छत्तीसगढ़ में माओवाद विरोधी अभियान के लिए 1 अप्रैल की रात एक तरह से ऐतिहासिक थी. उस रात बीजापुर के लेंड्रा में सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच एक मुठभेड़ हुई और इसमें 13 माओवादी मारे गए. राज्य में एक साथ इतने माओवादी मारे जाने की यह पहली घटना है. वहीं इससे ठीक चार दिन पहले 27 मार्च को बस्तर में ऐसी ही एक मुठभेड़ में छह माओवादी मारे गए थे.
छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ अभियान में जबरदस्त सफलता और तेजी की सिर्फ ये दो मिसाल नहीं है. साल 2023 में सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच 22 मुठभेड़ हुई थीं और इस साल सिर्फ तीन महीने के भीतर यह आंकड़ा 57, यानी करीब ढाई गुने के आसपास पहुंच गया.
इन मुठभेड़ों में जहां पिछले साल सिर्फ चार माओवादी मारे गए थे, वहीं बीते तीन महीने में ही यह संख्या 50 तक पहुंच गई है. यानी हर तीसरे दिन मुठभेड़ की किसी घटना में औसतन एक माओवादी मारा गया है. इसके अलावा, इसी साल 18 फरवरी को सुकमा के पूर्वती गांव में फोर्स पहली बार पहुंच कर कैंप स्थापित कर पाई. यह माओवादियों के सेंट्रल कमेटी मेंबर हिड़मा का गांव है. आखिर माओवादी विरोधी अभियान की इस चौंकाने वाली गति और सफलता के पीछे क्या वजह है?
दरअसल, जब दिसंबर, 2023 में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अगुआई में राज्य में भाजपा की सरकार बनी तब गृह विभाग के मुखिया और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने माओवादियों को बातचीत का प्रस्ताव दिया था. इसके जवाब में माओवादियों की ओर से छह महीने के लिए उनके खिलाफ अभियान बंद करने की शर्त रखी गई और सुरक्षाबलों को बस्तर से हटाने की भी मांग की गई.
सरकार इन शर्तों के साथ बातचीत के लिए तैयार नहीं थी. इसके बाद सुरक्षाबलों को माओवादियों के खिलाफ पूरी ताकत से अभियान चलाने निर्देश मिले. गृह मंत्री विजय शर्मा कहते हैं, "माओवाद को खत्म करना सरकार का संकल्प है. इसके लिए हमने सुरक्षाबल और पुलिस के जवानों का मनोबल बढ़ाया और ऑपरेशन तेज करने के निर्देश दिए."
हालांकि कुछ मुठभेड़ों पर सवाल भी उठे हैं. आदिवासियों का आरोप है कि पुलिस ने अपनी कामयाबी को साबित करने के लिए निर्दोष आदिवासियों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या की है. लेकिन विजय शर्मा इन आरोपों को खारिज करते हैं. उनके मुताबिक, माओवादी आम आदिवासियों में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके साथ ही भाजपा नेता पिछली कांग्रेस सरकार पर माओवाद विरोधी अभियान कमजोर करने का आरोप लगाते हैं. पार्टी प्रवक्ता अनुराग अग्रवाल कहते हैं, "भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते सरकार और माओवादियों के बीच अघोषित समझौता था."
यह भी दिलचस्प है कि 2018 में सत्ता में आने से पहले कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में माओवादी हिंसा को रोकने के लिए बातचीत का वादा किया था. लेकिन पूरे पांच साल में बातचीत की दिशा में भूपेश बघेल की सरकार एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई.
हालांकि कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री उमेश पटेल माओवादियों के खिलाफ मिलने वाली कामयाबियों का श्रेय कांग्रेस पार्टी के कार्यकाल को देते हैं. छत्तीसगढ़ में माओवादियों के बहुचर्चित झीरम घाटी हमले में अपने भाई और अविभाजित मध्य प्रदेश में गृह मंत्री रह चुके अपने पिता नंद कुमार पटेल को गवां चुके उमेश पटेल दावा करते हैं, "कांग्रेस सरकार ने अंदरूनी इलाकों में सुरक्षाबलों के कैंपों की संख्या बढ़ाई थी. जमीनी काम कांग्रेस की सरकार में हो गया था, उसके परिणाम अब सामने आ रहे हैं."
माओवाद के खिलाफ सफलताओं के बीच इससे जुड़े कुछ नए खतरे भी सामने आ रहे हैं. पुलिस के खुफिया विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि माओवादियों ने ताजा मुठभेड़ की घटनाओं के बाद अपने हमले की रणनीति में भी बदलाव किया है.
अब माओवादी विस्फोटक से भरी गाड़ी और रॉकेट लॉन्चर के जरिए सुरक्षा बलों या सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकते हैं. अतीत बताता है कि सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच दशकों से चल रहे शह-मात के खेल में हर घटना के बाद एक बड़ी घटना होने की आशंका बनी रहती है. ऐसे में सुरक्षाबलों के सामने चुनौतियां खत्म होने में अभी लंबा वक्त लगेगा.

