जनवरी की 27 तारीख को मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश की 175 विधानसभा और 25 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए जंग की हुंकार भरी. इस दौरान जगन ने, 'नेनू सिद्धम, मीरू सिद्धम' (मैं तैयार हूं, क्या तुम तैयार हो) का नारा भी दिया.
युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) के सर्वेसर्वा ने चुनावों की तुलना कुरुक्षेत्र की लड़ाई से की और नगाड़ा पीटते हुए ऐलान किया, "मैं इस युद्ध में मैं अभिमन्यु नहीं हूं जो विपक्ष के छल-प्रपंचों का शिकार हो जाता है. मैं अर्जुन हूं." जगन वे विशाखापत्तनम के नजदीक सांगीवलासा की रैली में ठाठे मारती भारी भीड़ के सामने बोल रहे थे.
दोबारा जीत के लिए वाईएसआरसीपी का चुनाव अभियान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) योजनाओं के उस गुलदस्ते पर टिका है जिस पर राज्य के काफी संसाधन और यहां तक कि दूसरी जरूरतों पर खर्च किए जाने वाले संसाधन भी न्योछावर कर दिए गए.
बीते 56 महीनों में करीब 2.53 लाख करोड़ रुपए खर्च करके 2,13,000 नौकरियों का सृजन किया गया और इस हकीकत को ठेंगा दिखा दिया गया कि अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए निवेश आकर्षित करने की जरूरत है. उम्मीद है कि बीते दो मौकों की तरह राज्य में अप्रैल-मई में कई चरणों में होने वाले आम चुनाव के शुरुआती चरणों में वोट डाले जाएंगे.
कार्यकर्ताओं से घर-घर जाकर पार्टी का संदेश पहुंचाने का आग्रह करते हुए जगन ने कहा, "वाईएसआरसीपी को सभी सीटें जीतनी चाहिए ताकि कल्याणकारी योजनाएं अगले 25 साल जारी रहें." चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें लगातार दूसरा कार्यकाल जीतना है तो डीबीटी योजनाओं का 'सकारात्मक असर' काफी अहम होगा. इन योजनाओं की निगरानी मजबूत ग्राम सचिवालय व्यवस्था के जरिए की जाती है जिसे राजकाज की जमीनी पहल के तौर पर जगन ने ईजाद किया है.
पड़ोसी तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के नेता के. चंद्रशेखर राव की हालिया हार से सबक लेते हुए जगन ने कई अलोकप्रिय विधायकों और सांसदों को इस उम्मीद में बदला या हटाया है कि इससे सत्ता-विरोधी भावना का मुकाबला किया जा सकेगा.
उम्मीदवारों की जीतने की योग्यता का पता लगाने के लिए चुनाव रणनीतिकारों और राज्य खुफिया पुलिस तक से फीडबैक लिया गया है. इस सबके बावजूद 2019 के उन नतीजों को दोहराना नामुमकिन दिखाई देता है जब वाईएसआरसीपी ने विधानसभा की 151 और लोकसभा की 22 सीटें जीती थीं.
उधर, एन. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के नेतृत्व में विरोधी पार्टियों को उम्मीद है कि वे आपस में मिलकर वाईएसआरसीपी विरोधी वोटों को बंटने से रोक पाएंगी. इसी गरज से नायडू अभिनेता पवन कल्याण की जन सेना पार्टी (जेएसपी) और शायद भाजपा को भी अपने पाले में लाने के जतन कर रहे हैं. इसीलिए टीडीपी चुनावों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान टाल रही है.
अगर टीडीपी-जेएसपी-भाजपा गठबंधन जुड़ता है तो जगन के लिए गंभीर मुश्किल पैदा कर सकता है और कुछ नहीं तो यह वाईएसआरसीपी विरोधी वोटों का बंटवारा रोक सकता या कम से कम तो कर ही सकता है.
वाईएसआरसीपी सुप्रीमो के सामने और भी मुश्किलें हैं. जगन की बहन वाई.एस. शर्मिला जनवरी के अंत में कांग्रेस से जुड़ गईं. उनके तेज-तर्रार अभियान की बदौलत उनके दिवंगत पिता और संयुक्त आंध्र प्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई.एस राजशेखर रेड्डी के वफादारों का एक तबका खिंचा चला आ रहा है. नायडू एनडीए की ओर बढ़ रहे हैं, तो शर्मिला कांग्रेस के वोट बढ़ाने की खातिर सीपीआई, सीपीएम और अन्य एनडीए विरोधी पार्टियों को साथ लाने के लिए बातचीत कर रही हैं.
जगन को इन चुनौतियों का एहसास है, इसीलिए वे टीडीपी और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध रहे हैं. वे नायडू को ऐसा 'फासीवादी' करार देते हैं जिसके पास न तो गठबंधन के बिना चुनाव लड़ने की हिम्मत है और न ही अपने पिछले प्रदर्शन के साथ वोट मांगने का चेहरा है. जहां तक कांग्रेस की बात है, उनका कहना है कि यह 'बांटो और राज करो' की नीति पर चलती है, चाहे वह तेलुगु समाज हो जिसे उसने 2014 में राज्य का बंटवारा करके तोड़ दिया, या उनका परिवार हो जिसे उसने पहले उनके दिवंगत चाचा वाई.एस. विवेकानंद रेड्डी को उनकी मां के खिलाफ खड़ा करके और अब उनकी बहन शर्मिला को उनके खिलाफ उतारकर बांट दिया है.
राजनैतिक विश्लेषक डॉ. सुब्रह्मण्यम रेड्डी कहते हैं, "वाईएसआरसीपी के वोट बैंक में सेंध लगना और उसे कुछ सीटों का नुकसान होना तय है क्योंकि जगन ने सरकारी कर्मचारियों, पेंशनधारियों और पढ़े-लिखे नौजवानों जैसे तबकों की अनदेखी की है." पर वे यह भी कहते हैं, "डीबीटी योजनाओं के लाभार्थियों की विशाल तादाद दूसरे कार्यकाल के लिए उनका समर्थन करेगी."
मगर एक और जोखिम है. असंतुष्ट नेता वाईएसआरसीपी का दामन छोड़ कर टीडीपी के साथ पींगें बढ़ा रहे हैं. वे सत्ता विरोधी अभियान की आग में घी का काम करेंगे. जनवरी में इस्तीफा देने वाले वाईएसआरसीपी के एमएलसी सी. रामचंद्रैया कहते हैं, "मैंने पार्टी के अलोकतांत्रिक कामों और जगन के तानाशाही रवैये के कारण पार्टी छोड़ी." अगर वाईएसआरसीपी को और लोग भी छोड़कर जाते हैं जिसकी काफी संभावना है, तो जगन का सिद्धम सिंहनाद शायद अगल-बगल से तड़कता दिखाई दे.

