अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटे जाने के बाद यह क्षेत्र अपने पहले लोकसभा चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है. चुनाव में दोनों प्रमुख दलों नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को अगस्त 2019 के बाद अस्तित्व में आईं दो स्थानीय पार्टियों—जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (डीपीएपी)—से कड़ी चुनावी टक्कर मिल रही है.
केंद्रशासित प्रदेश में सात चरणों में से पहले पांच चरणों में मतदान होगा—19 अप्रैल (उधमपुर निर्वाचन क्षेत्र), 26 अप्रैल (जम्मू), 7 मई (अनंतनाग-राजौरी), 13 मई (श्रीनगर) और 20 मई (बारामूला). बतौर राज्य जम्मू-कश्मीर में लोकसभा की छह सीटें थीं—तीन कश्मीर में, दो जम्मू में और एक लद्दाख में. लेकिन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने वाले जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद विधानसभा क्षेत्रों की संख्या 107 से बढ़कर 114 हो गई.
ऐसे में परिसीमन प्रक्रिया अपरिहार्य थी. परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में लोकसभा सीटें पांच रह गईं लेकिन चुनावी सीमाएं फिर से निर्धारित की गईं. इसे लेकर माना जा रहा है कि राजनैतिक परिदृश्य कथित तौर पर भाजपा के पक्ष में बदल गया है.
जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी मार्च 2020 में अस्तित्व में आई. पीडीपी के पूर्व नेताओं की बनाई पार्टी की अगुआई पूर्व पीडीपी नेता सैयद अल्ताफ बुखारी करते हैं. वहीं, सितंबर 2022 में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (डीपीएपी) का गठन पूर्व कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने किया था. इसने उधमपुर निर्वाचन क्षेत्र से जी.एम. सरूरी को मैदान में उतारा है, जिसका प्रतिनिधित्व मौजूदा समय में भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह करते हैं.
हालांकि, डीपीएपी विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के वोट बांट सकती है. विपक्षी गठबंधन कांग्रेस के लाल सिंह को मैदान में उतारने की तैयारी में है जो उधमपुर से दो बार कांग्रेस के सांसद रह चुके हैं. वे 2014 में भाजपा में गए थे फिर मार्च में कांग्रेस में लौट आए थे.
दूसरी तरफ, सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस (जेकेपीसी) भी चुनाव मैदान में पुरानी प्रतिद्वंद्वी नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ ताल ठोक रही है. भाजपा की सारी उम्मीदें पहाड़ी जनजातीय समूह की बड़ी आबादी पर टिकी हैं, जिन्हें फरवरी में ही अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया गया और इस तरह इस समुदाय को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का रास्ता खुला है. इसके बाद से पूर्व एनसी नेता मुश्ताक अहमद शाह बुखारी, पूर्व एमएलसी सैयद मोहम्मद रफीक शाह और शहनाज गनी जैसे कई प्रमुख नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं.
वैसे अपनी पार्टी, डीपीएपी और पीपल्स कॉन्फ्रेंस के बीच कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है लेकिन उनके सियासी दुश्मन समान ही हैं—पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस. जमीनी स्तर पर जोरदार बयानबाजी का दौर जारी है. कारोबारी से राजनेता बने अल्ताफ बुखारी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर 1987 के विधानसभा चुनावों में कथित धांधली का आरोप लगाया है, जिसके बारे में कई लोगों का मानना है कि कश्मीर में सशस्त्र उग्रवाद भड़कने की यह एक बड़ी वजह थी. डीपीएपी के प्रमुख प्रवक्ता सलमान निजामी बताते हैं कि अन्य पार्टियों के साथ बातचीत जारी है. उनके मुताबिक, ''राज्य का दर्जा दिलाने के अलावा रोजगार सृजन, भूमि संरक्षण और बेरोजगारी दूर करना ही हमारा एजेंडा है. कई लोग चाहते हैं कि आजाद को गठबंधन का नेतृत्व करना चाहिए.''
पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि नई पार्टियां भाजपा की सोची-समझी रणनीति का नतीजा है, जिन्हें समाज को बांटने और भाजपा के 'हितों' को साधने के लिए बनाया गया है. नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी कहते हैं, ''आप एक नई तरह की राजनीति देख सकते हैं जिसमें अपनी पार्टी जैसे दल घुमा-फिराकर भाजपा के नैरेटिव को आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं.''
- मोअज्जम मोहम्मद, श्रीनगर से

