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आंध्र: टीडीपी का दो दलों संग गठबंधन, वाईएसआरसीपी के लिए यह कितनी बड़ी चुनौती?

यह भांपते हुए कि टीडीपी शायद अपने दम पर न जीत पाए, नायडू एक त्रिपक्षीय गठबंधन का हिस्सा बन गए हैं. 9 मार्च को हुए समझौते के तहत टीडीपी को 17, भाजपा को छह और जेएसपी को दो लोकसभा सीटें मिली हैं

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से 8 मार्च को मिलते टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से 8 मार्च को मिलते टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू
अपडेटेड 27 मार्च , 2024

आंध्र प्रदेश में संसदीय और विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) के खिलाफ तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), जन सेना पार्टी (जेएसपी) और भाजपा के मिलकर मैदान में उतरने से मुकाबला कड़ा हो गया है.

करीब तीन दशक से टीडीपी की अगुआई कर रहे और राज्य में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रह चुके एन. चंद्रबाबू नायडू के लिए 2024 का चुनाव, उन्हीं के शब्दों में, उनका आखिरी चुनाव होगा. यह भांपते हुए कि टीडीपी शायद अपने दम पर न जीत पाए, नायडू एक त्रिपक्षीय गठबंधन का हिस्सा बन गए हैं. 9 मार्च को हुए समझौते के तहत टीडीपी को राज्य की 17 लोकसभा सीटें मिलीं, जबकि छह सीटों पर भाजपा और दो सीटों पर जेएसपी चुनाव लड़ेंगी.

साथ-साथ हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए 175 सदस्यीय सदन में टीडीपी 145, जेएसपी 24 और भाजपा छह सीटों पर चुनाव लड़ेगी. नायडू ने दावा किया है कि यह गठबंधन क्लीन स्वीप करेगा. टीडीपी पिछले दो साल से सत्तारूढ़ वाईएसआरसीपी को दरकिनार करने के लिए खुद भाजपा के साथ दिखने की कोशिश करती रही है. बावजूद इसके कि वाईएसआरसीपी को पिछले पांच वर्षों से भाजपा का परोक्ष वरदहस्त (वरदान देने की हस्तमुद्रा) हासिल है.

टीडीपी उम्मीद कर रही है कि भाजपा के साथ मजबूत गठबंधन चुनाव-बाद, खासकर राज्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों की लगातार जारी हलचलों के मद्देनजर, उसके लिए फायदेमंद रहेगा. 2014 में ऐसे घटकों के साझा प्रयासों से ही टीडीपी को सरकार बनाने का मौका मिला था. नायडू ने आंध्र को विशेष दर्जा देने में केंद्र की नाकामी का हवाला देते हुए 2018 में गठबंधन तोड़ दिया था. वह फैसला टीडीपी पर भारी पड़ा.

भाजपा के गठबंधन से बाहर होने और जेएसपी के अलग राह अपनाने से 2019 में वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी की अध्यक्षता वाली प्रतिद्वंद्वी वाईएसआरसीपी राज्य की 175 विधानसभा सीटों में से 151 और 25 लोकसभा सीटों में से 22 सीटों पर भारी जीत हासिल करने में कामयाब रही. सत्ता विरोधी लहर के बीच विधानसभा चुनाव में वाईएसआरसीपी को 49.9 फीसद, टीडीपी को 39.2 फीसद, जेएसपी को 5.5 फीसद (सहयोगी दलों कम्युनिस्ट पार्टियों और बसपा के साथ मिलकर 6.24 फीसद) वोट मिले. भाजपा का वोट शेयर 0.8 फीसद था, जो नोटा के 1.3 फीसद वोट से भी कम था.

जगन टीडीपी और जेएसपी के साथ भाजपा के गठबंधन पर अपनी प्रतिक्रिया को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं. 11 मार्च को बापतला जिले की एक रैली में उन्होंने नायडू और कल्याण पर कटाक्ष किए लेकिन भाजपा पर सीधा निशाना साधने से परहेज किया. उन्होंने टीडीपी प्रमुख पर वाईएसआरसीपी से सीधे भिड़ने में सक्षम न होने का आरोप लगाया और कहा कि वे (जगन) शेर की तरह अकेले लड़ रहे हैं. मगर वे अच्छी तरह समझते हैं कि पिछली बार जैसे शानदार प्रदर्शन की उम्मीद नहीं की जा सकती. अंदरूनी चुनौतियां भी हैं. उनके पांच सांसद दूसरे दलों में चले गए हैं. उनके कुछ विधायक और अन्य लोग जगन तक 'पहुंच संभव न होने' का आरोप लगाते रहे हैं. सीएम ने सरकारी कर्मचारियों के एक वर्ग को भी नाराज कर दिया है, जो चुनाव में वाईएसआरसीपी की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है.

बहरहाल, इस चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित लाभ की उम्मीद है. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक (0.1 फीसद) था. वहीं, कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि यह समझौता टीडीपी के लिए नुक्सानदेह हो सकता है. भाजपा की राज्य प्रमुख डग्गुबती पुरंदेश्वरी चंद्रबाबू नायडू की पत्नी भुवनेश्वरी की बड़ी बहन और टीडीपी संस्थापक एन.टी. रामाराव की दूसरी बेटी हैं. यानी चुनावी सरगर्मियां बढ़ने के साथ सियासी चर्चाओं के लिए बहुत कुछ होगा.

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