कहते हैं, ''असहमति देशभक्ति का सर्वोच्च रूप है''. पर गुजरात में यह कहावत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ही गले पड़ गई लगती है. करीब तीन दशक से राज्य में निर्विवाद राजनैतिक दबदबा रखने के बाद अब पार्टी को लोकसभा की 26 में से कम से कम छह सीटों पर बगावत का सामना करना पड़ रहा है. असंतोष की मुख्य वजह कांग्रेस के कई नेताओं और उनके समर्थकों का भाजपा में आना है, जिसकी कीमत पार्टी के पुराने वफादारों को चुकानी पड़ रही है.
पखवाड़े भर पहले साबरकांठा और वडोदरा निर्वाचन क्षेत्रों में असंतोष के स्वर फूटे. 25 साल संगठन में रहे विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता भीकाजी ठाकोर को पहले साबरकांठा से उम्मीदवार चुना गया, पर उन्होंने निजी वजहों का हवाला देकर हफ्ते भर के भीतर नाम वापस ले लिया. इसकी एक वजह तो यह चर्चा में थी कि विपक्ष के आरोप के मुताबिक, 2018 तक उनका उपनाम डामोर (आदिवासी) था, जिसे उन्होंने राजनैतिक फायदे के लिए बदलकर ठाकोर (ओबीसी) कर लिया.
ज्यों ही भाजपा ने 2022 में पार्टी में आए पूर्व कांग्रेसी नेता महेंद्र सिंह बरैया की पत्नी शोभना बरैया को उम्मीदवार घोषित किया, जंगल की आग की तरह चर्चा फैल गई कि ठाकोर से नाम वापस लेने के लिए कहा गया था. स्कूल टीचर शोभना उम्मीदवारी घोषित होने के कुछ दिन पहले तक भी भाजपा की प्राथमिक सदस्य तक नहीं थीं. इसी तरह सुरेंद्रनगर में 2017 में कांग्रेस से भाजपा में आए पार्टी उम्मीदवार चंदूभाई सेहोरा के खिलाफ बगावत बढ़ रही है.
उधर, वडोदरा में मौजूदा सांसद रंजनाबेन भट्ट के काम नहीं करने को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसकी वजह से उन्हें मुकाबले से हटना पड़ा. असंतुष्टों ने दावा किया कि उनके दो कार्यकाल के दौरान इस ''वीआइपी सीट की खूब उपेक्षा हुई.'' भाजपा के एक पदाधिकारी ने सवाल किया, ''जब घर में पले-बढ़े नेताओं को बदला जा रहा है तो उन्हें सुरक्षित सीट से तीसरी बार क्यों दोहराया जा रहा है?'' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में वडोदरा और वाराणसी से चुनाव लड़ा और बाद में वडोदरा सीट खाली कर दी थी.
असंतोष और बेचैनी का दौर दिसंबर 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद ही शुरू हो गया था. उस दौरान आप का एक और कांग्रेस के पांच विधायक पाला बदलकर भाजपा में आए. मगर पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को तब झटका लगा जब लोकसभा चुनाव के एक दौर के साथ 7 मई को होने वाले विधानसभा उपचुनावों के लिए चुने गए पांच में से चार उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी थे.
अलबत्ता अमरेली में स्थिति तब हाथों से बाहर चली गई जब मौजूदा सांसद नारन कछाड़िया की जगह जिला पंचायत अध्यक्ष भरत सुतारिया को टिकट दिए जाने पर दोनों गुटों के बीच हिंसा भड़क उठी.
वलसाड (एसटी) में पार्टी के कार्यकर्ता ध्रुव पटेल को बाहरी बताकर उनकी उम्मीदवारी का विरोध कर रहे हैं. पड़ोसी नवसारी जिले के धवल पार्टी के ट्राइबल मोर्चे के राष्ट्रीय सोशल मीडिया प्रभारी रह चुके हैं. जूनागढ़ और मोरबी सीटों पर भी कार्यकर्ताओं के बीच ऐसी ही बगावत के संकेत हैं जो सोशल मीडिया की पोस्ट और पोस्टरों के जरिए सामने आ रही है.
असंतुष्टों की मांगें नहीं मानी जाती हैं, तो उनके सामने एकमात्र विकल्प यही होगा कि चुनाव में हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं. फिर भी पार्टी उन्हें शांत करने के लिए फिलहाल पैबंदनुमा समाधान ही अपना रही है.

