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प. बंगाल: 'राजमाता' अमृता राय को भाजपा का टिकट, कितना कारगर होगा ये शाही दांव?

भाजपा ने कृष्णानगर राजघराने की अमृता राय को प्रत्याशी बनाया है. इससे यह बहस छिड़ गई है कि क्या पार्टी उस सामंती संस्कृति को हवा दे रही है जिसका बंगाल की चुनावी राजनीति में नामोनिशान नहीं रहा है

अमृता राय, कृष्णानगर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी
अमृता राय, कृष्णानगर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी
अपडेटेड 19 अप्रैल , 2024

- अर्कमय दत्ता मजूमदार

पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर लोकसभा सीट से भाजपा ने कृष्णानगर राजघराने की अमृता राय को प्रत्याशी बनाया है और उन्हें रानी मां या राजमाता के तौर पर पेश कर रही है. इससे इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या पार्टी उस सामंती संस्कृति को हवा देने की कोशिश कर रही है जिसका बंगाल की चुनावी राजनीति में नामोनिशान नहीं रहा है.

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इसकी आलोचना करते हुए भगवा खेमे को याद दिलाया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी को रानी या राजमाता बताना अनैतिक है. ममता बनर्जी ने 31 मार्च को कृष्णानगर निर्वाचन क्षेत्र के धुबुलिया में एक जनसभा में कहा, ''वे (अमृता राय को) राजमाता कह रहे हैं...देश में कोई राजा नहीं, हम सब प्रजा हैं. और कोई राजा है तो वह अपने शाही महल में जाए और रहे.''

ममता के संदेश को उनकी पार्टी की उम्मीदवार महुआ मोइत्रा ने दोहराया. राय का अतीत में कोई सियासी जुड़ाव नहीं रहा है और 20 मार्च को विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी में उन्हें भाजपा में शामिल किया गया और कुछ दिनों के बाद भाजपा ने उन्हें टिकट दे दिया.

बंगाल में 'राज' घरानों के लोग राजनीति में सक्रिय रहे हैं, मगर राजस्थान और मध्य प्रदेश सरीखे राज्यों के विपरीत, उनकी शाही पहचान को कभी केंद्र में नहीं रखा गया. 1952 में पहले राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान वर्धमान के पूर्व महाराजा उदय चंद महताब ने वर्धमान से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था. 

वर्धमान विश्वविद्यालय में इतिहास के सहायक प्रोफेसर सरबजीत जश कहते हैं, ''अमृता राय को रानी कहना तकनीकी रूप से गलत है. राधारानी महताब—जो अपनी रियासत के खत्म होने तक रानी थीं—के विपरीत राय कभी भी रानी नहीं रहीं.''

रॉय ने इंडिया टुडे को बताया कि उन्हें हमेशा 'रानी मां' कहा जाता है. यह मुझे संबोधित करने का स्नेहपूर्ण तरीका है और इसका कोई सामंती मतलब नहीं है. हालांकि, साफतौर पर लोगों से उनका कोई जुड़ाव नहीं रहा है. 30 मार्च को भाजपा के नादिया उत्तर के जिला संगठन प्रमुख अर्जुन विश्वास ने भगवा कार्यकर्ताओं के एक समूह के सामने स्वीकार किया कि राय के नामांकन से पहले तक विश्वास ने उन्हें कभी नहीं देखा था. 

असल में, उम्मीद की जा रही है कि 18वीं सदी के नादिया के राजा और इस शाही घराने की सबसे प्रतिष्ठित शख्सियत राजा कृष्णचंद्र राय के खानदान से होने की वजह से राय का जनता के बीच असर होगा. एक कुशल प्रशासक तथा कला, संस्कृति और बांग्ला के संरक्षक के रूप में वे बंगाल में एक सम्मानित शख्सियत हैं. मगर यह सच है कि उन्होंने बंगाल के आखिरी शासक सिराजुद्दौला के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी और मीर जाफर का साथ दिया था.

अब टीएमसी ने राय के पति के 39वें पूर्वज से राय को जोड़ते हुए और 'गद्दार' मीर जाफर के साथ कृष्णचंद्र के संबंध का उल्लेख करते हुए सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया है. जवाब में, राय ने कहा कि कृष्णचंद्र ने 'सिराज के अत्याचार' के खिलाफ लड़ाई लड़ी और 'सनातन धर्म तथा बंगाली भाषा की रक्षा की' जो राय के अनुसार बंगाल के आखिरी नवाब के राज में खतरे में थे.

राजनैतिक विश्लेषक शुभाशीष मैत्रा कहते हैं, ''अमृता राय को प्रत्याशी बनाना, कृष्णचंद्र के साथ उनके संबंधों का जिक्र करना और उन्हें रानी के रूप में पेश करना असल में भाजपा में नेतृत्व की कमी, और बंगाल के लोकाचार से उसका अलगाव दिखाता है.''

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