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हिमाचल की अप्रत्याशित हार से हक्का-बक्का हो गई कांग्रेस

हिमाचल की राज्यसभा सीट भाजपा के लिए वैसा ही बोनस है जैसे उत्तर प्रदेश में उसने एक और दलबदलू संजय सेठ का नामांकन कराकर चुनाव में अतिरिक्त आठवीं सीट झटक ली

हिमाचल प्रदेश के सीएम सुक्खू और पराजित राज्यसभा प्रत्याशी अभिषेक मनु सिंघवी 27 मार्च को शिमला में प्रेस से मुखातिब
हिमाचल प्रदेश के सीएम सुक्खू और पराजित राज्यसभा प्रत्याशी अभिषेक मनु सिंघवी 27 मार्च को शिमला में प्रेस से मुखातिब
अपडेटेड 11 मार्च , 2024

कांग्रेस के लिए हाल का समय खासा मुश्किल और हैरान-परेशान करने वाला रहा है. ताजा झटका उसे ऐसे राज्य हिमाचल प्रदेश से मिला है जिसे वह अपेक्षाकृत सुरक्षित मानती रही होगी. 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव में जब लेने के देने पड़ गए तब उसे इलहाम हुआ कि कुछ भी सुरक्षित मानकर नहीं चला जा सकता. खासकर जब आंधी-तूफान की दिशा तय हो न रफ्तार. इस झटके के एक दिन बाद भी मुल्क की यह सबसे पुरानी पार्टी जैसे ट्रॉमा वार्ड में कराहते हुए उत्तर भारत की अपनी इकलौती राज्य सरकार को बचाने के जोड़-जतन कर रही थी.

इलाज का कोई 'घरेलू नुस्खा' कारगर हो, इसकी कोई संभावना ही नहीं बची थी क्योंकि घर में बगावत से ही तो संकट उपजा था. सो, कर्नाटक के ताकतवर क्षत्रप डी.के. शिवकुमार और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा सरीखे दूसरे राज्यों के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को मैदान में उतारना पड़ा. मकसद यही कि समझाकर, थोड़ा अनुशासन लाकर और हर किसी से बात करके वे ही कोई रास्ता निकालें.

28 फरवरी को देर रात तक कशमकश के बीच चली लंबी वार्ताओं के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पद पर बने रहने को लेकर लग रही अटकलों पर विराम लगा लिया. पर बागी भी बंदूकें ताने हुए थे. राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री और पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे अगले दिन वापस ले लिया.

सीएम सुक्खू ने सबसे ज्यादा राहत उस वक्त महसूस की जब 29 फरवरी को दोपहर बाद पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक शिवकुमार और हुड्डा ने कहा, "सुक्खू सीएम बने रहेंगे. सरकार पांच साल चलेगी. विधायकों के सभी छोटे-मोटे मतभेद दूर कर लिए गए हैं. छह सदस्यों की समन्वय समिति बनाई गई है जो पार्टी और सरकार के बीच समन्वय का काम देखेगी और मतभेदों को दूर करेगी." हुड्डा ने कहा कि पार्टी को राज्यसभा सीट खोने का अफसोस है. इस पर भी बैठक में चर्चा हुई.

इससे पहले जवाबी हमले के तहत प्रदेश सरकार ने 15 भाजपा विधायकों को अनुचित व्यवहार के आरोप में सस्पेंड करते हुए बजट पास करा लिया. जिन कांग्रेस विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर पार्टी प्रत्याशी अभिषेक मनु सिंघवी को हरवाया उन्हें भी निलंबित करने के साथ अयोग्य घोषित कर दिया गया.

पर थोड़ा पीछे नजर डालें तो कांग्रेस का यह सोचना उसकी गलतफहमी थी कि हिमाचल ऐसा राज्य है जहां उसको घात की चिंता करने की जरूरत नहीं. करीब 15 महीने पहले जब विधानसभा चुनाव में हौसला बढ़ाने वाली पार्टी की जीत के बाद सुक्खू को शपथ दिलाई गई तब वे एकदम नए-नए थे और पहली बार कोई बड़ा प्रशासनिक पद संभाल रहे थे. उनके नाम पर समझौता हुआ और उनको दोनों धड़ों के बीच सत्ता का संतुलन साधना था.

दौड़ में बाहर हुईं मंडी की सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह कइयों के लिए स्वाभाविक पसंद थीं. दिलों में खटास तो तभी आ चुकी थी. 27 फरवरी को उनके बेटे विक्रमादित्य ने इस्तीफा देकर इसकी पुष्टि ही की कि सुक्खू सरकार तलवार की धार पर है. लेकिन उन्होंने भी वार करने के लिए माकूल मौका देखा और वह दिन चुना जब पार्टी नितांत नाटकीय और शर्मनाक घटनाओं से पस्त थी. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी खेत रहे थे. 68 सीटों वाली विधानसभा में 40 विधायकों के स्पष्ट बहुमत के बावजूद यह अप्रत्याशित था. भाजपा के सिर्फ 25 विधायक थे. लेकिन कांग्रेस के छह विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की.

जो तीन निर्दलीय अभी तक सरकार का समर्थन कर रहे थे, उन्होंने भी पाला बदल लिया. इससे भाजपा उम्मीदवार हर्ष महाजन को मिले वोटों की संख्या 34 हो गई और वे सिंघवी के बराबर आ गए. टाइब्रेकर के बाद हुए ड्रॉ में महाजन चुनाव जीत गए.

बागियों ने बगावत का असली कारण सुक्खू के राजकाज के तौर-तरीके को बताया. सुक्खू की यह पहली राजनैतिक परीक्षा थी और वे झुकने को तैयार नहीं हुए. हालांकि उन्होंने औपचारिक रूप से इस्तीफे की पेशकश की. पार्टी आलाकमान भी नहीं चाहता कि अस्थिरता को ज्यादा तवज्जो मिले. उसने सुक्खू से बने रहने को कहा. लेकिन विक्रमादित्य का इस्तीफा पेचीदा है क्योंकि उनकी मां पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और राज्य से कांग्रेस की इकलौती सांसद. प्रतिभा सिंह कहती हैं, "हमने आलाकमान को बता दिया था कि एक साल से चीजें ठीक नहीं चल रही हैं पर उन्होंने कुछ नहीं किया." 

उनके गुट ने इससे पहले अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें पार्टी ने 22 जनवरी को अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का मंदिर ट्रस्ट का निमंत्रण ठुकरा दिया था. हिमाचल ऐसा राज्य है जहां हिंदुत्व के प्रतीकों को हमेशा समर्थन मिलता है. लुब्बोलुबाब यह कि कांग्रेस में राजनीति की व्यावहारिकता और विचारधारा दोनों आमने-सामने आ खड़े हुए.

बहरहाल, छह विधायकों की क्रॉस वोटिंग के कारण सदन का संख्या बल 62 रह गया. लिहाजा, सुक्खू सरकार फिलहाल 34 विधायकों के नाजुक बहुमत पर टिकी है. लेकिन पहाड़ों पर जैसा देखने में आता है, जमीन ढीली होने पर एक चट्टान खिसकने से दूसरे पत्थर भी फिसलने लगते हैं.

हिमाचल की राज्यसभा सीट भाजपा के लिए वैसा ही बोनस है जैसे उत्तर प्रदेश में उसने एक और दलबदलू संजय सेठ का नामांकन कराकर चुनाव में अतिरिक्त आठवीं सीट झटक ली. सेठ कभी समाजवादी पार्टी के प्रमुख दिवंगत मुलायम सिंह यादव के करीबी थे तो हिमाचल के विजेता महाजन पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र के सहयोगी रह चुके हैं और उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री के 2021 में निधन के बाद बतौर कार्यकारी अध्यक्ष राज्य कांग्रेस के भीतर एक धड़ा बना लिया था. वे विधानसभा चुनाव से महज दो महीने पहले सितंबर 2022 में भाजपा में शामिल हुए. तब कांग्रेस की जीत ने उनको तुरंत पुरस्कृत करने से रोक दिया था. लेकिन उनको निवेश पर रिटर्न अब मिला.

पूर्व वफादारों के पाला बदलकर भाजपा में जाने की घटनाओं ने विपक्ष का उत्साह छीन लिया है. यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है: वह किसी भी बड़ी लड़ाई से पहले प्रतिद्वंदियों का मनोबल तोड़ने के कदम उठाती है. इसमें मजबूत स्थानीय हस्तियों को अपने पाले में लाना शामिल है, जिसके साथ पैकेज डील में समर्थक-कार्यकर्ता और मतदाता आधार भी मिलता है.

भाजपा के डिजिटल वार रूम ने इस तरह ऐसे डेटा सेट विकसित कर लिए हैं जिनमें न केवल अपने ही लोगों बल्कि विरोधियों की ताकत और कमजोरी भी शामिल है. यही कारण है कि उसका यह आक्रामक रुख, जैसे हाल के राज्यसभा चुनाव के दौरान देखा गया, तब काम करता है जब वक्त आता है. इसका उपयोग तब किया जाता है जिससे एक तीर से ज्यादा शिकार हों.

मिसाल के तौर पर उसने उत्तर प्रदेश में बसपा के आंबेडकर नगर के सांसद रितेश पांडे को पार्टी में शामिल किया. इससे उनके पिता और सपा के जलालपुर विधायक राकेश पांडे, साथ ही गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह को क्रॉस वोटिंग के लिए मनाना आसान हुआ. ये दोनों आंबेडकर नगर लोकसभा सीट की पांच विधानसभा सीटों में से दो से जुड़े हुए हैं. इस सीट से भाजपा 2021 का चुनाव हार गई थी. एक लाइन में कहें तो यह वफादारी बदलने की निष्ठुर राजनीति है.

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