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तूफानों के बीच कैसे पार लगाएंगे उद्धव अपनी नैय्या?

जून 2022 में उद्धव ठाकरे की पार्टी से टूटकर एकनाथ शिंदे 39 और विधायकों के साथ भाजपा से जा मिले और एमवीए सरकार गिर गई थी. इससे उद्धव का ढाई साल का मुख्यमंत्री पद अचानक खत्म हो गया था

मुंबई स्थित अपने निवास मातोश्री पर पत्रकारों से बात करते शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे
मुंबई स्थित अपने निवास मातोश्री पर पत्रकारों से बात करते शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे
अपडेटेड 22 मार्च , 2024

पार्टी का विभाजन, वफादारी में बदलाव और कई कानूनी झटकों के साथ उद्धव ठाकरे के लिए हालात बेहद विपरीत दिखते हैं. जून 2022 में उनकी पार्टी से टूटकर एकनाथ शिंदे 39 अन्य विधायकों के साथ भाजपा से जा मिले और महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई.

इससे न सिर्फ ठाकरे के ढाई साल का मुख्यमंत्री पद अचानक खत्म हो गया, बल्कि उनकी बाकी बची पार्टी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे-यूबीटी) के पास मराठी माणूस के सहानुभूति वोट और कुछ हद तक अल्पसंख्यकों में पैठ जमाने की संभावना के अलावा ज्यादा कुछ नहीं बचा है.

इस तरह उद्धव नैतिक पायदान पर खड़े होकर शिंदे सरकार के खिलाफ हमलावर हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरिम बजट 'ठेकेदार समर्थक और जनविरोधी' है. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राज्य की दनादन यात्राओं को सबूत की तरह पेश कर रहे हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन अपनी चुनावी संभावनाओं को लेकर चिंतित है. इससे भाजपा चिढ़ गई है. ग्रामीण विकास मंत्री गिरीश महाजन ने 28 फरवरी को तंज कसते हुए कहा कि उद्धव महाराष्ट्र में एक भी लोकसभा सीट जीतकर दिखा दें: ''बाघ की खाल ओढ़कर कोई बिल्ली शेर नहीं बन जाती.''

दरअसल, विपक्ष का इंडिया ब्लॉक राष्ट्रीय स्तर पर कुछ झटके खा रहा है और शिंदे ने अपनी ताकत बढ़ाई है. ऐसे में, क्या ठाकरे मराठी टाइगर की वो दहाड़ भर सकते हैं, जो उनके दिवंगत पिता बालासाहेब ठाकरे की पहचान हुआ करती थी? वाकई यह आसान तो नहीं होगा. एक तो, भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए बना एमवीए गठबंधन अपने दो घटकों—शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में बड़ी टूट के बाद काफी कमजोर हुआ है. ठाकरे इससे भी काफी कमजोर हो गए हैं कि शिंदे को पार्टी का नाम और चुनाव-चिह्न सौंप दिया गया है. इससे शिंदे गुट को खुद को 'असली' शिवसेना कहने को मौका मिल गया. सरकार ग्रामीण मराठों को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) कुनबे के रूप में कोटा देने का वादा करके उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. उन्हें नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसद आरक्षण भी दिया जा रहा है.

शिवसेना (यूबीटी) की रणनीति

आए दिन यह अफवाह उड़ती रहती है कि ठाकरे खेमे से एक और विधायक शिंदे गुट में जा सकता है. हालांकि, ठाकरे के वफादारों को उम्मीद है कि ये झटके वरदान साबित होंगे. शिवसेना (यूबीटी) के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि वे 'गद्दारी' को एजेंडा बनाएंगे. यह बताया जाएगा कि कैसे भाजपा ने शिंदे की मदद से ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार गिराई और अब उन्हें शिवसेना की कमान सौंप रही है. वे कहते हैं, ''मराठी मानुस भावुक होते हैं, वे बालासाहेब के बेटे को धोखा देने के लिए शिंदे को माफ नहीं करेंगे.''

मराठी लोग मुंबई में बहुसंख्यक नहीं, लेकिन सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं. इससे एक असुरक्षा की भावना पैदा होती है और यह भाव ग्रेटर मुंबई क्षेत्र के मतदाताओं में फैला हुआ है. भाजपा के एक पूर्व मंत्री भी मानते हैं कि हिंदुत्व समर्थक मराठी लोगों का एक वर्ग इससे असहज है कि ठाकरे परिवार से अभिन्न नाता वाली पार्टी शिंदे को सौंप दी गई. भाजपा के करीबी एक निर्दलीय विधायक के मुताबिक, ठाकरे के लिए राहत यह है कि लोगों ने शिंदे को वाजिब उत्तराधिकारी नहीं माना. वे कहते हैं, ''शिंदे के लिए रिक्शा वाले का मुख्यमंत्री बनने का नैरेटिव काम नहीं आया.'' 

ठाकरे गुट की कोशिश नया सामाजिक समीकरण तैयार करने की है, ताकि वह सिर्फ हिंदुत्ववादी पार्टी से ऊपर उठ सके. इसलिए वह 'मराठी-मुस्लिम' एकजुटता पर भी काम कर रही है, जिससे भाजपा रूपी 'बड़ी बुराई' को हराने के लिए मुस्लिम वोट को आकर्षित किया जा सके. इसकी मिसाल के रूप कहा जाता है कि मुसलमानों ने 2022 में अंधेरी (पूर्व) विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को वोट दिया. यही नहीं, 2014 के विधानसभा चुनाव और 2017 के बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों में शिवसेना जब भाजपा से अलग लड़ी तब मुसलमानों का वोट उसे मिला था. 

ठाकरे समर्थकों को यह भी लगता है कि उनके नेता की नरम छवि, पार्टी को व्यापक बनाने और पहले दूर रहे हिंदी भाषियों तथा बौद्ध दलितों की भावनाओं पर मरहम लगाने की पिछली कोशिशें, और एमवीए सरकार के दौरान बुल्लीबाई ऐप निर्माताओं पर कार्रवाई (जिसने मुस्लिम औरतों की एक नकली ऑनलाइन नीलामी शुरू की थी) अल्पसंख्यक वोटों को खींचने में मददगार हो सकती हैं. शिवसेना (यूबीटी) के एक नेता कहते हैं, ''हमारी जीत मराठी-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग की कामयाबी पर निर्भर है जिसकी हम कोशिश कर रहे हैं. शिंदे के लोग हमारे कुछ मराठी वोट काट लेंगे, पर मुसलमान वोटों से भरपाई हो सकती है. भाजपा को हिंदी भाषियों, गुजरातियों, मारवाड़ियों, जैनियों और उच्च जाति के मराठों का वोट मिल सकता है.''

ठाकरे गुट एमवीए के आधार को मजबूत करने के लिए ऐतिहासिक रूप से अपने विरोधी वाम दलों, समाजवादियों और आम आदमी पार्टी (आप) को साथ लेने को भी तैयार है. बौद्ध तथा हिंदू दलितों और अलुतेदार ओबीसी के वोटों की खातिर एमवीए पूर्व लोकसभा सांसद तथा बाबासाहेब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अघाड़ी से हाथ मिलाने को तैयार है. हालांकि, प्रकाश के साथ सीट बंटवारे को लेकर अड़चन बनी हुई है, और एमवीए में संदेह है कि गठबंधन होगा या नहीं.

ठाकरे के लिए दूसरी चुनौती सहयोगियों की सीट बंटवारे में परस्पर विरोधी मांगों से निबटना है. कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि एमवीए नेतृत्व परस्पर विरोधी बातों से परेशान है, जिससे फैसले में रुकावट पैदा हो रही है. वे मानते हैं, ''आदर्श स्थिति तो यह होती कि अब तक हम सीट बंटवारा करके चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतर जाते.'' हालांकि कोई भी समुदाय एकमुश्त एक ही पार्टी को वोट नहीं करता, लेकिन मुंबई की आबादी में एक-तिहाई हिस्सेदारी वाले मराठी भाषी बड़े पैमाने पर शिवसेना के वोटर माने जाते हैं. वैसे, शिवसेना को कामकाजी वर्ग के मराठों का समर्थन मिलता रहा है.

दिग्गज नेता एनसीपी प्रमुख शरद पवार और उद्धव ठाकरे (बीच में) कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे के साथ

मुश्किलें

शिवसेना (यूबीटी) की सबसे बड़ी समस्या अयोध्या में नया राम मंदिर होगी. उसके कट्टर शिवसैनिक भी मानते हैं कि उनके कुछ वोटर लोकसभा चुनाव में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट देने से नहीं बच सकते, जिन्हें वे हिंदुत्व के पथ-प्रदर्शक के रूप में देखते हैं. हालांकि वे शिवसेना के प्रति वफादार बने रह सकते हैं और बाद में विधानसभा चुनावों में उसे ही वोट दे सकते हैं.

इसके अलावा, जैसा कि एक वरिष्ठ शिवसेना (यूबीटी) नेता कहते हैं, कांग्रेस के वोट तो उसे मिल सकते हैं, लेकिन राम मंदिर के मद्देनजर शिवसेना समर्थकों के वोट कांग्रेस को मिलने की संभावना कम है, खासकर जहां मैदान में भाजपा के उम्मीदवार हों. कांग्रेस के एक विधायक को डर है कि शिवसैनिकों और कांग्रेस और एनसीबी के काडरों के बीच दशकों से चली आ रही राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता से साझा चुनावी अभियान में दिक्कत पैदा हो सकती है. शिवसेना में टूट से पहले शिंदे की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि ठाकरे ने 'धर्मनिरपेक्ष' कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन करके पार्टी के हिंदुत्व से समझौता कर लिया था.

उधर, शिंदे शिवसेना नेता और लोकसभा सांसद राहुल शेवाले को लगता है कि स्पीकर राहुल नार्वेकर का 10 जनवरी को शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देने का फैसला ''(सरकार और पार्टी को) स्थिरता प्रदान करेगा और हाशिए के शिवसेना समर्थकों को हमारी ओर आने को प्रेरित करेगा.'' उससे पहले, फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने भी शिंदे के गुट को मान्यता दी थी और उसे नाम और चुनाव चिह्न धनुष-बाण दिया था. चुनाव आयोग ने एनसीपी के मामले में भी इसी तरह का फैसला सुनाया है, जिसमें चाचा शरद पवार के दावे को खारिज करके उप-मुख्यमंत्री अजीत पवार को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न सौंप दिया गया है.

शिंदे खेमे के एक दूसरे सूत्र का कहना है कि राम मंदिर और मोदी के लिए तीसरा कार्यकाल ठाकरे के पक्ष में सहानुभूति पर भारी पड़ेगा. उन्होंने दो बार वोट दिया है. मोदी मर्दाना राजनीति, राष्ट्रवाद और बुनियादी ढांचे के प्रतीक हैं... दूसरी ओर, शिवसेना (यूबीटी) नरम किस्म की राजनीति की ओर बढ़ गई है और उसका अपने मूल मतदाताओं से बहुत कम जुड़ाव रह गया है. इस तरह उसने अपनी स्थिति को कमजोर कर लिया है. वे कहते हैं, ''उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने अपनी विचारधारा से समझौता करने की भारी कीमत चुकाई है.''

भाजपा और शिंदे दोनों खेमों में यह एहसास भी है कि मूल मराठी वोट आधार में गिरावट के कारण शिवसेना का वोट आधार बढ़ना बंद हो गया है. पारंपरिक मराठी इलाकों में आए बदलाव और गैर-मराठी एलीट वर्ग की आमद से राजनैतिक स्थितियां बदल गई हैं. शिंदे गुट के एक सूत्र का कहना है, ''बहुसंख्यकवाद चुनाव का नैरेटिव तय करेगा. राजनैतिक विवादों से जरूरी नहीं कि चुनावी लाभ मिले.''

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे

आगे की राह

ठाकरे को नाजुक संतुलन साधना होगा. उन्हें नए मतदाता समूह को तैयार करते समय अपने मूल मराठी आधार को भी याद दिलाना होगा कि शिवसेना ने राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और दिवंगत बाल ठाकरे ही मूल 'हिंदू हृदय सम्राट' थे. ठाकरे को पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर समूचे महाराष्ट्र के हितों की पैरोकारी वाले क्षेत्रीय संगठन की तरह खुद को तैयार करना होगा, ताकि लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि राज्य के देश का आर्थिक इंजन होने के बावजूद उसे केंद्र सरकार से सौतेला व्यवहार झेलना पड़ रहा है. इससे उसे दक्षिण की पार्टियों की तरह एक क्षेत्रीय ताकत बनने में मदद मिल सकती है.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मंडल और कमंडल के बाद की राजनीति ठोस मुद्दों और राजकाज के बजाए भावनाओं से अधिक संचालित है. शिवसेना और एमवीए के साथ 'धोखा' के प्रति सहानुभूति प्राथमिक मुद्दा होगी, लेकिन विपक्षी दलों को तोड़ने के लिए भाजपा का केंद्रीय प्रवर्तन एजेंसियों का दुरुपयोग वोटरों की भावनाओं को छू सकता है. वे कहते हैं, ''लेकिन ठाकरे परिवार को हमारे गठबंधन के पक्ष में भावनाओं को जगाने के लिए जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करने की जरूरत है.''

राजनैतिक विश्लेषक अभय देशपांडे के मुताबिक, ठाकरे को विक्टिम कार्ड खेलना होगा. वे कहते हैं, ''आगे उनकी रणनीति यही हो सकती है कि ठाकरे परिवार और शिवसेना को अलग नहीं किया जा सकता.'' उन्हें यह भी लगता है कि सब कुछ के बावजूद, एमवीए के लिए अभी भी महाराष्ट्र में अच्छा मौका है. वे बताते हैं, ''भाजपा चुनाव को मोदी पर जनमत संग्रह के रूप में लड़ेगी. फिर भी, एमवीए को बढ़त हासिल है क्योंकि शिवसेना और राकांपा के विधायकों और सांसदों को तोड़ने से उनके काडर और वोटरों में विभाजन नहीं हुआ है.''

एमवीए उन मुद्दों पर भी फोकस कर सकता है जिससे क्षेत्रीय भावनाएं भड़कती हैं. मसलन, निवेश परियोजनाओं को गुजरात में उड़ा ले जाना. लेकिन देशपांडे चेताते हैं, ''हिंदुत्व के मुद्दे पर ठाकरे के सामने दुविधा खड़ी होगी. भाजपा विरोधी दलित और मुस्लिम वोट हासिल करने की कोशिश करते समय उन्हें अपने मूल आधार हिंदुत्व समर्थकों को भी खुश रखना होगा.'' इस विरोधाभास को साधकर ही उद्धव की शिवसेना महाराष्ट्र में प्रासंगिक बनी रह सकती है.

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