scorecardresearch

यूपी मंत्रिमंडल विस्तार में सीएम योगी की इन पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश

योगी सरकार 2.0 के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में पिछड़ा, दलित और सवर्ण नेताओं को मिली जगह. फोकस एनडीए घटकों और क्षेत्रीय समीकरण पर

 बढ़ा दायरा योगी मंत्रिमंडल के नए मंत्री शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ
बढ़ा दायरा योगी मंत्रिमंडल के नए मंत्री शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ
अपडेटेड 20 मार्च , 2024

योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार की पिछले छह महीने से चल रही अटकलों पर लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 5 मार्च को विराम लग गया.

इसका उस वक्त से इंतजार किया जा रहा था जब जहूराबाद (गाजीपुर) के 61 वर्षीय विधायक और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी के गठबंधन सहयोगी के रूप में 2022 का चुनाव लड़ने के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में वापस आ गए थे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के तहत योगी आदित्यनाथ का यह पहला कैबिनेट विस्तार था. इसमें उन्होंने लोकसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और गठबंधन सहयोगियों को ध्यान में रखते हुए चार और मंत्रियों को शामिल किया.

योगी मंत्रिमंडल की ताकत अब बढ़कर 56 हो गई है. इसमें शामिल किए गए चार मंत्रियों में दो पिछड़ी जाति, एक दलित और एक सवर्ण तबके से ताल्लुक रखते हैं. इस तरह लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एनडीए ने पिछड़ा (पी), दलित (डी) और अगड़ा (ए) पर आधारित पीडीए कार्ड चला है. 5 मार्च की शाम राजभवन में एक सादे समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में चारों मंत्रियों को शपथ दिलाई.

चार नए मंत्रियों में से दो गैर-यादव ओबीसी हैं. राजभर और भाजपा एमएलसी दारा सिंह चौहान अति पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं जिनका पूर्वी यूपी के जिलों आंबेडकर नगर, मऊ, आजमगढ़, गाजीपुर और बलिया के आसपास के क्षेत्रों में गैर-यादव मतदाताओं विशेषकर राजभर और नोनिया चौहान के बीच प्रभाव है.

ये दोनों पूर्वी यूपी से हैं और आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल में मंत्री थे. राजभर ने पिछला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन में लड़ा था, वहीं चौहान ने 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ भाजपा छोड़ दी थी और भाजपा पर पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाते हुए सपा के टिकट पर घोसी विधानसभा सीट जीती थी.

हालांकि, उन्होंने साल भर बाद सपा और राज्य विधानसभा से इस्तीफा दे दिया. सितंबर 2023 में हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने उन्हें फिर घोसी से मैदान में उतारा. हालांकि, चौहान वहां चारों खाने चित गिरे. इसके बावजूद पार्टी ने चौहान को उच्च सदन में भेज दिया.

लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सुशील पांडेय बताते हैं, "उन्हें उच्च सदन में भेजने से पता चलता है कि भाजपा उनके जरिए पूर्वी यूपी के नोनिया चौहान मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की उम्मीद कर रही है."

राजभर के नेतृत्व वाली सुभासपा के एनडीए में शामिल होने से भाजपा पदाधिकारियों को लगता है कि यूपी में मिशन-80 का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में पूर्वी यूपी की आंबेडकरनगर, घोसी, गाजीपुर, लालगंज आदि सीटों पर बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में है. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ये सभी सीटें हार गई थी.

हाल ही में समाजवादी पार्टी से नाता तोड़कर एनडीए में शामिल होने वाले रालोद के एक विधायक और दलित नेता अनिल कुमार को भी मंत्रिमंडल विस्तार में जगह मिली. तीन बार के विधायक 46 वर्षीय अनिल अब मुजफ्फरनगर में पुरकाजी विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

पांडेय की राय में, "रालोद के दलित नेता को मंत्रिमंडल में शामिल करने से पश्चिमी यूपी में जाटों के साथ दलित मतदाताओं के बीच एनडीए की पैठ बढ़ेगी. यह उसके लिए हारी हुई लोकसभा सीटों पर बेहतर प्रदर्शन का आधार भी बनेगा."

एनडीए में शामिल होने पर रालोद को बागपत और बिजनौर के रूप में यूपी से लोकसभा की दो सीटें और विधान परिषद की एक सीट मिल गई है, जिनके लिए उम्मीदवारों की घोषणा की जा चुकी है. लोकसभा चुनाव के लिए रालोद ने जाट-गुर्जर उम्मीदवारों पर दांव लगाया है जो पश्चिमी यूपी में एनडीए के जातीय समीकरणों को साधने में मदद करेगा.

रालोद विधायक और सुभासपा प्रमुख के शामिल होने के साथ अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के अलावा उत्तर प्रदेश में एनडीए गठबंधन के सभी सदस्यों का अब राज्य मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व है. योगी मंत्रिमंडल विस्तार में चार नामों में सबसे आश्चर्यजनक नाम पश्चिमी यूपी में भाजपा के 55 वर्षीय ब्राह्मण चेहरे सुनील कुमार शर्मा का शामिल होना था.

10 लाख से ज्यादा मतदाताओं के साथ साहिबाबाद राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र है. तीन बार के विधायक शर्मा ने 2022 में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवार अमरपाल शर्मा को 2.6 लाख से ज्यादा वोटों के फासले से हराकर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया और सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरे.

भाजपा थिंकटैंक को लगता है कि मंत्रिमंडल में शर्मा के शामिल होने से गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र के साथ पश्चिमी यूपी की आसपास की सीटों पर ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने में मदद मिलेगी.

Advertisement
Advertisement