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जहां से शुरुआत वहीं पर खींचतान, अपने ही अड़ंगों में कैसे फंसा इंडिया गठबंधन?

मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए बने इंडिया गठबंधन की सबसे ज्यादा संभावनाएं शुरुआत में बिहार में नजर आ रही थीं लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा का मौका आते-आते इसमें शामिल दल आपसी खींचतान में फंस गए

पटना में 3 मार्च को इंडिया गठबंधन की रैली आयोजित हुई थी
पटना में 3 मार्च को इंडिया गठबंधन की रैली आयोजित हुई थी
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2024

आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए का मुकाबला करने उतरा विपक्षी इंडिया गठबंधन उसमें शामिल दलों के स्वार्थों, अंतर्विरोधों और ठीक से लड़ने की अनिच्छा का शिकार नजर आता है. इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि सीटों का बंटवारा तब हुआ जब पहले चरण के नामांकन की तारीख बीत चुकी थी.

इसके पहले राजद और सीपीआई ने अपने उम्मीदवारों को मर्जी से सिंबल बांट दिए. सीटों के बंटवारे के लिए हुई प्रेस ब्रीफिंग सिर्फ तीन मिनट की हुई. उसमें राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने बंटवारे की सूची पढ़ी और राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने एक-दो लाइन का रिमार्क पेश किया. गठबंधन में शामिल किसी अन्य पार्टी के नेता ने कुछ नहीं कहा.

इंडिया गठबंधन में बिहार में पांच पार्टियां शामिल हैं. इनमें राजद को 26 सीटें, कांग्रेस को नौ सीटें, भाकपा-माले को तीन सीटें और सीपीआई-सीपीआईएम को एक-एक सीट मिली. यह रिपोर्ट लिखे जाने तक इनमें से कई सीटों पर अभी उम्मीदवार भी फाइनल नहीं हुए हैं. प्रत्याशियों की कोई सूची जारी नहीं की जा रही है. राजद उम्मीदवारों को लालू यादव अपने घर से सिंबल दे रहे हैं.

गठबंधन में सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर हुआ कि सीटों के बंटवारे से पहले ही राजद और सीपीआई ने कई उम्मीदवारों को सिंबल दे दिए. इनमें कुछ सीटें ऐसी थीं जिन पर कांग्रेस का दावा था, जैसे औरंगाबाद और पूर्णिया. औरंगाबाद सीट पर कांग्रेस के बड़े नेता निखिल कुमार लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी में थे, मगर वहां से राजद ने अभय कुशवाहा को टिकट दे दिया.

सबसे अधिक विवाद पूर्णिया सीट को लेकर हुआ. जनाधिकार पार्टी के नेता पप्पू यादव वहां से लंबे समय से तैयारी कर रहे थे. चुनाव के वक्त पूर्णिया से टिकट मिलने की उम्मीद में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया. मगर राजद ने वहां से जद (यू) छोड़ पार्टी में आईं बीमा भारती को टिकट दे दिया.

पप्पू अभी भी पूर्णिया से चुनाव लड़ने पर अडिग हैं. वे चाहते हैं कि कांग्रेस उन्हें पूर्णिया से चुनाव लड़ने की इजाजत उसी तरह दे जैसे वायनाड से राहुल गांधी के खिलाफ एनी राजा मैदान में हैं. मगर उन्हें पार्टी का खुला समर्थन नहीं मिला. मजबूरन उन्होंने 4 अप्रैल को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन किया. 

पप्पू यादव टिकट फाइनल होने से पहले लालू और तेजस्वी से मिलने राबड़ी आवास पर भी गए थे. वहां लालू ने उन्हें पूर्णिया के बदले मधेपुरा और सुपौल से लड़ने का ऑफर दिया मगर पप्पू तैयार नहीं हुए.

राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि राजद और कांग्रेस के कुछ नेता नहीं चाहते कि पप्पू कांग्रेस में रहें. पप्पू सक्रिय नेता हैं और लगातार बिहार के अलग-अलग इलाकों में घूमते हैं. जहां कोई घटना होती है, वहां सबसे पहले पहुंचते हैं. उनके आने से कांग्रेस बिहार में मजबूत हो सकती है और पार्टी में लंबे समय तक राज करने वाले सुविधापसंद नेताओं को दिक्कत हो सकती है.
जानकार मानते हैं कि लालू नहीं चाहते कि कांग्रेस बिहार में मजबूत हो. इसलिए पार्टी कन्हैया और पप्पू यादव जैसे नेताओं के बिहार में सक्रिय होने को लेकर नाखुश रहती है.

कहा तो यह भी जा रहा है कि बिहार के कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह भी पार्टी में पप्पू यादव के आने और सक्रिय होने से नाखुश हैं. वे लालू के करीबी माने जाते हैं और अपने बेटे आकाश सिंह को लोकसभा चुनाव में उतारने की तैयारी में हैं. वे मानते हैं कि लालू से अच्छे रिश्ते निभाकर वे अपने बेटे को आसानी से लोकसभा भेज सकते हैं. उन पर विधान परिषद चुनाव में पार्टी के हितों की अनदेखी के आरोप हैं. पार्टी में पप्पू यादव के सक्रिय होने से उन्हें अपनी कुर्सी पर भी खतरा नजर आने लगा है.
राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि पप्पू यादव के कांग्रेस में आने के पीछे प्रियंका गांधी का हाथ है, जो उनकी पत्नी रंजीत रंजन की करीबी हैं. कांग्रेस आलाकमान चाहता है कि पप्पू बिहार कांग्रेस में टिके रहें.

राजद पर साठगांठ के आरोप

इस विवाद के अलावा इन दिनों बिहार में एक और राजनैतिक चर्चा तेजी से चल रही है. वह यह कि लालू और राजद जान-बूझकर लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रत्याशी उतार रहे हैं. कहा जा रहा है कि ऐसा ईडी के दबाव की वजह से है. लालू परिवार के कई सदस्यों पर ईडी की जांच चल रही है. लोग भाजपा और राजद के बीच किसी गुप्त समझौते की चर्चा भी लगातार कर रहे हैं.

पत्रकार अरुण अशेष कहते हैं, "हालांकि इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं मगर चर्चाएं सिर्फ राजनैतिक हलकों में नहीं बल्कि जनता के बीच भी है. यह तो सच है कि कई सीटों पर राजद ने जिताऊ उम्मीदवारों के बदले कमजोर लोगों को टिकट दिए हैं. ललन सिंह के खिलाफ अशोक महतो की पत्नी को उतारना, औरंगाबाद से अभय कुशवाहा को उतारना और पूर्णिया से बीमा भारती को उतारना इसके संकेत हैं."

वे आगे कहते हैं, "ऐसा लगता है कि राजद लोकसभा चुनाव को लेकर बहुत गंभीर नहीं है. उसे लगता है कि उसे अपनी ताकत विधानसभा चुनाव में लगानी है. कुछ दिनों पहले जिस तरह तेजस्वी यादव सक्रिय हुए, उन्होंने यात्रा की और रैली आयोजित की, तो ऐसा लगता था कि पार्टी लोकसभा चुनाव दमदार तरीके से लड़ेगी. मगर टिकट वितरण में लालू यादव की सक्रियता के बाद स्थितियां बदल गईं."

पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता चितरंजन गगन इन आरोपों को खारिज करते हैं: "यह सब भाजपा का अफसाना है. हमारे सभी उम्मीदवार काफी मजबूत हैं और वे एनडीए को कड़ी टक्कर देंगे. हम चालीस में से चालीस सीटें जीतने वाले हैं." पप्पू यादव के सवाल पर वे कहते हैं, "हर पार्टी में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी खास सीट की जिद लिये बैठ जाते हैं. टिकट न मिलने पर भी वे उस सीट से चुनाव लड़ लेते हैं. हालांकि, उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इस बार सीधी टक्कर है. लड़ाई एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच है."

राजद के बारे में एक बात जरूर सकारात्मक कही जा रही है कि वो इस लोकसभा चुनाव में यादवों के साथ-साथ कुशवाहा और दूसरी अति पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को भी टिकट दे रहा है. इनमें अभय कुशवाहा, नवादा से श्रवण कुशवाहा, बीमा भारती, सुपौल से चंद्रहास चौपाल, उजियारपुर से आलोक मेहता, मुंगेर से अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी जैसे नाम हैं. लालू की दो बेटियां भी इस चुनाव में मैदान में हैं. मीसा भारती तो पहले से थीं, इस बार लालू को किडनी डोनेट करने वाली रोहिणी आचार्य भी छपरा सीट से चुनाव लड़ रही हैं.

चुनाव में वाम दलों की सक्रियता एक नई बात है. एक अरसे के बाद बिहार में तीन वाम दल मजबूती से चुनाव मैदान में हैं. भाकपा-माले के तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें दो संदीप सौरभ और राजाराम सिंह को मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है. बेगूसराय से सीपीआई के अवधेश राय और खगड़िया से माकपा के संजय कुमार चुनावी मैदान में हैं.

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