गया से और पूरब की ओर बढ़ने पर नवादा के बाद आता है झारखंड से लगता जमुई जिला. मुख्यालय से 16-17 किलोमीटर पहले ही पड़ता है तेतरिया गांव. यहां घुसते ही इरफान अंसारी हमें रोक लेते हैं, इस दावे के साथ कि "बीड़ी मजदूरों के बारे में हमसे बेहतर कोई आपको बता नहीं पाएगा. हम पोलिटिकल वर्कर रहे हैं, बीड़ी मजदूरों के संगठन में रहे हैं. इस उद्योग की रग-रग से वाकिफ हैं. जमुई जिले में खासकर इसके झाझा, सोनो और गिद्धौर ब्लॉक में आपको मुश्किल से कोई ऐसा घर मिलेगा जहां बीड़ियां नहीं बनतीं. आज नहीं तो दस-बीस साल पहले तो बनती ही थीं. अब घर में कोई अच्छा कमाने वाला हो गया तो अपनी औरतों से बीड़ी बनवाना छुड़वा दिया. नहीं तो घर-घर में बैठकर बीड़ी लपेटती महिलाएं." बीड़ी उद्योग ही यहां की पहचान है. इसी तेतरिया गांव में 5,000 वोटर हैं, इसमें से बमुश्किल 500 वोटर होंगे, जिनके घर बीड़ी नहीं बनाई जाती.
इरफान गांव की तस्वीर खींच ही रहे थे कि उसी बीच हमारी बातचीत सुन रहा एक शरारती बच्चा बीड़ी जलाइले जिगर से पिया...गाना गाते हुए वहां से निकल जाता है. वे उस बच्चे पर भड़क उठते हैं और फटकार लगाते हुए पूछते हैं, "कुछ समझबौ करते हो इस गाने का मतलब? बस गावै लगलेन. इहां तो बिना पिए ही बीड़ियां लोगों का दिल-जिगर सब जला रही हैं."
वे पास ही बैठे रिश्तेदार रिजवान अंसारी की तरफ इशारा करते हैं: "देखिए इसको, मुश्किल से 52-55 साल का होगा. सत्तर साल का बूढ़ा लगता है. इसने कभी बीड़ी नहीं पी. मगर आज दम्मे की बीमारी से ऐसा परेशान है कि कहने लगता है, अब अल्लाह उठा ले. पहले घर में बीड़ी बनाता था, फिर झाझा की एक बीड़ी फैक्टरी में बीड़ी सेकने की नौकरी की. वहीं यह बीमारी लग गई." रिजवान अकेले नहीं. इरफान के मुताबिक, गांव के हर दूसरे घर में दमा और हर दसवें घर में टीबी के मरीज मिल जाएंगे. "पेट की आग कहती है बीड़ी बनाओ और बीड़ी कहती है, तुम पियो न पियो, हम तुम्हारा जिगर जला देंगे."
इरफान के पास से उठकर हम तेतरिया गांव घूमने लगते हैं. हर घर में औरतें और लड़कियां गोद में सूप रखे बीड़ी बनाती दिख जाती हैं. सूप में खूब सारा जर्दा, बीड़ी के पत्ते, धागा और बीड़ी तोपने के लिए लोहे का एक उपकरण. कहीं वे दरवाजे पर बैठी मिलती हैं, तो कहीं घर के आंगन में. इनमें वे नवप्रसूता औरतें भी होती हैं, जो खुद बीड़ी बना रही होती हैं और उनके आसपास या उनके शरीर से लटककर छोटा बच्चा खेल रहा होता है. वे इससे बेपरवाह नहीं कि बीड़ी का जर्दा और उसकी गंध बच्चे के लिए नुक्सानदेह है पर बच्चा संभाले कौन? "का किहल जाय? बीड़ी न बनाउब त घर कइसन चली?"
घर चलाने के लिए ही घर-घर बीड़ियां बन रही हैं. और बनाने वालों में सौ में से 99 महिलाएं. पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखते हैं इसमें लगे हुए. मगर बीड़ी बनाकर कितने पैसे मिल जाते हैं? एक बुजुर्ग महिला नूरजहां खातून जवाब देती हैं, "एक हजार बीड़ी बना ली तो 110 रुपए. वह भी हाल ही में बढ़ा है. पहले तो अस्सी-नब्बे रुपए ही मिलते थे. हम जब छोटे थे तो हजार बीड़ी के पांच पैसे मिलते थे."
एक दिन में एक औरत कितनी बीड़ियां बना लेती होगी? हजार या दो हजार? "अरे एक हजार कहां! छह-सात सौ बना ली तो बहुत समझौ. बीड़ी बनाना ही कोई अकेला काम थोड़े ई है. औरत पहले घर का काम निबटाएगी. खाना पकाएगी, साफ-सफाई करेगी. फिर जब खा-पीकर फुरसत होगी तो बीड़ी बनाने बैठेगी." वे स्पष्ट करती हैं. यानी घर में दो औरतें मिलकर रोजाना मुश्किल से सौ-डेढ़ सौ ही कमा पाती हैं.
जमुई में बीड़ी बनाती इन औरतों के मुद्दों पर देखिए ये विस्तृत रिपोर्ट
पड़ोस में मुमताज अंसारी की इंटर पास बहू सूफिया परवीन इस पूरे गांव की सबसे पढ़ी-लिखी महिला हैं. वे भी बीड़ी बनाती हैं. सूफिया के ही शब्दों में, "हफ्ते में बमुश्किल दो हजार बीड़ियां बना पाते हैं. छोटा बच्चा है. इस वजह से ज्यादा बना पाना मुमकिन नहीं हो पाता." सूफिया की सास समीना खातून अब बीमार रहने लगी हैं, वे साथ देती हैं. मगर उनसे भी ज्यादा नहीं बन पातीं. मुमताज अंसारी बीड़ी फैक्टरी में बीड़ी सेकने का काम करते थे. मुश्किल काम था. आग की तेज लपटों में बीड़ी के मुंह को थोड़ा झुलसाना होता था. लगातार तेज रोशनी देखते-देखते उनकी पुतलियों ने काम करना बंद कर दिया. अब उन्हें कुछ नजर नहीं आता. ऐसे में सास-बहू मिलकर जो बीड़ियां बना लेती हैं, उसी से घर चलता है. मतलब बीड़ी बनाने के काम में आमदनी धेले भर की है और जोखिम का कोई हिसाब नहीं.
फिर क्यों आपलोग बीड़ियां बनाते हैं. इसे छोड़ कोई दूसरा रोजी-रोजगार क्यों नहीं कर लेते? मुमताज तपाक से उलटे ही पूछ बैठते हैं, "दूसरा काम आखिर है कहां! होता तो हम अपनी इंटर पास बहू से ये बीड़ियां ही बनवाते? मजबूरी है. जितनी मेहनत बीड़ी बनाने में होती है, उतनी मेहनत करें तो रोज की दो से ढाई सौ रुपए की मजदूरी होनी चाहिए. मगर बीड़ी मजदूरी का रेट बढ़ता नहीं." यही तर्क इरफान अंसारी का भी है: "मजदूरी कम से कम तीस सौ रुपए रोज की होनी चाहिए. सरकार को कोई सिस्टम निकालना चाहिए. इसके अलावा बीड़ी मजदूरों को ऐसे उपकरण मिलने चाहिए जिससे उनकी सेहत पर बुरा असर न पड़े. पहले यहां बीड़ी मजदूरों के लिए एक अस्पताल था, जहां मुफ्त दवाएं मिलती थीं. अब वह भी नाम का रह गया है."
पर ये बातें लोग अपने नेताओं से क्यों नहीं कहते, जो चुनाव लड़ते हैं? क्या इस बार के लोकसभा चुनाव में जमुई में बीड़ी मजदूरों की बदहाली कोई मुद्दा बनेगी?" इरफान हीही करते हुए कहने लगते हैं, "अरे नेतवन सब का क्या है. कहिएगा तो वादा भी करने लगेगा. कहेगा बीड़ी मजदूरों के लिए ये कर देंगे, वो कर देंगे. मगर इधर वोट पड़ा कि उधर सब भूला."
जमुई में पांच लाख परिवार बीड़ी बनाने के काम से जुड़े हैं. सौ से ज्यादा बीड़ी कारखाने हैं. यहां बनी बीड़ियां देश के कई इलाकों में जाती हैं, जहां अलग-अलग कंपनियां इन पर रैपर लगाकर बेचती हैं. मगर सच यही है कि इस चुनाव में बीड़ी मजदूरों का सवाल कहीं उठता तक नजर नहीं आता.
जमुई की सीट से एनडीए से लोजपा (रामविलास) नेता चिराग पासवान के बहनोई अरुण भारती मैदान में हैं. उनके खिलाफ राजद ने अर्चना रविदास को उतारा है. अर्चना खुद को जमुई की बेटी कहती हैं. उनके पक्ष में प्रचार करने आए तेजस्वी यादव अरुण भारती को परदेसी दामाद बताते हैं. मगर अर्चना के एजेंडे में भी साफ-साफ बीड़ी मजदूरों का मसला नहीं है. जब उनसे यह सवाल पूछा जाता है तो वे कहती हैं, "इन सारी समस्याओं पर भी हमारी नजर है. पर अभी पहला सवाल यह है कि जनता हमारा हाथ मजबूत करे. हमें जिताकर संसद भेजे."
अरुण भारती के पक्ष में प्रचार करने खुद नरेंद्र मोदी आ चुके हैं. उनके साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जमुई के सांसद चिराग पासवान और जमुई की विधायक श्रेयसी सिंह भी थीं. मगर पूरे आयोजन में एक बार भी बीड़ी मजदूरों का सवाल नहीं उठा. यह सवाल तेजस्वी के कार्यक्रम से भी नदारद रहा.
जमुई के अलग-अलग इलाकों में घूमते हुए तेतरिया गांव की तरह ही घर-घर बीड़ी बनाती औरतें दिखती हैं. रजला गांव के महादलितों की बस्ती तूरी टोला में तीन औरतें बैठी बीड़ी बना रही हैं. वे भी मजदूरी बढ़ाने और बीमारी की शिकायत करती है. एक औरत के सूप के नीचे मोदी की गारंटी के विज्ञापन वाला अखबार रखा है. उनसे सवाल कीजिए कि पांच किलो अनाज मिलता है? "मिलता है, मगर पांच नहीं चार किलो." आयुष्मान कार्ड बना है? "हां, बना है मगर कभी इस्तेमाल नहीं किया." पक्का मकान मिला है? ''1989 में ही बाप-दादा को मिला था. अब टूटने लगा है. नया नहीं मिल रहा." हर महीने गैस भरवाते हैं? "नहीं. हर महीने कहां! इतना पैसा कहां से लाएं! लेकिन साल में एकाध बार भरवा लेते हैं. नहीं तो लॉक हो जाएगा. ऐसा एजेंसी वालों ने कहा है." नल-जल योजना का पानी आता है? "पिछले पांच महीने से नहीं आ रहा. कहीं पाइप फट गई है."
तभी पीछे से इनमें से एक के पति जगदीश तूरी आ जाते हैं. कहने लगते हैं, "हम जानते हैं, आप लोग भाव परखने आए हैं. हम भोट किसको देंगे, यह जानने. मगर जान लीजिए. यहां के लोग सिर्फ मोदी जी को जानते हैं. भोट चिराग पासमान को ही पड़ेगा. और कुछ जानना है आपको?"

