर बीते दो लोकसभा चुनावों में यहां उसे शिकस्त ही मिली. 2019 के चुनाव में यहां से भाजपा के कनकमल कटारा ने कांग्रेस के ताराचंद भगोरा को तीन लाख से ज्यादा वोटों से हराया था. 2014 में भाजपा के मानशंकर निनामा के सामने कांग्रेस की रेशम मालवीय 91,000 वोटों से हारी थीं.
रेशम भाजपा उम्मीदवार मालवीय की पत्नी हैं. बांसवाड़ा लोकसभा सीट पर अब तक हुए 17 चुनावों में 12 बार कांग्रेस और तीन बार भाजपा को जीत हासिल हुई है. एक-एक बार यह सीट भारतीय लोकदल और जनता दल के हिस्से में गई.

