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केरल: तितरफा मुकाबले में भाजपा क्या वामपंथ के किले में सेंध लगा पाएगी?

कांग्रेस अपने आखिरी किलों में से एक पर काबिज रहने, वामपंथी फिर से खुद को मजबूत करने और भाजपा सेंध लगाने की कोशिश में. केरल का रुख आखिर किस ओर होगा

वायनाड में एक रोड शो के दौरान बहन प्रियंका के साथ राहुल गांधी
वायनाड में एक रोड शो के दौरान बहन प्रियंका के साथ राहुल गांधी
अपडेटेड 25 अप्रैल , 2024

अमूमन लुटियन्स दिल्ली के दूरबीन से देखने पर केरल एक अबूझ-सा अजीबोगरीब छोटा टापू लग सकता है. मोटे तौर पर यह हर मायने में मुख्य इलाके से दूर दिखता है, अपने अड़ियल राजनैतिक रुझानों में भी. इसकी 20 सीटों का छोटा-सा दायरा कुल लोकसभा का महज 3.7 फीसद है लेकिन वह लोकतंत्र से कुछ ज्यादा ही वाबस्ता है.

यकीनन, अड़ियल तमिलनाडु पड़ोस में न होता तो केरल खुद को रोमन साम्राज्य के खिलाफ डटकर खड़े इकलौते गॉलिश गांव के पूरे रंग-ढंग में रचा-बसा पा सकता था. जमीन के उस एक टुकड़े की तरह, जैसे पौराणिक गाथाओं में वामन ने राजा महाबलि से मांगा था. जो बारीकियों पर गहरी नजर रखते हैं, उन्हें याद होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 के अपने विजय भाषण में जिक्र किया था कि छोटी-सी गैर-मौजूदगी भी खलती है.

उन्होंने साफ-साफ केरल को आखिरी रण-क्षेत्र बताया था. तब से राज्य में नारियल फोड़ने की पार्टी की लालसा और तेज हो गई है. इससे लड़ाई भी पैनी और धारदार हो गई है. 5 अप्रैल को दूरदर्शन ने अचानक विवादास्पद फिल्म द केरल स्टोरी को दिखाया. हंसोड़ खलनायकी और जुगुप्सा जगाने वाली यह लिजलिजी सिनेमाई प्रस्तुति लोगों को लुभाने का एक अजीब तरीका लग सकती है, लेकिन इससे राष्ट्रीय चेतना में राज्य की चुभन वाली मौजूदगी दर्ज हुई. आखिर केरल किसी की नजर में तो है.

राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी राष्ट्रीय जुड़ाव और राजनैतिक दूरी दोनों का एक साथ प्रतिबिंब है. जैसे कहा जाए कि केरल जो कुछ भी है, पर वह उत्तर प्रदेश तो नहीं ही है. इससे बात समझ में आ जाएगी. 2019 में उत्तर के भगवा बाढ़ वाले मैदानों के मुकाबले केरल कांग्रेस के उतार के दौर में भी सुरक्षित पनाहगाह बना रहा.

लेकिन अब पार्टी अपने कायाकल्प के लिए आयुर्वेदिक सुख-चिकित्सा के दूसरे दौर की तलाश में है, तो उसे यहां की हवा थोड़ी सर्द, अबूझ लग रही है और बिजली-सी कड़कती नजर आ रही है. बेशक, इसकी एक वजह भाजपा की तेज चहलकदमी है. हर नुक्कड़-चौराहे पर मोदी के पोस्टर चस्पां हैं, हर लैंप-पोस्ट और दीवार पर कमल झांकता है, भाजपा के नैरेटिव के मुताबिक मीडिया में बहसें जारी हैं, पार्टी के विशाल संसाधनों का प्रदर्शन बेहिसाब है और उसके राजनैतिक आगमन के संकेत हर जगह मौजूद दिखते हैं.

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अलपुझा के मौजूदा सांसद और पार्टी उम्मीदवार ए.एम. आरिफ के साथ 

लेकिन दूसरी तरफ मामला काफी पुराना है. वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां 'इंडिया' ब्लॉक में पक्की साझीदार हैं, लेकिन केरल में उनकी तीखी, कड़वी अदावत 75 साल पुरानी है. इतना कड़वी कि केरल के वीटो ने माकपा पर भी कई अहम राष्ट्रीय मौकों पर असर डाला. मसलन, 1997 में प्रधानमंत्री ज्योति बसु होते और यूपीए की साझेदारी 2008 में कायम रहती, अगर माकपा के धुर दक्षिणी कट्टर कामरेडों ने 'ना, ना' की हांक नहीं लगाई होती. अदावत सिर्फ पुरानी यादों के आधार पर ही नहीं है. सबूत देखिए, पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा ने राहुल के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता तथा महासचिव डी. राजा की पत्नी एनी राजा को उतारा है. दोनों ही बेहद सभ्य हैं, लेकिन लड़ाई किसी मायने में दोस्ताना नहीं होने वाली है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि यहां लोकसभा चुनाव बाहर से तितरफा दिखता है. लेकिन असलियत यह है कि कांग्रेस मलयाली लोगों से 2019 की तरह 'राष्ट्रीय' पैटर्न पर देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए वोट करने की उम्मीद कर रही है. दूसरी तरफ वामपंथी मोर्चा चाहता है कि केरल के आखिरी लाल समुद्र में मंथन से उसके पुनरुत्थान की कोई तस्वीर उभरे. इस प्रकार, इन 20 सीटों की अहमियत अचानक बढ़ गई है, खासकर इस बार के कांटे के मुकाबले वाले आम चुनाव में, जहां हर सीट कई-कई रोमन दिनार (प्राचीन चांदी के सिक्के) के बराबर है, जो प्राचीन काल में केरल की काली मिर्च की बोरियों के बदले मिला करता था.

टीम मोदी ने इस कड़ी टक्कर में एक वैचारिक मोड़ ला दिया है. उसे अभी तक केरल में अपनी पहली लोकसभा सीट नहीं मिली है. और वह इस बार तीन सीटें तिरुवनंतपुरम, त्रिशूर और पत्तनमतिट्टा हासिल करने के उतने ही करीब है, जितना पहले हुआ करती थी. दरअसल, तिरुवनंतपुरम प्रतिष्ठा की सीट बनी हुई है. यहां संकटग्रस्त स्टार कांग्रेसी शशि थरूर और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर के बीच टक्कर है.

यह मुकाबला भाकपा के मैदान में उतरने से और तीखा हो गया है. उसने अपने 'इंडिया' ब्लॉक के साथी के खिलाफ बुजुर्ग दिग्गज पन्नियन रवींद्रन को खड़ा किया है. वे यही कोई 79 साल के हैं. ये पूर्व सांसद इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की पुलिस से भिड़े थे और युवा विद्रोहियों की टोली की अगुआई कर रहे थे. तभी से उनमें विरोध की ज्वाला धधक रही है.

हालांकि, इस तितरफा जंग में कई दूसरे भी तत्व हैं, जो लड़ाई को अप्रत्याशित मोड़ दे रहे हैं. 3 अप्रैल को वायनाड में राहुल की रैली में कुछ ऐसी ही जटिलताओं के दर्शन हुए. दरअसल 2019 में राहुल के एक रोड शो में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के हरे झंडे लिए भीड़ को भाजपा ने निशाना बनाया था. आईयूएमएल राज्य में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) में कांग्रेस की पुरानी साझीदार है.

भगवा ट्रोल आर्मी ने उसे 'पाकिस्तान के झंडे' से मिलता-जुलता बताकर वीडियो वायरल किया. उसकी इस चाल का इशारा यह कि राहुल ने मुस्लिम बहुल क्षेत्र में शरण ली. वायनाड जिले में मुसलमान आबादी 28.7 फीसद है, जबकि राज्य में औसतन 26.6 फीसद है. इसलिए, इस बार यूडीएफ साझीदारों ने जोखिम को पूरी तरह से टाल देना ही बेहतर समझा. दोनों पार्टियों ने अपने झंडे छोड़ दिए. दो किलोमीटर के रोड शो में राहुल और बहन प्रियंका पार्टी नेताओं-कार्यकताओं के साथ कांग्रेस के तिरंगे के बिना पहुंचे तो आईयूएमएल के लोग भी बिना झंडे के रैली में शामिल हुए, भले ही उसके कुछ कार्यकर्ता इससे थोड़े उत्तेजित थे.

लेकिन इतनी हिदायत रखने के बावजूद विवाद बिल्कुल उलटी ओर से लौटा. इस बार, पिनाराई की ओर से व्यंग्य-बाण चले! उन्होंने यूडीएफ की जोड़ी पर भाजपा से 'डर जाने' के लिए ताना मारा और चतुराई से 'पाकिस्तान' एंगल का भी संदर्भ जोड़ दिया गया. हालांकि आईयूएमएल काफी हद तक मध्यमार्गी और पूरी तरह से मुख्यधारा की सामुदायिक पार्टी है.

लेकिन इस्लामवादी जिन्न को बोतल से बाहर लाने की मानो यही चाल काफी नहीं थी. एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) तो थी ही. अब कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन के रूप में देश भर में चर्चित हो उठे पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनैतिक शाखा एसडीपीआई ने कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया. हालांकि एक दिन बाद कांग्रेस की राज्य इकाई के कार्यवाहक प्रमुख एम.एम. हसन ने एसडीपीआई के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया, लेकिन नुक्सान तो हो गया था. वामपंथी भी कटाक्ष करने से नहीं चूके.

पत्तनमतिट्टा में भाजपा के उतरने से एक और दिलचस्प उलटफेर हो गया है. सबरीमाला मंदिर की पवित्र-स्थली के करीब इस इलाके में भगवा रणनीतिकारों ने एक ईसाई अनिल एंटनी को मैदान में उतारा है. सबरीमाला 2018 में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा बन गया था.

इसे दोहरा उलटफेर कह सकते हैं क्योंकि अनिल लंबे समय से गांधी परिवार के वफादार रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री/मुख्यमंत्री ए.के. एंटनी के बेटे हैं. इसके जरिए भाजपा की कोशिश ईसाई समुदाय में पैठ बनाने की है, जो केरल की आबादी का 18 फीसद है. इस बारे में एक अजीब पुरानी कहानी भी है. 2004 से 2014 तक केंद्र में यूपीए शासन के लगभग एक दशक तक, दिवंगत ओमन चांडी के दो बार मुख्यमंत्री रहने से कांग्रेस को केरल में 'ईसाई समर्थक' पार्टी कहा जाने लगा था.

इससे नायर समुदाय में भगवा रुझान कुछ ज्यादा ही तेज हो गया था. यह समुदाय पहले जमींदार हुआ करता था और केरल की आबादी में उसकी हिस्सेदारी लगभग 15-20 फीसद है, जो राज्य में करीब  54.7 फीसद हिंदू आबादी का बेहद प्रभावी हिस्सा है. 20वीं सदी के मध्य में भूमि सुधार हुए तो उसके बाद नायर समुदाय वामपंथियों का खुलकर विरोध करने लगा और इस क्रम में उसका झुकाव बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की ओर हुआ करता था. लेकिन सबरीमाला विवाद के बाद नायर समुदाय के एक वर्ग का झुकाव भगवा दल की ओर होना शुरू हुआ. कांग्रेस नरम हिंदुत्व अपनाकर भी इस रुझान को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई है. 

जाति का पचड़ा तो बदस्तूर कायम है, मगर भाजपा ईसाइयों को साथ लेकर बहु फसली जमीन तैयार करना चाहती है. ऐसा भी नहीं कि इसके लिए जमीन पूरी तरह से अनुर्वर है. द केरल स्टोरी विवाद ने स्थानीय स्तर पर बड़ा तूल पकड़ा जब दूरदर्शन से एक दिन पहले, एक प्रमुख कैथोलिक संप्रदाय के सिरो-मालाबार चर्च की इडुक्की शाखा में धर्म-शिक्षा के लिए जुटे हाईस्कूल के छात्र-छात्राओं के लिए इसकी स्क्रीनिंग की गई. ये किशोर-किशोरियों को "प्रेम संबंधों और उसके नतीजों तथा खतरों के बारे में जागरूक करने" के लिए इकट्ठा किया गया था.

लव जिहाद की अवधारणा की उत्पत्ति भी केरल से हुई है और चर्च के कुछ हलकों में इस मामले में नाकाम फरमान जारी करने का खतरा हमेशा बना रहा है. इस प्रकार यह चमत्कार होता दिख सकता है कि आधुनिक समय में कई तरह के वैश्विक क्रूसेड की गूंज की तरह ही, केरल का ईसाई समुदाय देश में कहीं और धर्मनिरपेक्षता पर किसी भी तरह के संकट को नजरअंदाज करने और भगवा पार्टी को अपना समर्थन देने के लिए तैयार हो सकता है. कम से कम, भाजपा को तो इसका यकीन हो चला है. उसे पूरा भरोसा है कि यह चमत्कार पत्तनमतिट्टा में भी होगा और त्रिशूर में भी, जहां उसने सुपर स्टार सुरेश गोपी पर दांव लगाया है.

जहां तक वामपंथ का सवाल है, तो उसके मौजूदा नायक मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को स्थानीय हवाओं के रुझान को मोड़ने और संतुलित करने की कला में महारत हासिल है. जैसा कि दो लगातार विधानसभा चुनावों में 40 फीसद से ज्यादा वोट हासिल करके उन्होंने दिखाया है. पूर्व कांग्रेस नेता और अब राज्य एनसीपी प्रमुख पी.सी. चाको कहते हैं. "पिनाराई राजनैतिक गुणा-भाग के माहिर खिलाड़ी हैं. उन्होंने नागरिकता (संशोधन) कानून और मणिपुर हिंसा के खिलाफ मुखर आवाज उठाई. और इस तरह उन्होंने अपने सियासी सुरक्षा जाल को मजबूत कर लिया क्योंकि केरल के चुनावों में अल्पसंख्यक वोटों की भूमिका निर्णायक होती है."

माकपा का काडर आधार भी मजबूत बना हुआ है, और 22 फीसदी ओबीसी इझावा आबादी पर उसकी पकड़ असरदार बनी हुई है. हालांकि, इन दिनों वामपंथी पार्टियों का आकार-प्रकार और प्रसार कई बार क्षेत्रीय पार्टियों जैसा दिखता है. वे दिन लद गए जब देश भर में उसकी मौजूदगी थी और महान कम्युनिस्ट नेता ए.के. गोपालन 1952 की लोकसभा में देश के पहले विपक्ष के नेता बने थे. इसलिए केरल को 'भाजपा-मुक्त' बनाए रखने के उसके संकल्प ने थोड़ा क्षेत्रीय स्वर प्राप्त कर लिया है. लेकिन भगवा असर बढ़ रहा है. 2019 में उसके उम्मीदवारों को 2,00,000 से 3,00,000 के बीच वोट मिले थे. क्या इस बार वाम किले की दरारें चौड़ी तो नहीं हो जाएंगी?

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